गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

शराब समाज के लिए घातक

दोस्तों मैं देख रहा हूँ कि सभी राज्यों में शराब के कारण समाज दूषित हो रहा है और घर के अन्दर व बाहर महिलाएं हिंसा की शिकार हो रही हैं। एक तरफ लगभग सभी राज्यों की सरकार ने पंचायतों में महिलाओं को पचास फीसद आरक्षण दे दिया तो दूसरी तरफ प्रत्येक पंचायत में शराब की दुकान खोलने का लाइसेंस दे दिया। इस कारण गांवों की स्थिति बदतर होती जा रही है। शराब के कारण बिहार में 37.2 फीसद शादीशुदा महिलाएं अपने पति 
द्वारा प्रताडि़त हो रही हैं।सरकार शराब को राजस्व उगाही का मुख्य स्त्रोत बना रही है। यह महिलाओं को जीते जी नरक में ढकेलने जैसा है। केन्द्र सरकार को अपनी शराब नीति पर पुर्नविचार करना चाहिए।और राज्यों को इस दिशा में निर्देश जारी करनी चाहिए | गांव- गांव शराब दुकान खोलकर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है। स्कूल- कालेजों के पास शराब की दुकानें खोली जा रही हैं।..इस समस्या पर कारगर कदम उठाने की जरुरत है ...| मित्रों आप सब की क्या राय है ????

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

आम आवाज़ विकल्प सोशल मीडिया

स्विज़रलैंड मे यह व्यवस्था है की अगर आप कही कोई जुर्म होते या क़ानून टूटते हुए देख रहे है तो आप उस दृश्य को अपने मोबाइल के कैमरे मे कैद कर एक ख़ास वेबसाइट पर डाल सकते है जहाँ से सरकार उस पर कार्येवाही कर सकती है, इसके प्रभाव का आंकलन इस बात से किया जा सकता है की वहां कोई "च्वीन्ग्म" तक खा के नहीं थूकता! आज हिन्दुस्तान मे हर किसी के पास मोबाइल फ़ोन की सुविधा है, इन्टरनेट तक पहुँच भी आसान है तो हमारे देश मे इस विकल्प को क्यों नहीं अपनाया जा रहा! मै यह नहीं कह रहा की हम इस तरह के विकल्प से अन्भिग्ये है क्योंकि फेसबुक पर ट्रेफिक पुलिस द्वारा इस तरह की शुरुवात पहले ही की जा चुकी है और आज एक लाख से भी ज्यादा लोग इस से जुड़े हुए है और इसके द्वारा जो भी कर्येवाही अभी तक की गयी है उसमे ज्यादा श्र्ये जनता को ही जाता है, लोगो ने गलत नंबर प्लेट वाली गाडियों की तस्वीरे इस प्रष्ट पर डाली और गैर सरकारी वाहनों पर लगी लाल बतियों की तस्वीरे भी इस प्रष्ट पर डाली और नतीजा ऐसा था जिसकी कल्पना कम ही की जाती है की कई रसूख वाले लोगो को भी कानून के आगे झुकना ही पड़ा! पर इसको सिर्फ उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है क्योंकि किसी भी बड़े स्तर पर सोशल मीडिया की ताकत का इस्तमाल अभी भी शुरू नहीं हुआ है जो की भारत जैसे देश मे काफी जरूरी भी है!
हमारे देश की व्यवस्था काफी जटिल है और जटिलता से निपटने के लिए पारदर्शिता की जरुरत होती है और यह सोशल मीडिया पारदर्शिता की स्थापना कर सकता है! कुछ समय पहले तक जब लोकपाल के विषय मे बात चल रही थी तो कहा जा रहा था की लोकपाल को सारी ताकत नहीं दी जा सकती और इसी कारण यह मुद्दा ठन्डे बसते मे भी चला गया पर उस समय तक भी सोशल मीडिया का विकल्प किसी ने नहीं दिया! इसमें ताकत जनता के हाथो मे रहेगी जो की लोकतंत्र की बुनियाद है, फैसला भी न्याययालय द्वारा ही किया जायेगा जो की संविधान के अंतर्गत होगा और लाभ भी जनता को ही पहुंचेगा, यह लोकपाल का अच्छा विकल्प हो सकता था पर इस और ध्यान किसी ने नहीं दिया और वह भी तब जब भारत का एक बहुत बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया से जुडा हुआ है! जब सोशल मीडिया द्वारा भरष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन खड़ा किया जा सकता है तो सोशल मीडिया द्वारा ही भरष्टाचार के खिलाफ लड़ा क्यों नहीं जा सकता? आखिर कितना मुश्किल होगा अगर आपसे कोई रिश्वत मांगे और आप उसका सबूत सोशल मीडिया द्वारा सम्बंधित विभाग तक पंहुचा दे! मेरे अनुसार भरष्टाचार के खिलाफ इस से अच्छा हथियार कोई नहीं हो सकता!
पर मै यह मानता हूँ की हमारी सरकार इस विकल्प को जान चुकी है इसीलिए कोई न कोई बहाना बना कर इन पर नियंत्रण कसने की साजिश कर रही है! सरकार का कहना है की ऐसा सामजिक और धार्मिक भावनाओ को ठेस पहुँचने से रोकने के लिए किया जा रहा है तो मै पूछता हूँ की अगर एक बार कोई गलत तस्वीर साइट्स से हटा भी दी जाती है तो कैसे माना जाये की उस तस्वीर को डालने वाला फिर कोई ऐसी तस्वीर नहीं डालेगा और कैसे इस बात का निर्धारण होगा की क्या सही है और क्या गलत? एक उदहारण दे कर समझाना चाहूँगा की लोकपाल आन्दोलन के दौरान सरकार की आलोचना करते कई चित्र फेसबुक पद डाले गए या ट्विट्टर पर भी कई सरकार विरोधी बातें कही गयी और यदि सरकार के पास इन सब पर नियंत्रण करने की ताकत होगी तो जायज सी बात है की सरकार इन सब को भी गलत मान कर हटा देगी! तो जरुरत है जल्द से जल्द सोशल मीडिया की असली ताकत को सही तरह से उपयोग करने की!
                                                                                                      साभार :-उधार 

Empirical research(अनुभवजन्य अनुसंधान)

अनुभवजन्य और वैचारिक रूप से दो दृष्टिकोण हैं जिन्हें आमतौर पर एक शोध आयोजित करते समय नियोजित किया जाता है। संकल्पनात्मक को शोधकर्ताओं के रू...