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दंत-हीन लोकपाल ! हाय रे कांग्रेस !

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गहन माथापच्ची के बाद कैबिनेट से लोकपाल बिल को मंजूरी मिलने के बाद सरकार लोकपाल बिल को संसद में 22 दिसंबर को पेश करने जा रही है. इसे दंतहीन लोकपाल बताया जा रहा है जिसको लेकर अन्ना और सरकार के बीच तय है कि विरोधाभास और बढेगा और संसद की लड़ाई सड़क तक आनी तय है. कैबिनेट ने मंगलवार शाम को लोकपाल बिल पारित तो दिया, लेकिन अन्ना हजारे इसमें सीबीआई पर जो चाहते थे उसे स्वीकारा नही गया. सूत्रों का दावा है कि जिस लोकपाल को आना है उसके पास न तो अधिकार होंगे ना ताकत। इससे बिफरे अन्ना ने धमकी दी है कि वह मुंबई में 27 से 29 तक तीन दिन उपवास करेंगे और फिर 30 दिसंबर से जेल भरो आंदोलन शुरू होगा। अन्ना ने कहा यह सरकार अंधी और बहरी हो गई है।

दरअसल लोकपाल बिल अन्ना की ज्यादातर अहम मांगों से परे है. अन्ना हजारे कहते रह गए कि सीबीआई, ग्रुप-सी और न्‍यायपालिका को लोकपाल के अधीन लाया जाए. अन्ना चाहते थे कि सीबीआई लोकपाल के अधीन हो.लेकिन प्रस्तावित विधेयक में सीबीआई का अलग अस्तित्व बना रहेगा.ख़ास यह है कि अन्ना चाहते थे सीबीआई निदेशक की नियुक्ति लोकपाल की तरह हो मगर पेंच यह है कि है कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प…

‘तू तो ना आए, तेरी याद सताए’

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ताउम्र जिंदगी का जश्न मनाने वाले ‘सदाबहार’ अभिनेता देव आनंद सही मायने में एक अभिनेता थे, जिन्होंने अंतिम सांस तक अपने कर्म से मुंह नहीं फेरा।हिन्दी फिल्मों के सदाबहार अभिनेता देव आनंद के निधन से बॉलीवुड में ही नहीं पुरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। देव साहब की तस्वीर आज भी लोगों के जेहन में एक ऐसे शख्स की है, जिसका पैमाना न केवल जिंदगी की रूमानियत से लबरेज था, बल्कि जिसकी मौजूदगी आसपास के माहौल को भी नई ताजगी से भर देती थी।
इस करिश्माई कलाकार ने ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया...’ के दर्शन के साथ जिंदगी को जिया। यह उनकी 1961 में आई फिल्म ‘हम दोनों’ का एक सदाबहार गीत है और इसी को उन्होंने जीवन में लफ्ज-दर-लफ्ज उतार लिया था।
देव साहब ने शनिवार रात लंदन में दुनिया को गुडबॉय कह दिया। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। वैसे तो वह जिंदगी के 88 पड़ाव पार कर चुके थे, लेकिन वह नाम जिसे देव आनंद कहा जाता है, उसका जिक्र आने पर अभी भी नजरों के सामने एक 20-25 साल के छैल-छबीले नौजवान की शरारती मुस्कान वाली तस्वीर तैर जाती है, जिसकी आंखों में पूरी कायनात के लिए मुहब…

ऐसा क्यों होता है ?

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ऐसा क्यों होता है?
ऐसा क्यों होता है? कभी-कभी हम किसी से कुछ कहना चाहते हैं, पर यह सोचकर चुप हो जाते हैं कि कहीं कोई हमारी बात का गलत मतलब न निकाल ले। बस हमारे दिल की बात दिल में ही रह जाती है। हां कभी कोई ऐसा भी चमत्कार हो जाता है जब हमारी बात जुबान बनकर किसी तक पहुंच जाती है और हम उस स्थिति से बच जाते हैं, जो हमारे कहने से बिगड़ भी सकती थी। हमारा दिल तो आईने की तरह बिल्‍कुल साफ है, लेकिन किसी की नजर में हम बुरे बन जाएं, यह भी हमें गंवारा नहीं। अगर वह शख्स खुद चलकर हमसे बात करता है, जो बात हमने कहनी थी, तो ऐसा लगता है जैसे हमारे मन के उपवन में फूल खिल उठे हों और हमारे दिल का बोझ एकदम हल्का हो जाता है। है न कितनी अजीब बात...हम इतने शक्तिवान होकर भी अंदर से कितने कमजोर हैं। हमारा व्यक्तित्व हमारी सबसे बड़ी पूंजी है, जिसकी वजह से यह दुनिया हमें जानती है।

नरेन्द्र मोदी और भाजपा की दुविधायें

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जेपी और अन्ना आन्दोलन में फर्क

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ईमानदार थे, और अन्ना हजारे की छवि भी ईमानदार है। परन्तु, दोनों आंदोलनों में बड़ा फर्क है। जेपी का आंदोलन संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए था, जबकि अन्ना का एक सूत्री मुद्दा भ्रष्टाचार है। वैसे, भ्रष्टाचार का विरोध भी जेपी आंदोलन का एक हिस्सा था। भ्रष्टाचार के सभी पहलुओं-सामाजिक, आर्थिक, नैतिक आदि, पर उस आंदोलन में जोर रहा। जेपी का जीवन राजनीतिक, सामाजिक एवं 42 के आंदोलन के अनुभवों से जुड़ा रहा। उनका कैनवास बहुत बड़ा था। प्रधानमंत्री के कद के सामने उनका व्यक्तित्व किसी तरह कम नहीं था। जेपी संसदीय व्यवस्था में बहुत जोर देते थे। पूरे आंदोलन के दौरान उन्होंने संसदीय व्यवस्था को और मजबूती प्रदान करने का ही काम किया। बड़ी बात तो यह है उनका आंदोलन किसी ब्लू-प्रिंट पर आधारित नहीं था। जेपी आंदोलन खुद परिस्थिति के मुताबिक अपनी धारा तय करता रहा। जेपी के साथ भीड़ नहीं थी। उनके साथ प्रतिबद्ध लोग थे।

उनके अनुसार बड़ी संख्या से किसी आंदोलन में क्षणिक लाभ लाभ हो सकता है, परन्तु जज्बात को समाप्त होने में देर भी नहीं लगती। भीड़ दिशा नहीं तय कर सकती। प्रतिबद्ध कार्यकर्ता ही इस काम में स…

बांटो और राज करो !!!!!!!!!!!!!!

कांग्रेस शायद सोच रही है कि भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को विभाजित कर और लोकपाल बिल के अपने प्रारूप को सदन में पेश कर उसने भ्रष्टाचार विरोधी माहौल की हवा निकाल दी है। लेकिन उसकी यह खतरनाक चाल दीर्घावधि में उसी को नुकसान पहुंचाएगी। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों की विश्वसनीयता खंडित करने के लिए उसने कई चालें चलीं। सिविल सोसाइटी की वैधता को उसने इस आधार पर चुनौती दी कि नागरिक समाज के ये स्वयंभू प्रतिनिधि चुने हुए जनप्रतिनिधियों को कमजोर कर रहे हैं। भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के प्रमुख नेताओं प्रशांत भूषण, शांति भूषण और अरविंद केजरीवाल के व्यक्तिगत साख को उसने जहां चुनौती दी, वहीं बाबा रामदेव को अर्द्धसत्य और अतिशयोक्तिपूर्ण बयान के आधार पर कमजोर करने की कोशिश की। इसका संदेश यह निकलता है कि अगर सभी चोर हैं, तो जांचे-परखे हुए कांग्रेसी चोरों का ही साथ देना चाहिए।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस के खिलाफ भाजपा और संघ द्वारा प्रेरित सांप्रदायिक साजिश के रूप में पेश कर और राष्ट्र विरोधी बताकर चुनौती दी गई। दिग्विजय सिंह, जयंती नटराजन और मनीष तिवारी जैसे कांग्रेस के निष्ठावान…

राष्ट्र प्रेमी युवाओं से आह्वान !!!!!!!

(१)
उनका कर्ज चुकाने को,
अपना फर्ज निभाने को।
नया ख़ून तैयार खड़ा है,
राजनीति मेँ आने को॥

(२)
जागी अब तरुणाई है,
देश ने ली अंगडाई है।
नई उमर की नई फसल,
अब राजनीति मेँ आई है॥

(३)
जण गण मन अधिनायक,
जो है भाग्य विधाता।
लोकतंत्र के सिंहासन का,
असली मालिक मतदाता॥

(४)
किसी वाद पर दो मत ध्यान,
राष्ट्रहित मेँ दो मतदान॥

(५)
जाती धर्म और भाषावाद,
करना है इनका प्रतिवाद॥

कांग्रेस और भ्रष्टाचार !

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश आंदोलित है और जन लोकपाल को लेकर उत्साहित लेकिन, कांग्रेस इस पूरे मामले को किनारे लगा देना चाह रही है।कांग्रेस इस अभियान पर ध्यान न देकर उल्टे अन्ना हजारे की टीम पर हमले में जुटी है ताकि लोगों का ध्यान मूल विषय से हटाया जा सके। भ्रष्टाचार को लेकर पूरे देश में माहौल कांग्रेस के खिलाफ है और कांग्रेस उन्हीं लोगों को लक्ष्य कर रही है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। कांग्रेस भ्रष्टाचार की गंगोत्री है और अपने शुरूआती दौर में ही यह पार्टी इसके लिए खासी बदनाम हो चुकी थी।1937 में विभिन्न राज्यों की कांग्रेस सरकारों के भ्रष्टाचार के इतने किस्से सामने आये कि महात्मा गांधी को दुखी होकर पार्टी को दफनाने तक की बात कह देनी पड़ी। कश्मीर युद्ध के समय जीप घोटाला हुआ। सेकेण्ड हैंड जीप खरीदी गयी और वे सब बेकार निकलीं।
लोकपाल का सुझाव पहली सरकार के वित्तमंत्री सीडी देशमुख ने दिया और डा. राजेन्द्र प्रसाद ने उसका समर्थन किया। तब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसे गलत अर्थ में ले लिया था। इसे उन्होंने अपने खिलाफ अभियान मान लिया। नेहरू ने लोकपाल को मंत्रियों का हौसला तोड़ने वाला बताया। उस समय ल…

युवा जग रहे है ?

उत्तर प्रदेश के कुछ विश्वविद्यालयों में समाजवादी युवजन सभा और एबीवीपी ने जिस तरीके से कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का विरोध किया, उसे सही नहीं ठहराया जा सकता। जनतंत्र में असहमति व्यक्त करने का अधिकार सब को है, लेकिन इस नाम पर अराजकता फैलाना गलत है।

वैसे यूपी में राहुल गांधी के प्रति छात्र संगठनों का यह रवैया पहली बार देखा जा रहा है। किसी भी छात्र संगठन ने उनका इस तरह से उग्र विरोध करने का साहस पहले नहीं दिखाया था। तो क्या यह माना जाए कि राहुल गांधी की लोकप्रियता का ग्राफ कुछ गिरा है? संभव है युवाओं के मन में राहुल के प्रति पैदा हो रहे असंतोष ने ही इन छात्र संगठनों का हौसला बढ़ाया हो।

दरअसल राहुल अब उस दौर से आगे निकल आए हैं, जब वह एक शो-पीस की तरह देखे जाते थे। युवा उन्हें सुनने से ज्यादा देखने में रुचि दिखाते थे। राहुल उनके लिए राजनेता से ज्यादा एक मॉडल थे, इसलिए उनकी सियासी बातों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता था। लेकिन धीरे-धीरे राहुल ने राजनीति की जमीन पर अपने पैर मजबूती से जमा लिए हैं। उनकी पार्टी ने भी उन पर पहले से ज्यादा भरोसा करना शुरू कर दिया है और अब वह कांग्रेस का चेहरा ब…

पर्यावरण के बहाने उद्योगों को न आने देने की साजिश

नयी औद्योगिक इकाइयों को बिहार में लाने के उद्देश्य से सरकार के सकारात्मक पहल पर बड़ी संख्या में उद्यमियों ने बिहार का रुख किया है। पर बिहार में उद्यमियों के आने की तैयारी माफिया तत्वों को बर्दाश्त नहीं हो रही है। उनके सिंडिकेट ने काफी तेज गति से मिथ्यापूर्ण व गलत हथकंडे अपनाकर बिहार आ रहे उद्यमियों की राह में रोड़ा अटकाना शुरू कर दिया है। हाल ही में एक मामला बिहार में सफेद एस्बेस्ट्स चादर की फैक्ट्री लगाने को आगे बढ़ी कंपनी बालमुकुंद सीमेंट का इस परिपेक्ष्य में सामने आया है।
पर्यावरण के बहाने इस कंपनी के खिलाफ माफिया तत्वों ने आंदोलन शुरू किया है। जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि इस कंपनी को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के साथ-साथ राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद की सहमति है। दरअसल बिहार में सफेद एस्बेस्ट्स की चादर का वार्षिक टर्नओवर 250 करोड़ रुपये का है। वर्तमान में इसकी आपूर्ति पश्चिम बंगाल और थोड़ी बहुत उप्र की कंपनियों द्वारा की जाती है। इन राज्यों में स्थित कंपनियों के संचालक यह नहीं चाहते कि इस क्षेत्र में उनका आधिपत्य यूं कहें एकाधिकार खत्म हो जाये। इस बात को ध्यान में रख इनके द्वारा इस क्षे…