मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

ऐसा क्यों होता है ?


ऐसा क्यों होता है?
ऐसा क्यों होता है? कभी-कभी हम किसी से कुछ कहना चाहते हैं, पर यह सोचकर चुप हो जाते हैं कि कहीं कोई हमारी बात का गलत मतलब न निकाल ले। बस हमारे दिल की बात दिल में ही रह जाती है। हां कभी कोई ऐसा भी चमत्कार हो जाता है जब हमारी बात जुबान बनकर किसी तक पहुंच जाती है और हम उस स्थिति से बच जाते हैं, जो हमारे कहने से बिगड़ भी सकती थी। हमारा दिल तो आईने की तरह बिल्‍कुल साफ है, लेकिन किसी की नजर में हम बुरे बन जाएं, यह भी हमें गंवारा नहीं। अगर वह शख्स खुद चलकर हमसे बात करता है, जो बात हमने कहनी थी, तो ऐसा लगता है जैसे हमारे मन के उपवन में फूल खिल उठे हों और हमारे दिल का बोझ एकदम हल्का हो जाता है। है न कितनी अजीब बात...हम इतने शक्तिवान होकर भी अंदर से कितने कमजोर हैं। हमारा व्यक्तित्व हमारी सबसे बड़ी पूंजी है, जिसकी वजह से यह दुनिया हमें जानती है।

Empirical research(अनुभवजन्य अनुसंधान)

अनुभवजन्य और वैचारिक रूप से दो दृष्टिकोण हैं जिन्हें आमतौर पर एक शोध आयोजित करते समय नियोजित किया जाता है। संकल्पनात्मक को शोधकर्ताओं के रू...