मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

दंत-हीन लोकपाल ! हाय रे कांग्रेस !




गहन माथापच्ची के बाद कैबिनेट से लोकपाल बिल को मंजूरी मिलने के बाद सरकार लोकपाल बिल को संसद में 22 दिसंबर को पेश करने जा रही है. इसे दंतहीन लोकपाल बताया जा रहा है जिसको लेकर अन्ना और सरकार के बीच तय है कि विरोधाभास और बढेगा और संसद की लड़ाई सड़क तक आनी तय है. कैबिनेट ने मंगलवार शाम को लोकपाल बिल पारित तो दिया, लेकिन अन्ना हजारे इसमें सीबीआई पर जो चाहते थे उसे स्वीकारा नही गया. सूत्रों का दावा है कि जिस लोकपाल को आना है उसके पास न तो अधिकार होंगे ना ताकत। इससे बिफरे अन्ना ने धमकी दी है कि वह मुंबई में 27 से 29 तक तीन दिन उपवास करेंगे और फिर 30 दिसंबर से जेल भरो आंदोलन शुरू होगा। अन्ना ने कहा यह सरकार अंधी और बहरी हो गई है।

दरअसल लोकपाल बिल अन्ना की ज्यादातर अहम मांगों से परे है. अन्ना हजारे कहते रह गए कि सीबीआई, ग्रुप-सी और न्‍यायपालिका को लोकपाल के अधीन लाया जाए. अन्ना चाहते थे कि सीबीआई लोकपाल के अधीन हो.लेकिन प्रस्तावित विधेयक में सीबीआई का अलग अस्तित्व बना रहेगा.ख़ास यह है कि अन्ना चाहते थे सीबीआई निदेशक की नियुक्ति लोकपाल की तरह हो मगर पेंच यह है कि है कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष का नेता और चीफ जस्टिस मिलकर करेंगे. यह एक नई पहल है कि सिर्फ सरकार ही निदेशक की नियुक्ति नहीं करेगी. सीबीआई में एसपी और उससे ऊपर के अफसरों के चयन के लिए भी कमेटी होगी. अन्ना चाहते थे कि सीवीसी भी लोकपाल के अधीन काम करे, लेकिन सरकार ने उसे भी अलग रखा है. अन्ना हजारे की मांग थी कि ग्रुप-सी के कर्मचारी लोकपाल के दायरे में हों, लेकिन सरकार ने इसकी जिम्‍मेदारी सीवीसी को सौंप दी है.

सबसे अहम् अन्ना हजारे की मांग थी कि सरकारी बिल में व्यवस्था की गई है कि प्रधानमंत्री के खिलाफ तभी जांच हो सकेगी जब लोकपाल बेंच के तीन चौथाई सदस्य इस पर सहमत हों. प्रधानमंत्री की सुनवाई इन-कैमरा होगी यानी मीडिया और आम जनता वो सुनवाई नहीं देख सकेंगे. कुछ शर्तों के साथ पीएम जरूर लोकपाल बिल के अंदर आ गये हैं। सरकार के इस नये लोकपाल में केस लड़ने के लिए एक टीम होगी और जांच करने के लिए भी एक टीम होगी. लोकपाल में नौ सदस्य होंगे. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज इसके चेयरमैन होंगे. लेकिन लोकपाल को चुनने वाली कमेटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा स्पीकर, लोकसभा में विपक्ष की नेता, चीफ जस्टिस और सरकार के ही चुने एक मशहूर वकील होंगे. अन्ना चाहते थे कि शिकायत करने वालों को तंग न किये जाने की सरकारी व्यवस्था हो लेकिन सरकार शिकायत करने वालों की रक्षा के लिए अलग व्हिसल ब्‍लोअर बिल ला रही है. इससे शिकायत करने वालों की पहचान छिपाई जा सकेगी.

अब अन्ना हजारे ने साफ़ तौर पर कहा कि भ्रष्टाचार खत्म करने को लेकर सरकार की नीयत साफ नहीं है. और ये भी कि उन्हें लोकपाल का नया मसौदा मंजूर नहीं.उन्हें सरकार से ऐसी उम्मीद नहीं थी। उन्होंने हमें धोखा दिया है। सरकार की नीयत साफ नहीं है वो लोकपाल को लेकर बिल्कुल भी गंभीर नहीं है। उसकी पोल खुल जायेगी इसलिए वो सीबीआई पर से अपना अंकुश हटाना नहीं चाहती है। सरकार ने हमारा और संसद का अपमान किया है। इधर सरकार ने भी अन्ना हजारे की मांगों के सामने झुकने से इनकार कर दिया है और कहा है कि लोकपाल के दायरे में सीबीआई नहीं आएगी। सीबीआई के प्रमुख का चुनाव प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश मिलकर करेंगे। वहीं प्रधानमंत्री भी कुछ शर्तों के साथ ही लोकपाल के दायरे में होंगे। अब यह बिल गुरुवार को लोकसभा में पेश किया जाएगा। इस पर विपक्ष क्या रुख अपनाता है यह देखने वाला मुद्दा होगा.अन्ना हजारे को मुंबई में 13 दिनों के अनशन की मंजूरी भी मिल गई है.

रविवार, 4 दिसंबर 2011

‘तू तो ना आए, तेरी याद सताए’





ताउम्र जिंदगी का जश्न मनाने वाले ‘सदाबहार’ अभिनेता देव आनंद सही मायने में एक अभिनेता थे, जिन्होंने अंतिम सांस तक अपने कर्म से मुंह नहीं फेरा।हिन्दी फिल्मों के सदाबहार अभिनेता देव आनंद के निधन से बॉलीवुड में ही नहीं पुरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। देव साहब की तस्वीर आज भी लोगों के जेहन में एक ऐसे शख्स की है, जिसका पैमाना न केवल जिंदगी की रूमानियत से लबरेज था, बल्कि जिसकी मौजूदगी आसपास के माहौल को भी नई ताजगी से भर देती थी।
इस करिश्माई कलाकार ने ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया...’ के दर्शन के साथ जिंदगी को जिया। यह उनकी 1961 में आई फिल्म ‘हम दोनों’ का एक सदाबहार गीत है और इसी को उन्होंने जीवन में लफ्ज-दर-लफ्ज उतार लिया था।
देव साहब ने शनिवार रात लंदन में दुनिया को गुडबॉय कह दिया। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। वैसे तो वह जिंदगी के 88 पड़ाव पार कर चुके थे, लेकिन वह नाम जिसे देव आनंद कहा जाता है, उसका जिक्र आने पर अभी भी नजरों के सामने एक 20-25 साल के छैल-छबीले नौजवान की शरारती मुस्कान वाली तस्वीर तैर जाती है, जिसकी आंखों में पूरी कायनात के लिए मुहब्बत का सुरूर है।
देव साहब के अभिनय और जिंदादिली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे कलाकारों ने फिल्मों में नायक की भूमिकाएं करना छोड़ दिया था, उस समय भी देव आनंद के दिल में रूमानियत का तूफान हिलोरें ले रहा था और अपने से कहीं छोटी उम्र की नायिकाओं पर अपनी लहराती जुल्फों और हॉलीवुड अभिनेता ग्रेगोरी पैक मार्का इठलाती टेढ़ी चाल से वह भारी पड़ते रहे। ‘जिद्दी’ से शुरू होकर देव साहब का फिल्मी सफर, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘देस परदेस’, ‘हरे रामा हरे कृष्ण’ जैसी फिल्मों से होते हुए एक लंबे दौर से गुजरा और अपने अंतिम सांस तक वह काम करते रहे।
उनकी नई फिल्म ‘चार्जशीट’ रिलीज होने के लिए तैयार है और वह अपनी फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ की अगली कड़ी पर भी काम कर रहे थे। लेकिन इस नई परियोजना पर काम करने के लिए देव साहब नहीं रहे। बीते सितंबर में अपने 88वें जन्मदिन पर उन्होंने पीटीआई को दिए अंतिम साक्षात्कार में कहा था, ‘मेरी जिंदगी में कुछ नहीं बदला है और 88वें साल में मैं अपनी जिंदगी के खूबसूरत पड़ाव पर हूं। मैं उसी तरह उत्साहित हूं, जिस तरह 20 साल की उम्र में होता था। मेरे पास करने के लिए बहुत काम है और मुझे ‘चार्जशीट’ के रिलीज होने का इंतजार है।’
मैं दर्शकों की मांग के अनुसार, ‘हरे रामा हरे कृष्णा आज’ की पटकथा पर काम कर रहा हूं। देव साहब की फिल्में न केवल उनकी आधुनिक संवेदनशीलता को बयां करती थीं, बल्कि साथ ही भविष्य की एक नई इबारत भी पेश करती थीं।
वह हमेशा कहते थे कि उनकी फिल्में उनके दुनियावी नजरिए को पेश करती हैं और इसीलिए सामाजिक रूप से प्रासंगिक मुद्दों पर ही आकर बात टिकती है। उनकी फिल्मों के शीर्षक ‘अव्वल नंबर’, ‘सौ करोड़’, ‘सेंसर’, ‘मिस्टर प्राइम मिनिस्टर’ तथा ‘चार्जशीट’ इसी बात का उदाहरण है।

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

ऐसा क्यों होता है ?


ऐसा क्यों होता है?
ऐसा क्यों होता है? कभी-कभी हम किसी से कुछ कहना चाहते हैं, पर यह सोचकर चुप हो जाते हैं कि कहीं कोई हमारी बात का गलत मतलब न निकाल ले। बस हमारे दिल की बात दिल में ही रह जाती है। हां कभी कोई ऐसा भी चमत्कार हो जाता है जब हमारी बात जुबान बनकर किसी तक पहुंच जाती है और हम उस स्थिति से बच जाते हैं, जो हमारे कहने से बिगड़ भी सकती थी। हमारा दिल तो आईने की तरह बिल्‍कुल साफ है, लेकिन किसी की नजर में हम बुरे बन जाएं, यह भी हमें गंवारा नहीं। अगर वह शख्स खुद चलकर हमसे बात करता है, जो बात हमने कहनी थी, तो ऐसा लगता है जैसे हमारे मन के उपवन में फूल खिल उठे हों और हमारे दिल का बोझ एकदम हल्का हो जाता है। है न कितनी अजीब बात...हम इतने शक्तिवान होकर भी अंदर से कितने कमजोर हैं। हमारा व्यक्तित्व हमारी सबसे बड़ी पूंजी है, जिसकी वजह से यह दुनिया हमें जानती है।

सोमवार, 19 सितंबर 2011

नरेन्द्र मोदी और भाजपा की दुविधायें


अमेरिकी संसद में प्रस्तुत एक रिपोर्ट में नरेन्द्र मोदी को भाजपा के तरफ से प्रधानमत्री पद का दावेदार बताया जाना, अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाता है. यह पहली बार नहीं है जब अमेरिकी विदेशनीति और वैदेशिक मुआमलों में उसने अपने नजरिये में उलटफेर किया हो. जब-जब अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में कोई बड़ा मिसनरी बुखार पनपता है , तो अमेरिका बावला हो अत्यधिक संवेदनशील हो उठता है. तब उसे मानवधिकार, विश्व शांति और अन्य वैश्विक नियम बड़े महत्वपूर्ण नज़र आने लगते हैं. किन्तु अगले ही दृश्य में जब एक स्वस्थ माहौल बनता दिखाई देता है, तो वहीँ अमेरिका अपने राग तुरंत बदल देता है.

यह 1988 में क्यूबा के लिए उपजी हमदर्दी हो जिसके पश्चात् अमेरिकिओं द्वारा प्युर्टो रिको और फिलिप्पिन्स में बड़े उद्धोग बैठा, उनके बाज़ार पर कब्ज़ा करने का खेल शुरू हुआ. बाद में जब इसकी भर्त्सना होने लगी तो अमेरिका के पास इस कार्यवाही का कोई जवाब नहीं था. वह एक नियत समय में वहीँ करता है , जो उसे उस वक्त फायदेमंद मालूम पड़ता है. नौ-ग्यारह के हमले के बाद अमेरिका ऐसे ही पूरे विश्व के शांति के लिए संवेदनशील हो उठा. विश्व शांति की दुहाई देकर उसने मानवाधिकारों , सुरक्षा परिषद् तक की भी चिंता नहीं की और अफगानिस्तान में अपनी मनमानी करता रहा. आज विश्व के अन्य हिस्सों में हो रहे आतंकवादी घटनाओ के प्रति अमेरिका की कोई तीक्ष्ण प्रतिक्रिया नहीं सुनाई देती. मध्य एशिया में अपनी मनमानी कर लेने के बाद आज जब रॉबर्ट गेट्स यह कहते हैं
की हमारे पास एक थकी-हारी मेलेट्री के सिवा कुछ भी नहीं , तो इसे सार्वजनिक सराहना मिलती है. कुल मिलकर मोदी को लेकर अमेरिका के दृष्टिकोण में आया बदलाव उसकी पुरानी फितरत का ही एक नमूना है.

गौरतलब है कि यह वहीँ अमेरिका है जिसने मोदी को दो बार वीजा देने से इनकार कर दिया था. और जिसने मोदी पर मानवता का दुश्मनहोने तक की बात कही. आज वहीँ अमेरिका मोदी के सुशाशन और कानून व्यवस्था की दुहाई देते नहीं थक रहा. इसके पीछे दो बातों को समझना पड़ेगा. एक तो वर्तमान सरकार की लोकप्रियता में आये जबरदस्त गिरावट ने बीजेपी की स्थिति पर असर डाला है.

कमजोर ही सही पर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के कारण भाजपा को बेनिफिट ऑफ़ डाउट जरूर मिलेगा. ऐसे में भाजपा के सामने नेतृत्व की बड़ी कमी नज़र आती है . हालाँकि भाजपा अपने को प्रभावी नेतृत्व से रहित नहीं बताती. भाजपा के सामने शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र मोदी जैसे ऐसे दिग्गज नेता है, जिन्हें राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरने की जरूरत है. भाजपा की सबसे बड़ी विडम्बना यहीं रही कि उसने कभी अपने ही सिद्धांतों पर विश्वास नहीं किया. भाजपा को गाना तो राष्ट्रवाद का पसंद है पर पॉप पर झुमने से भी बाज नहीं आती. उसकी इसी दुविधा ने मतदाताओं के मन में उसे साशन का विकल्प नहीं माना.
भाजपा सरकार का विकल्प तो हो सकती है, पर विदेश निति , आतंकवाद , अमेरिकापरस्ती और बाजारवाद जैसी मुद्दों पर वह कांग्रेस से इतर कोई अलग निति या तो रखती नहीं है या उसे ज़ाहिर नहीं कर पाती.
अमेरिका अब अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के गिरते ग्राफ को समझ चुका है. अन्ना आन्दोलन ने कांग्रेस का बेडा गर्क कर दिया. कहाँ कांग्रेस ने सोचा था कि सारी गलातिओं का ठीकरा मनमोहन के सर फोड़ कर राहूल भैया को नया कर्णधार बता अगला चुनाव भी जीत जायेंगे. पर राहुल का बचपना इस आन्दोलन के दौरान साफ़ उभर कर आ गया . बेहतर होता की राहुल अन्ना के साथ मंच पर हाज़िर हो जाते तो कम से कम जनता राहूल को सरकार से अलग अपने साथ मानती.


दुसरे, विश्व आर्थिक परिदृश्य में एक और मंदी का दौर शुरू होने को है . और यह मंदी का केंद्र इस बार यूरोप का बाज़ार होगा. अमेरिका की अधिकांस कम्पनियों द्वारा यूरोपीय बाज़ार के घाटे ने विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है. ज़ाहिर है यूरोप से अपना बोरिया बिस्तर समेटने वाली यह कम्पनियाँ भारत और ब्राजील जैसे नए बाज़ार की और रुख करेंगी. ऐसे में अमेरिका के लिए गुजरात से बेहतर और कोई भी स्टेट नहीं हो सकता. अब गुजरात मोदी के हाथ में है तो अमेरिका का यह रवैया तो आना ही था.

ऐसे में भाजपा के सामने यह सवाल यह आता है कि वह नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रीय परिदृश्य पर भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने का सहस जुटा पाती है?

लेखक : कनिष्क कश्यप

लेखक न्यू मीडिया विशेषज्ञ है.

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

जेपी और अन्ना आन्दोलन में फर्क

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ईमानदार थे, और अन्ना हजारे की छवि भी ईमानदार है। परन्तु, दोनों आंदोलनों में बड़ा फर्क है। जेपी का आंदोलन संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए था, जबकि अन्ना का एक सूत्री मुद्दा भ्रष्टाचार है। वैसे, भ्रष्टाचार का विरोध भी जेपी आंदोलन का एक हिस्सा था। भ्रष्टाचार के सभी पहलुओं-सामाजिक, आर्थिक, नैतिक आदि, पर उस आंदोलन में जोर रहा। जेपी का जीवन राजनीतिक, सामाजिक एवं 42 के आंदोलन के अनुभवों से जुड़ा रहा। उनका कैनवास बहुत बड़ा था। प्रधानमंत्री के कद के सामने उनका व्यक्तित्व किसी तरह कम नहीं था। जेपी संसदीय व्यवस्था में बहुत जोर देते थे। पूरे आंदोलन के दौरान उन्होंने संसदीय व्यवस्था को और मजबूती प्रदान करने का ही काम किया। बड़ी बात तो यह है उनका आंदोलन किसी ब्लू-प्रिंट पर आधारित नहीं था। जेपी आंदोलन खुद परिस्थिति के मुताबिक अपनी धारा तय करता रहा। जेपी के साथ भीड़ नहीं थी। उनके साथ प्रतिबद्ध लोग थे।

उनके अनुसार बड़ी संख्या से किसी आंदोलन में क्षणिक लाभ लाभ हो सकता है, परन्तु जज्बात को समाप्त होने में देर भी नहीं लगती। भीड़ दिशा नहीं तय कर सकती। प्रतिबद्ध कार्यकर्ता ही इस काम में सहयोग दे सकते हैं। वैसे, यह बड़ी बात है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना बड़ा आंदोलन हो रहा है। भ्रष्टाचार से पूरा देश त्रस्त है, और इसे मिटाये बिना देश तरक्की भी नहीं कर सकता।

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

बांटो और राज करो !!!!!!!!!!!!!!

कांग्रेस शायद सोच रही है कि भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को विभाजित कर और लोकपाल बिल के अपने प्रारूप को सदन में पेश कर उसने भ्रष्टाचार विरोधी माहौल की हवा निकाल दी है। लेकिन उसकी यह खतरनाक चाल दीर्घावधि में उसी को नुकसान पहुंचाएगी। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों की विश्वसनीयता खंडित करने के लिए उसने कई चालें चलीं। सिविल सोसाइटी की वैधता को उसने इस आधार पर चुनौती दी कि नागरिक समाज के ये स्वयंभू प्रतिनिधि चुने हुए जनप्रतिनिधियों को कमजोर कर रहे हैं। भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के प्रमुख नेताओं प्रशांत भूषण, शांति भूषण और अरविंद केजरीवाल के व्यक्तिगत साख को उसने जहां चुनौती दी, वहीं बाबा रामदेव को अर्द्धसत्य और अतिशयोक्तिपूर्ण बयान के आधार पर कमजोर करने की कोशिश की। इसका संदेश यह निकलता है कि अगर सभी चोर हैं, तो जांचे-परखे हुए कांग्रेसी चोरों का ही साथ देना चाहिए।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस के खिलाफ भाजपा और संघ द्वारा प्रेरित सांप्रदायिक साजिश के रूप में पेश कर और राष्ट्र विरोधी बताकर चुनौती दी गई। दिग्विजय सिंह, जयंती नटराजन और मनीष तिवारी जैसे कांग्रेस के निष्ठावान समर्थक समवेत स्वर में आरोप लगा रहे थे कि बाबा रामदेव और अन्ना हजारे संघ और भाजपा के राजनीतिक औजार हैं। शबनम हाशमी जैसी वाम समर्थक कांग्रेसी ने तो एक कदम आगे बढ़कर रामलीला मैदान में हुई कार्रवाई को उचित ठहराते हुए कहा कि पुलिस को पक्की सूचना थी कि संघ और विहिप का इरादा पंडाल में आग लगाकर वहां उपस्थित भीड़ को जिंदा जलाना था, ताकि गोधरा जैसी हिंसा पूरे देश में फैल जाए!

यह पहला अवसर नहीं है, जब किसी सत्तारूढ़ दल ने अपने कुशासन के खिलाफ बढ़ते विरोध को दबाने के लिए ऐसा आतंक फैलाया है। रामलीला मैदान में पुलिसिया दमन को कोई दिशाहीन और भयभीत सरकार की किंकर्तव्यविमूढ़ प्रतिक्रिया मान सकता है, लेकिन मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने की सिलसिलेवार कोशिश करते हुए हिंदू-मुसलिम रिश्ते को जिस तरह दूषित किया गया, वह सचमुच भयावह है। सवाल यह है कि बल प्रयोग करने के बजाय पुलिस ने बाबा रामदेव और उनके अनुयायियों को चेतावनी क्यों नहीं दी। क्या जिम्मेदार सरकारें खतरों का सामना कर रहे लोगों को पीटती हैं? सरकार ने शायद यह भ्रामक धारणा बना ली थी कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को संघ या भाजपा की करतूत बताते ही धर्मनिरपेक्ष और सभ्य लोग इस आंदोलन की निंदा करेंगे और अन्ना व रामदेव को समर्थन देना बंद कर देंगे।

उल्लेखनीय है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने लोकपाल बिल पर समर्थन जुटाने के लिए सांप्रदायिक अपील नहीं की। जंतर-मंतर और रामलीला मैदान पर विभिन्न धर्मों, जातियों के लोग मौजूद थे। यहां तक कि रामलीला मैदान पर हुई कार्रवाई के बाद कायरों की तरह भागने के बावजूद बाबा रामदेव ने उस कार्रवाई को हिंदुओं और संत समाज पर हमला नहीं बताया। इसके विपरीत धर्मनिरपेक्ष मानी जाने वाली कांग्रेस लगातार इस मुहिम में सांप्रदायिक जहर घोलती रही। उसका व्यवहार पिछली शताब्दी के अस्सी के दशक में पंजाब के किसानों के आंदोलन को दबाने के इंदिरा गांधी के आचरण से ज्यादा अलग नहीं है। तब उन्होंने किसानों के आंदोलन को कुचलने के लिए भिंडरांवाले को खड़ा कर अकाली दल के उदारवादी नेतृत्व को खत्म किया था। पूरे राष्ट्र ने किसानों के धर्मनिरपेक्ष आंदोलन को कांग्रेस द्वारा सांप्रदायिक, आतंकवादी आंदोलन में बदलने का भारी मूल्य चुकाया है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में सांप्रदायिक जहर घोलकर कांग्रेस फिर वैसा ही कर रही है, जिसका उद्देश्य मुसलिम मतदाताओं और वामपंथियों को अपने पाले में करना है।

टीम अन्ना को संघ से प्रेरित बताने के लिए दिग्विजय सिंह ने यह बेतुका तर्क दिया था कि जिस मंच पर अन्ना हजारे अनशन कर रहे थे, उसकी पृष्ठभूमि में भारत माता की तसवीर लगी थी और वहां भारत माता की जय और वंदे मातरम् के नारे बार-बार लगाए गए। भारत माता स्वतंत्रता आंदोलन की आराध्य मानी जाती हैं। गांधी और नेहरू समेत लगभग सभी कांग्रेसी नेताओं ने भारत माता के चित्र का उपयोग यह संदेश देने के लिए किया कि भारत माता बिना किसी भेदभाव के समान रूप से अपने सभी बच्चों को प्यार करती हैं, चाहे वह हिंदू, मुसलिम सिख, ईसाई हो या ऊंची या नीची जाति। इसलिए भारत माता समग्र राष्ट्रवाद, समानता और भाइचारे का प्रतीक बन गईं। इसी तरह वंदे मातरम् जय हिंद की तरह स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रचलित नारा था।

दरअसल कई सांप्रदायिक दंगों में अपनी भूमिका छिपाने की हताश कोशिश में कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन के कई सकारात्मक सांस्कृतिक प्रतीक भाजपा को सौंप दिया है। भगवा रंग महान कारणों से बलिदान और शहादत से जुड़ा है। यह हिंदू और सिख धर्म की आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है। भगत सिंह ने ‘बसंती चोला’ रंगने का गीत गाया था। लेकिन अब कांग्रेस ने इसे भाजपा की सांप्रदायिक आलोचना का पर्याय बना दिया है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को तोड़ने और कमजोर करने तथा बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के बीच शरारतपूर्ण ढंग से फूट डालने के लिए भले ही कोई कांग्रेस को माफ कर दे, लेकिन भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक जहर घोलने के लिए इतिहास उसे कभी माफ नहीं करेगा।

सोमवार, 30 मई 2011

राष्ट्र प्रेमी युवाओं से आह्वान !!!!!!!

(१)
उनका कर्ज चुकाने को,
अपना फर्ज निभाने को।
नया ख़ून तैयार खड़ा है,
राजनीति मेँ आने को॥

(२)
जागी अब तरुणाई है,
देश ने ली अंगडाई है।
नई उमर की नई फसल,
अब राजनीति मेँ आई है॥

(३)
जण गण मन अधिनायक,
जो है भाग्य विधाता।
लोकतंत्र के सिंहासन का,
असली मालिक मतदाता॥

(४)
किसी वाद पर दो मत ध्यान,
राष्ट्रहित मेँ दो मतदान॥

(५)
जाती धर्म और भाषावाद,
करना है इनका प्रतिवाद॥

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

कांग्रेस और भ्रष्टाचार !

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश आंदोलित है और जन लोकपाल को लेकर उत्साहित लेकिन, कांग्रेस इस पूरे मामले को किनारे लगा देना चाह रही है।कांग्रेस इस अभियान पर ध्यान न देकर उल्टे अन्ना हजारे की टीम पर हमले में जुटी है ताकि लोगों का ध्यान मूल विषय से हटाया जा सके। भ्रष्टाचार को लेकर पूरे देश में माहौल कांग्रेस के खिलाफ है और कांग्रेस उन्हीं लोगों को लक्ष्य कर रही है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। कांग्रेस भ्रष्टाचार की गंगोत्री है और अपने शुरूआती दौर में ही यह पार्टी इसके लिए खासी बदनाम हो चुकी थी।1937 में विभिन्न राज्यों की कांग्रेस सरकारों के भ्रष्टाचार के इतने किस्से सामने आये कि महात्मा गांधी को दुखी होकर पार्टी को दफनाने तक की बात कह देनी पड़ी। कश्मीर युद्ध के समय जीप घोटाला हुआ। सेकेण्ड हैंड जीप खरीदी गयी और वे सब बेकार निकलीं।
लोकपाल का सुझाव पहली सरकार के वित्तमंत्री सीडी देशमुख ने दिया और डा. राजेन्द्र प्रसाद ने उसका समर्थन किया। तब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसे गलत अर्थ में ले लिया था। इसे उन्होंने अपने खिलाफ अभियान मान लिया। नेहरू ने लोकपाल को मंत्रियों का हौसला तोड़ने वाला बताया। उस समय लोकपाल का गठन हो गया होता तो देश की वह तस्वीर न होती जो आज है।

बुधवार, 12 जनवरी 2011

युवा जग रहे है ?

उत्तर प्रदेश के कुछ विश्वविद्यालयों में समाजवादी युवजन सभा और एबीवीपी ने जिस तरीके से कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का विरोध किया, उसे सही नहीं ठहराया जा सकता। जनतंत्र में असहमति व्यक्त करने का अधिकार सब को है, लेकिन इस नाम पर अराजकता फैलाना गलत है।

वैसे यूपी में राहुल गांधी के प्रति छात्र संगठनों का यह रवैया पहली बार देखा जा रहा है। किसी भी छात्र संगठन ने उनका इस तरह से उग्र विरोध करने का साहस पहले नहीं दिखाया था। तो क्या यह माना जाए कि राहुल गांधी की लोकप्रियता का ग्राफ कुछ गिरा है? संभव है युवाओं के मन में राहुल के प्रति पैदा हो रहे असंतोष ने ही इन छात्र संगठनों का हौसला बढ़ाया हो।

दरअसल राहुल अब उस दौर से आगे निकल आए हैं, जब वह एक शो-पीस की तरह देखे जाते थे। युवा उन्हें सुनने से ज्यादा देखने में रुचि दिखाते थे। राहुल उनके लिए राजनेता से ज्यादा एक मॉडल थे, इसलिए उनकी सियासी बातों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता था। लेकिन धीरे-धीरे राहुल ने राजनीति की जमीन पर अपने पैर मजबूती से जमा लिए हैं। उनकी पार्टी ने भी उन पर पहले से ज्यादा भरोसा करना शुरू कर दिया है और अब वह कांग्रेस का चेहरा बनते जा रहे हैं। ऐसे में उनसे लोगों की अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं। अब यह उम्मीद की जाती है कि वह जो कहें उस पर अमल भी करें।

अब जनता उन्हें किसी तरह की रियायत नहीं देना चाहती। वह उनके एक-एक शब्द का हिसाब रखने लगी है। राहुल काफी समय से आम छात्रों से कहते आ रहे हैं कि वे राजनीति में उतरें, लेकिन राहुल अपनी पार्टी में सामान्य पृष्ठभूमि वाले युवाओं को स्थान दिलाने की कोई खास पहल करते नहीं नजर आ रहे। युवा देख रहे हैं कि कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक वैसे लोगों की भरमार है जो किसी न किसी वरिष्ठ नेता, अधिकारी या उद्योगपति के परिवार से ताल्लुक रखते हैं।

आज केंद्रीय मंत्रिमंडल में कहने को तो कई युवा हैं, पर उनमें से ज्यादातर पूर्व मंत्रियों या राजनेताओं की संतानें हैं। फिर शिक्षा और रोजी-रोजगार को लेकर यूपीए सरकार की ऐसी कोई विशेष नीति भी नहीं दिखाई देती, जो व्यापक छात्र वर्ग में नई उम्मीद जगा सके। अगर राहुल गांधी युवाओं को अपनी पार्टी से जोड़ना चाहते हैं तो उन्हें यंग जेनरेशन को कुछ ठोस देना होगा। युवाओं को व्यक्तित्व के करिश्मे और स्टंट से बहुत दिनों तक भरमाया नहीं जा सकता।

सोमवार, 3 जनवरी 2011

पर्यावरण के बहाने उद्योगों को न आने देने की साजिश

नयी औद्योगिक इकाइयों को बिहार में लाने के उद्देश्य से सरकार के सकारात्मक पहल पर बड़ी संख्या में उद्यमियों ने बिहार का रुख किया है। पर बिहार में उद्यमियों के आने की तैयारी माफिया तत्वों को बर्दाश्त नहीं हो रही है। उनके सिंडिकेट ने काफी तेज गति से मिथ्यापूर्ण व गलत हथकंडे अपनाकर बिहार आ रहे उद्यमियों की राह में रोड़ा अटकाना शुरू कर दिया है। हाल ही में एक मामला बिहार में सफेद एस्बेस्ट्स चादर की फैक्ट्री लगाने को आगे बढ़ी कंपनी बालमुकुंद सीमेंट का इस परिपेक्ष्य में सामने आया है।
पर्यावरण के बहाने इस कंपनी के खिलाफ माफिया तत्वों ने आंदोलन शुरू किया है। जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि इस कंपनी को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के साथ-साथ राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद की सहमति है। दरअसल बिहार में सफेद एस्बेस्ट्स की चादर का वार्षिक टर्नओवर 250 करोड़ रुपये का है। वर्तमान में इसकी आपूर्ति पश्चिम बंगाल और थोड़ी बहुत उप्र की कंपनियों द्वारा की जाती है। इन राज्यों में स्थित कंपनियों के संचालक यह नहीं चाहते कि इस क्षेत्र में उनका आधिपत्य यूं कहें एकाधिकार खत्म हो जाये। इस बात को ध्यान में रख इनके द्वारा इस क्षेत्र में बिहार में अपना उद्योग स्थापित करने को आगे आये बिहारी उद्यमियों के खिलाफ आंदोलन शुरु करा दिया गया है।
बालमुकुंद सीमेंट ने बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेकर फरवरी 2010 में मुजफ्फरपुर जिले के मड़वन में अपनी सफेद एस्बेस्टस की परियोजना पर काम शुरू किया। इसके लिए कंपनी ने अपने स्तर से जमीन का क्रय भी किया। आरंभ के सात-आठ महीने तक कंपनी का कोई विरोध नहीं हुआ पर बाद में असमाजिक तत्वों ने एक छात्र संगठन की आड़ में पर्यावरण की बात कहते हुए आंदोलन शुरू कर दिया। यही नहीं रंगदारी मांगे जाने लगी और फिर फैक्ट्री परिसर में घुसकर मारपीट और लूटपाट की घटना को भी अंजाम दिया गया। स्थानीय थाने में इसकी प्राथमिकी भी दर्ज है। अब नया पेंच यह है कि पर्यावरण के नाम पर फिर से भ्रमित करने वाले आंदोलन की तैयारी चल रही है।
इस बाबत बालमुकुंद का कहना है कि सफेद एस्बेस्ट्स फैक्ट्री शुरू करने की अनुमति वन एवं पर्यावरण मंत्रालय देता है। चीन के बाद भारत में सबसे अधिक 50 एस्बेस्ट्स की फैक्ट्री है। भारत में इसका कारोबार 4500 करोड़ रुपये का है। यह बिल्कुल ही सुरक्षित है। बिहार में इस तरह की तीन फैक्ट्रियों को शुरू किए जाने को ले वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने क्लियरेंस दिया हुआ है। आंदोलन कर रहे माफिया तत्व का जुड़ाव पश्चिम बंगाल से है। बालमुकुंद की मड़वन में खुल रही फैक्ट्री का विरोध इसलिए हो रहा है कि इनकी कोई भी इकाई पश्चिम बंगाल में नहीं है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत के ग्यारह वैज्ञानिकों, प्रोफेसरों व डाक्टरों की कमेटी बनाकर प्रोजेक्ट क्लियरेंस देता है। 140 यूएनओ देशों में इस पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है।
बालमुकुंद की योजना मार्च 2011 तक उत्पादन आरंभ करने की है। ऐसे में कंपनी की योजना कहां तक आगे बढ़ेगी यह आने वाला समय ही बता पायेगा।

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अनुभवजन्य और वैचारिक रूप से दो दृष्टिकोण हैं जिन्हें आमतौर पर एक शोध आयोजित करते समय नियोजित किया जाता है। संकल्पनात्मक को शोधकर्ताओं के रू...