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विज्ञापन का मायाजाल

विज्ञापन की दुनिया काफी मायावी है। बाजारीकरण के मौजूदा दौर में इसकी महत्ता में दिनोंदिन इजाफा ही होता जा रहा है। एक दौर वह भी था जब सूचना और विज्ञापन में कोई खास अन्तर नहीं था।

यह भी कहा जा सकता है कि विज्ञापन को सूचना देने का जरिया माना जाता था। पर, यह अवधारणा काफी पहले ही खंडित हो चुकी है। आज तो हालात ऐसे है कि विज्ञापन का पूरा करोबार ‘जो दिखता है वही बिकता है’ के तर्ज पर चल रहा है। मांग और आपूर्ति की अवधारणा को तोड़ते हुए अब मांग पैदा करने पर जोर है। आज विज्ञापन का मूल उद्देश्य सूचना प्रदान करने की बजाए उत्पाद विशेष के लिए बाजार तैयार करना बन कर रह गया है।

विज्ञापन का इतिहास भी काफी पुराना है। मौजूदा रूप तक पहुंचने के लिए इसने लंबा सफर तय किया है। वैश्विक स्तर पर अगर देखा जाए तो विज्ञापन की शुरूआत के साक्ष्य 550 ईसा पूर्व से ही मिलते हैं। भारत में भी विज्ञापन की शुरुआत सदियों पहले हुई है। यह बात और है कि समय के साथ इसके तौर-तरीके बदलते गए।

बहरहाल, अगर ऐतिहासिक साक्ष्यों को खंगाला जाए तो पता चलता है कि शुरूआती दौर में विज्ञापन, मिश्र, यूनान और रोम में प्रचलित रहा है। मिश्र में विज्ञापन …