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संचार सिद्धांत और भारतीय दर्शन

संचार संबंधी भारतीय अवधारणा के बारे में जानना काफी रोचक और दिलचस्प होगा। आधुनिक संकल्पना में अन्तर्राष्ट्रीय संचार एवं संवाद की बात जोर-शोर से की जाती है, जो भारतीय चेतना और स्मृति में गहरे व्याप्त है। भारत में केवल अंतःवैयक्तिक संचार के कई ऐसे अनछुए पहलू हैं, जो मनुष्य की आंतरिक सक्रियता को सूक्ष्म और सूक्ष्मेतर ढंग से व्याख्यायित करती हैं। साहित्यकार निर्मल वर्मा के शब्दों में-‘‘गंगा महज एक नदी नहीं, हिमालय सिर्फ पहाड़ नहीं, वाराणसी और वृंदावन महज शहर नहीं हैं। मनुष्य का अतीत संग्रहालयों में बंद नहीं है, न ही उसके देवता यूनानी देवताओं की तरह पौराणिक काल के स्मृति-चिन्ह्र हैं। मिथक और यथार्थ, पौराणिक स्मृति और वर्तमान जीवन, देवता और मनुष्य आज भी एक साथ रहते हैं। सैकड़ों विश्वासों, आस्थाओं, समृतियों और संस्कारों का यह संगम और पारस्परिक संपर्क-संवाद केवल भारतीय संस्कृति में ही संभव हो सकता था-जिसमें संपूर्ण मनुष्य की परिकल्पना निहित रहती है।’’ यह बात विशेष उल्लेखनीय है कि भारतीय मानस संचार की अंतः-प्रेरणा को सिर्फ अपने भीतर समेटे रखने का आदी नहीं है। यहां विचारों, अनुभवों और जानकारियों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी सतत् प्रवाह है। यह परकाया प्रवेश की स्थिति है। भारतीय परंपरा में संवाद-चर्चा या शास्त्रार्थ का प्रभाव हर जगह विद्यमान है। ऋग्वेद में संवाद-सूक्त के अन्तर्गत दशम मंडल में सरया-पणि(कुतिया और गौ) संवाद है, तो यम-यमी तथा पुरूरवा-उर्वशी संवाद का भी उल्लेख है। मण्डल तीन में विश्वामित्र और नदी संवाद एवं कठोपनिषद् में नचिकेता-यम के बीच अद्भुत संवाद प्रकरण है। बृहदारण्यक में याज्ञवल्क्य ऋषि का मैत्रेयी और गार्गी से संवाद स्मरणीय है। इसी तरह रामचरितमानस में शिव-पार्वती संवाद और काकभुसुण्डी-गरुण संवाद भारतीय संचार की पारंपरिकता का शाश्वत प्रमाण हैं। इन अन्तर्वैयक्तिक संवादों में पूरी सृष्टि का लोक-व्यवहार समाहित है। भारतीय संचार-पद्धति में अंतःवैयक्तिक संचार एवं अंतर्वैयक्तिक संचार के अतिरिक्त समूह संचार के भी साक्ष्य मौजूद हैं। रामचरित मानस में वर्णित याज्ञवल्क्य ऋषि का ऋषि-सभा में संवाद तथा सुत्तपिटक् में महात्मा बुद्ध का अपने शिष्यों से संवाद उदाहरण हैं। ये शिष्य मत-नेता(व्चपदपवद स्मंकमत) होते थे, जिनका दायित्व गुरु की बातों को लोक में प्रचारित-प्रसारित करना होता था। संचार की भारतीय अवधारणा को समझने के लिए आत्म-चेतना और आत्म-दृष्टि का सर्वप्रथम विकास किया जाना आवश्यक है अन्यथा आधुनिक तकनीक और प्रौद्योगिकी आधारित संचार-तंत्र ही सर्वगुण संपन्न एवं सर्वशक्तिमान मालूम होंगे, जिनका हाल के दिनों में बतौर आयातित संस्कृति भारत में दखल तेजी से बढ़ा है। हाल ही में ब्रिटेन में किए गए एक सर्वेक्षण से स्पष्ट है-‘‘अब व्यक्ति को किसी से सीधे संवाद या संपर्क रखने और आसपास के लोगों के सुख-दुख में शरीक होने के बजाय आभासी संबंधों(टमतजनंस त्मसंजपवद) में ज्यादा दिलचस्पी है। आवाजों, शब्दों, गतियों, और रंगों की हर पल गतिमान बदलती आभासी दुनिया में खोया रहने वाला व्यक्ति न सिर्फ अकेला होता है, बल्कि सार्थक सामाजिक संबंध बना पाने के लिए भी नाकाबिल हो जाता है। इस स्थिति में नेट सर्च करना, ई-मेल करना, चैटिंग, सोशल नेटवर्किंग और टीवी देखना वास्तविक जीवन के प्रत्यक्ष सुख से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।’’ इस बात से इन्कार संभव नहीं है कि आज संबंधों में आत्मीयता के लिए जगह घटी है। सामाजिक वातावरण में मानवीयता के लिए स्थान सुरक्षित नहीं है। भारत प्रकारांतर से जीवन के जिस अनुभवजनित विचार-दृष्टि को सांस्कृतिक विरासत का संवाहक मानता आया है, वह आज नष्ट होने की कगार पर है। साहित्यकार निर्मल वर्मा के शब्दों में-‘‘भारतीय संस्कृति का मनुष्य और सृष्टि से संबंध सार्वभौमिक संपूर्णता के आदर्श पर आधारित रहा है। भारतीय संस्कृति में आज भी समस्त विकृतियों मसलन ढोंग, पाखण्ड, कर्मकाण्ड, दकियानूसी आचरण, अंधविश्वास आदि के बावजूद वे तत्व मौजूद हैं, जिनके रहते मनुष्य को कभी इतनी स्पर्धा और अहम्केन्द्रित अभिमान नहीं हुआ कि प्रगति की लालसा में वह सृष्टिगत अनिवार्य संबंधों का ही संहार कर दे।’’ यह ब्रिटिश राजनीतिज्ञ लार्ड मैकाले की उस चिंता का निराकरण है, जिसमें उसने स्वीकार किया था-‘‘हम भारत में पश्चिमी संस्कृति का प्रभुत्व तब तक स्थापित नहीं कर पायेंगे, जबतक भारतीय शिक्षा पद्धति से संस्कृत भाषा को पूरी तरह निष्काषित नहीं कर देते।’’ यह सोच या विचारधारा मैकाले की व्यक्तिगत नहीं है। पूरे पश्चिम की अवधारणा संकीर्ण और पूर्वग्रह से ग्रसित है। असल में उनका समाज भारत की तरह सांस्कृतिक बहुलता और बहुभाषिकता से परिचित नहीं है और न ही उनमें एशियाई समाजों की भांति खुला सांस्कृतिक आदान-प्रदान हो सका है। पश्चिम का संबंध दूसरी संस्कृतियों से हमेशा शक्ति आधारित रहा है। जिस कारण किसी और समाज की बौद्धिक संपदा की सराहना और उसे पचा सकने की प्रवृति उनमें नहीं है। खासकर भारत जैसे समाज की तो हरगिज ही नहीं, जो कभी पश्चिम का उपनिवेश रह चुका है। यूरोपीय विचारों के इतिहास में ज्ञानोदय का प्रादुर्भाव महत्वपूर्ण माना गया है। ज्ञानोदय का अर्थ विवेकवाद, तकनीकी केन्द्रीयता, ज्ञान और उत्पादन का मानकीकरण, रैखिक प्रगति, सार्वभौम और निरपेक्ष सत्य में विश्वास का प्रतिनिधित्व करने से है। इस चिंतन का असर तत्कालीन समाज पर इतना ज्यादा था कि पूरी दुनिया एक खास तरह की विचारधारा में समेटी जाने लगी। पश्चिम में पनपे विचार कसौटी बन गए, जिस पर दुनिया की सभी ज्ञान-परम्पराएं जांची-परखी जाने लगीं। यूरोप के ही एक चिंतक हाइडेगर ने इस प्रवृति को धरती का यूरोपीकरणकी संज्ञा दी है। प्रसंगवश, यदि हम पश्चिमी चिंतक जिजेक के हवाले से कहें, तो-‘‘इसमें कोई शक नहीं है कि हमारी सोच किसी न किसी स्थापित विचारधारा से निकलती है और हमारे जीवन का हर आयाम उससे प्रभावित होता है। जाने-अनजाने पूंजीवादी विचारधारा ने पिछले सौ वर्षों में समाज के हर आयाम को प्रभावित किया है। इसने न केवल सामान्य लोगों के दैनिक जीवन को अपने अनुसार ढाला है, बल्कि विरोध के हर स्वर को पूंजीवाद के समर्थन के स्वर में तब्दील कर दिया है।’’ 
आलोचनात्मक यथार्थवाद के प्रवर्तक रॉय भास्कर के अनुसार यथार्थ की एकांगी समझ के कारण चिंतन भी एकपक्षीय हो गया है। भौतिक सुखों के बहुतायत के बावजूद समाज घोर मानसिक संताप से गुजर रहा है। संचार के साधन बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन साथ ही मनुष्य एकाकी होता जा रहा है। मनुष्य जीवन के सूक्ष्मतम अनुभवों से वंचित है। ऐसे में हिंसा, अपराध, आत्महत्या आम बात हो चली है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि इससे समाज तो हिंसक होगा ही, मानवता के लिए भी संकट उत्पन्न हो जाएगा।
यदि हम संचार के परिप्रेक्ष्य में विचारधारा की बात करें, तो पाएंगे कि विचारधारा एक संपूर्ण विश्व-दृष्टि को व्यक्त करने वाले सिद्धांत की तरह प्रयुक्त होता है, जबकि सिद्धांत को किसी विचारधारा की पूर्वपीठिका नहीं माना जा सकता है। वैसे यह विवाद का विषय है, लेकिन कई बार स्वयं संचार-माध्यमों की भी अपनी विचारधारा होती है। भारत के बारे में, ब्रिटेन के संचार-माध्यम की जैसी सोच है, वैसा ही रूस भी सोचे या अमेरिका भी इसी नजरिए से भारत को देखे, यह जरूरी नहीं। मार्क्स और एंगेल्स ने संचार-संबंधी जो अवधारणा प्रस्तुत की है, उनके अनुसार-‘‘संचार के लिए प्रस्तुत विचारों का संबंध सिर्फ चेतना से नहीं होता है। वह समाज की भौतिक स्थितियों से पैदा होते हैं। खुद चेतना का अस्तित्व भौतिक और स्थूल स्वरूपों से है। जो भी नया वर्ग अपने से पहले शासन करने वाले वर्ग के स्थान पर अपने को प्रतिष्ठित करता है, अपनी लक्ष्य सिद्धि की खातिर ही अपने हित को समाज के तमाम सदस्यों के समान हित के रूप में प्रस्तुत करने के लिए बाधित होता है। यहां नए विचारों को इस रूप में प्रस्तुत करना होता है, जैसे यह किसी एक वर्ग के नहीं बल्कि पूरे समाज के विचार हैं।’’

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