सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

आइये जाने कमलेश्वर जी को !!

कमलेश्वर (6 जनवरी 1932-27 जनवरी 2007) हिन्दी लेखक कमलेश्वर बीसवीं शती के सबसे सशक्त लेखकों में से एक समझे जाते हैं। कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, फिल्म पटकथा जैसी अनेक विधाओं में उन्होंने अपनी लेखन प्रतिभा का परिचय दिया। कमलेश्वर का लेखन केवल गंभीर साहित्य से ही जुड़ा नहीं रहा बल्कि उनके लेखन के कई तरह के रंग देखने को मिलते हैं। उनका उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' हो या फिर भारतीय राजनीति का एक चेहरा दिखाती फ़िल्म 'आंधी' हो, कमलेश्वर का काम एक मानक के तौर पर देखा जाता रहा है। उन्होंने मुंबई में जो टीवी पत्रकारिता की, वो बेहद मायने रखती है। ‘कामगार विश्व’ नाम के कार्यक्रम में उन्होंने ग़रीबों, मज़दूरों की पीड़ा-उनकी दुनिया को अपनी आवाज दी।


कमलेश्वर का जन्म 6 जनवरी 1932 को उत्तरप्रदेश के मैनपुरी ज़िले में हुआ। उन्होंने 1954 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया। उन्होंने फिल्मों के लिए पटकथाएँ तो लिखी ही, उनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी। `आंधी', 'मौसम (फिल्म)', 'सारा आकाश', 'रजनीगंधा', 'छोटी सी बात', 'मिस्टर नटवरलाल', 'सौतन', 'लैला', 'रामबलराम' की पटकथाएँ उनकी कलम से ही लिखी गईं थीं। लोकप्रिय टीवी सीरियल 'चन्द्रकांता' के अलावा 'दर्पण' और 'एक कहानी' जैसे धारावाहिकों की पटकथा लिखने वाले भी कमलेश्वर ही थे। उन्होंने कई वृतचित्रों और कार्याक्रमों का निर्देशन भी किया।


1995 में कमलेश्वर को `पद्मभूषण' से नवाजा गया और 2003 में उन्हें 'कितने पाकिस्तान'(उपन्यास) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे `सारिका' `धर्मयुग', `जागरण' और `दैनिक भास्कर' जैसे प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं के संपादक भी रहे। उन्होंने दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक जैसा महत्वपूर्ण दायित्व भी निभाया। कमलेश्वर ने अपने 75 साल के जीवन में 12 उपन्यास, 17 कहानी संग्रह, और क़रीब 100 फ़िल्मों की पटकथाएँ लिखीं।


27 जनवरी 2007 को उनका निधन हो गया।

कृतियाँ
उपन्यास -

एक सड़क सत्तावन गलियाँ / कमलेश्वर
तीसरा आदमी / कमलेश्वर
डाक बंगला / कमलेश्वर
समुद्र में खोया हुआ आदमी / कमलेश्वर
काली आँधी / कमलेश्वर
आगामी अतीत / कमलेश्वर
सुबह...दोपहर...शाम / कमलेश्वर
रेगिस्तान / कमलेश्वर
लौटे हुए मुसाफ़िर / कमलेश्वर
वही बात / कमलेश्वर
एक और चंद्रकांता / कमलेश्वर
कितने पाकिस्तान / कमलेश्वर
पटकथा एवं संवाद

कमलेश्वर ने 99 फ़िल्मों के संवाद, कहानी या पटकथा लेखन का काम किया। कुछ प्रसिद्ध फ़िल्मों के नाम हैं-

1. सौतन की बेटी(1989)-संवाद
2. लैला(1984)- संवाद, पटकथा
3. यह देश (1984) -संवाद
4. रंग बिरंगी(1983) -कहानी
5. सौतन(1983)- संवाद
6. साजन की सहेली(1981)- संवाद, पटकथा
7. राम बलराम (1980)- संवाद, पटकथा
8. मौसम(1975)- कहानी
9. आंधी (1975)- उपन्यास
संपादन

अपने जीवनकाल में अलग-अलग समय पर उन्होंने सात पत्रिकाओँ का संपादन किया -

विहान-पत्रिका (1954)
नई कहानियाँ-पत्रिका (1958-66)
सारिका-पत्रिका (1967-78)
कथायात्रा-पत्रिका (1978-79)
गंगा-पत्रिका(1984-88)
इंगित-पत्रिका (1961-68)
श्रीवर्षा-पत्रिका (1979-80)
अखबारों में भूमिका

वे हिन्दी दैनिक `दैनिक जागरण' में 1990 से 1992 तक तथा `दैनिक भास्कर' में १९९७ से लगातार स्तंभलेखन का काम करते रहे।'

कहानियाँ

कमलेश्वर ने तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनकी कुछ प्रसिद्ध कहानियाँ हैं -

राजा निरबंसिया / कमलेश्वर
सांस का दरिया / कमलेश्वर
नीली झील / कमलेश्वर
तलाश / कमलेश्वर
बयान / कमलेश्वर
नागमणि / कमलेश्वर
अपना एकांत / कमलेश्वर
आसक्ति / कमलेश्वर
जिंदामुर्दे / कमलेश्वर
जॉर्ज पंचम की नाक / कमलेश्वर
मुर्दों की दुनिया / कमलेश्वर
कस्बे का आदमी / कमलेश्वर
स्मारक / कमलेश्वर
नाटक

उन्होंने तीन नाटक लिखे -

अधूरी आवाज / कमलेश्वर
रेत पर लिखे नाम / कमलेश्वर
हिंदोस्ता हमारा / कमलेश्वर

भारतीय फिल्म पटकथा

हर फिल्म की एक पटकथा होती है, इसे ही स्क्रिप्ट और स्क्रीनप्ले भी कहते हैं। पटकथा में दृश्य, संवाद, परिवेश और शूटिंग के निर्देश होते हैं। शूटिंग आरंभ करने से पहले निर्देशक अपनी स्क्रिप्ट पूरी करता है। अगर वह स्वयं लेखक नहीं हो, तो किसी दूसरे लेखक की मदद से यह काम संपन्न करता है। भारतीय परिवेश में कहानी, पटकथा और संवाद से स्क्रिप्ट पूरी होती है। केवल भारतीय फिल्मों में ही संवाद लेखक की अलग कैटगरी होती है। यहां कहानी के मूलाधार पर पटकथा लिखी जाती है। कहानी को दृश्यों में बांटकर ऐसा क्रम दिया जाता है कि कहानी आगे बढ़ती दिखे और कोई व्यक्तिक्रम न पैदा हो। शूटिंग के लिए आवश्यक नहीं है कि उसी क्रम को बरकरार रखा जाए, लेकिन एडीटिंग टेबल पर स्क्रिप्ट के मुताबिक ही फिर से क्रम दिया जाता है। उसके बाद उसमें ध्वनि, संगीत आदि जोड़कर दृश्यों के प्रभाव को बढ़ाया जाता है। पटकथा लेखन एक तरह से सृजनात्मक लेखन है, जो किसी भी फिल्म के लिए अति आवश्यक है। इस लेखन को साहित्य में शामिल नहीं किया जाता। ऐसी धारणा है कि पटकथा साहित्य नहीं है। हिंदी फिल्मों के सौ सालों के इतिहास में कुछ ही फिल्मों की पटकथा पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो सकी है। गुलजार, राजेन्द्र सिंह बेदी और कमलेश्वर की फिल्मों की पटकथाएं एक समय न केवल प्रकाशित हुई, बल्कि बिकीं भी, लेकिन फिर भी उन्हें साहित्य का दर्जा हासिल नहीं हुआ! साहित्य के पंडितों के मुताबिक पटकथा शुद्ध शुद्ध रूप से व्यावसायिक लेखन है और किसी फिल्म के लिए ही उसे लेखक लिखते हैं, इसलिए उसमें साहित्य की मौलिकता, पवित्रता और सृजनात्मकता नहीं रहती। साहित्य की सभी विधाओं की तरह पटकथा लेखक की स्वाभाविक और नैसर्गिक अभिव्यक्ति नहीं है, इसलिए उसे साहित्य नहीं माना जा सकता। फिल्मों के लेखक और साहित्यकारों के बीच इस मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाई है। दरअसल, फिल्मों के लेखक यह मानते हैं कि उनका लेखन किसी प्रकार से साहित्यिक लेखन से कम नहीं है। उसमें भी मौलिकता होती है और वह फिल्म के रूप में अपने दर्शकों को साहित्य के समान दृश्यात्मक आनंद देती है।

मशहूर फिल्म लेखक और शायर जावेद अख्तर कहते हैं कि पटकथा के प्रति प्रकाशकों और साहित्यकारों को अपना दुराग्रह छोड़ना चाहिए! उनकी राय में हिंदी में ऐसी कई फिल्में बनी हैं, जिनकी पटकथा में साहित्यिक संवेदनाएं हैं और इसीलिए उन्हें पुस्तक के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। वे अपने तर्क का विस्तार नाटकों तक करते हैं। वे कहते हैं कि नाटकों का मंचन होता है। उसमें भी अभिनेता, संगीत और अन्य कला माध्यमों का उपयोग होता है। वह भी दर्शकों के मनोरंजन के लिए ही रचा जाता है। वे पूछते हैं कि अगर नाटक साहित्यिक विधा है, तो फिर पटकथा से परहेज क्यों है? जावेद अख्तर चाहते हैं कि श्रेष्ठ हिंदी फिल्मों की पटकथा प्रकाशित होनी चाहिए। मराठी के नाटककार और होली और पार्टी जैसी फिल्मों के लेखक महेश एलकुंचवार स्पष्ट कहते हैं कि पटकथा को साहित्यिक दर्जा नहीं दिया जा सकता। पटकथा स्वयं पूर्ण रचना नहीं होती। प्रकाश और ध्वनि के साथ मिलकर वह फिल्म का रूप लेती है। अगर पटकथा प्रकाशित की जाएगी, तो उसमें सहायक साधनों को नहीं रखा जा सकेगा। प्रकाश और ध्वनि के अभाव में पटकथा का वही प्रभाव नहीं रहेगा, जो फिल्म देखते समय रहा होगा। साहित्य के पंडित और आलोचकों के पास और भी तर्क हैं। पटकथा के प्रभाव को भारतीय दर्शक अच्छी तरह समझते हैं। फिल्म प्रभावशाली माध्यम है और इसका असर व्यापक होता है। कई बार फिल्मों के रूप में आने के बाद साहित्यिक विधाएं ज्यादा लोकप्रिय हुई हैं। ताजा उदाहरण फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर है। इसकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए प्रकाशक ने उपन्यास का मूल नाम क्यू एंड ए बदल दिया है। साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे, जिन्हें फिल्मों की वजह से ज्यादा पाठक मिले। इस लिहाज से अगर पटकथा को स्वतंत्र कृति के रूप में प्रकाशित किया जाए, तो निश्चित ही पाठक फिल्म का साहित्यिक आनंद उठा सकेंगे। मुमकिन है, कुछ दशक बाद उन्हें साहित्य का दर्जा भी हासिल हो जाए!

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

हिंदू राजनीति का अभाव!!!!!!!!!!!!1

पश्चिम बंगाल के छोटे से शहर देगागा में इस वर्ष दुर्गा पूजा नहीं मनाई गई, क्योंकि तृणमूल काग्रेस से जुड़े एक दबंग मुस्लिम नेता ने हिंदू आबादी पर सुनियोजित हिंसा की। इस पर सत्ताधारी लोग और मीडिया, दोनों लगभग मौन रहे। स्थानीय हिंदुओं को भय है कि उन पर हमले करके आतंकित कर उन्हें वहां से खदेड़ भगाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। असम और बंगाल में कई स्थानों पर यह पहले ही हो चुका है, इसलिए इस जनसाख्यिकी आक्रमण को पहचानने में वे भूल नहीं कर सकते। वस्तुत: ऐसी घटनाओं पर राजनीतिक मौन ही इसके वास्तविक चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण है।

क्या किसी शहर में मुस्लिमों द्वारा किसी बात पर विरोध-स्वरूप ईद न मनाना भारतीय मीडिया के लिए उपेक्षणीय घटना हो सकती थी। चुनी हुई चुप्पी और चुना हुआ शोर-शराबा अब तुरंत बता देता है कि किसी साप्रदायिक हिंसा का चरित्र क्या है। पीड़ित कौन है, उत्पीड़क कौन। जब भी हिंदू जनता हिंसा और अतिक्रमण का शिकार होती है, राजनीतिक वर्ग और अंग्रेजी मीडिया मानो किसी दुरभिसंधि के अंतर्गत मौन हो जाता है। यह आसानी से इसलिए संभव होता है, क्योंकि भारत में कोई संगठित हिंदू राजनीतिक समूह नहीं है। हिंदू भावनाएं, दुख या चाह को व्यक्त करने वाला कोई घोषित या अघोषित संगठन भी नहीं है।

कुछ लोग भाजपा को हिंदू राजनीति से जोड़ते हैं, किंतु इस पर हिंदुत्व थोपा हुआ है। स्वयं भाजपा ने कभी हिंदू चिंता को अपनी टेक घोषित नहीं किया। इसने पिछला लोकसभा चुनाव भी विकास और मजबूती के नारे पर ही लड़ा था। गुजरात, मध्य प्रदेश या बिहार में भी वह हिंदू चिंता की अभिव्यक्ति से बचती है। मुस्लिम संगठन ठीक उलटा करते हैं। इसलिए भाजपा पर हिंदू साप्रदायिक होने या हिंदुत्व से भटकने के दोनों आरोप गलत हैं, जो उसके विरोधी या समर्थक लगाते हैं। विरोधी इसलिए, क्योंकि किसी न किसी को हिंदू-साप्रदायिक कहना उनकी जरूरत है ताकि वे मुस्लिम वोट-बैंक के सामने अपना हाथ फैलाएं। समर्थक भाजपा पर भटकने का आरोप इसलिए लगाते हैं, क्योंकि हिंदू चिंता को उठाने वाला कोई दल न होने के कारण वे भाजपा पर ही अपनी आशाएं लगा बैठते हैं। भाजपा इन आशाओं का विरोध नहीं करती, पर उसने कभी इन आशाओं को पूरा करने का वचन भी नहीं दिया। राम मंदिर बनाने की बात या धारा 370 हटाने की आवश्यकता बताना-हिंदू राजनीति नहीं है। अयोध्या में ताला खुलवाकर पूजा की शुरुआत तो राजीव गांधी ने ही की थी। इसी प्रकार धारा 370 के अस्थायी होने की बात तो संविधान में काग्रेस ने ही लिखी थी।

अत: इक्का-दुक्का भाजपा नेताओं द्वारा कभी-कधार कुछ कहना हिंदू राजनीति नहीं है। यह कभी-कभार हिंदू भावनाओं को उभारती या उपयोग करती है, पर यह नीति भारत में प्रचलित हिंदू-विरोधी सेक्युलरवाद से पार नहीं पा सकती। उसी तरह वह हिंदुत्व भी अकर्मक है जिसमें खुल कर सामने आने का साहस नहीं, जिसमें हर हाल में सही बात कहने की दृढ़ता न हो, जो प्रबल विरोधियों के समक्ष सच कहने से कतराता हो, जिसके कार्यकर्ता पहले अपना निजी स्वार्थ साधने के लोभ में डूबे रहते है। वह भी व्यर्थ हिंदुत्व ही है जो केवल सत्ता पाने अथवा पहले सत्ता में आने के लिए हिंदू भावनाओं का उपयोग करने का प्रयास करता हो। यह सब छद्म हिंदुत्व है जो यहां प्रचलित सेक्युलरवाद से हारता रहा है, हारता रहेगा। उपर्युक्त भाव और रूप किसी दल या नेता की विशेषताएं नहीं हैं। यह विभिन्न संगठनों और विभिन्न नेताओं-कार्यकर्ताओं की विशेषताएं हैं। यह अपने स्वभाव से ही इतना दुर्बल है कि शिकायतें करने और दूसरों पर निर्भर रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकता, इसीलिए छद्म हिंदुत्व, शिकायती हिंदुत्व और हिंदू राजनीति के अभाव में वस्तुत: कोई भेद नहीं है। अत: इस गंभीर सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि जिस तरह मुस्लिम राजनीति एक स्थापित शक्ति है, उसी तरह किसी हिंदू राजनीति का अस्तित्व ही नहीं है। हिंदू भावनाओं वाले कुछ नेता-कार्यकर्ता अनेक दलों में हैं, पर हिंदू भावना एक बात है और हिंदू राजनीति को स्वर देना बिलकुल दूसरी बात।

हिंदू राजनीति का अभाव!!!!!!!!!!!!1

पश्चिम बंगाल के छोटे से शहर देगागा में इस वर्ष दुर्गा पूजा नहीं मनाई गई, क्योंकि तृणमूल काग्रेस से जुड़े एक दबंग मुस्लिम नेता ने हिंदू आबादी पर सुनियोजित हिंसा की। इस पर सत्ताधारी लोग और मीडिया, दोनों लगभग मौन रहे। स्थानीय हिंदुओं को भय है कि उन पर हमले करके आतंकित कर उन्हें वहां से खदेड़ भगाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। असम और बंगाल में कई स्थानों पर यह पहले ही हो चुका है, इसलिए इस जनसाख्यिकी आक्रमण को पहचानने में वे भूल नहीं कर सकते। वस्तुत: ऐसी घटनाओं पर राजनीतिक मौन ही इसके वास्तविक चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण है।

क्या किसी शहर में मुस्लिमों द्वारा किसी बात पर विरोध-स्वरूप ईद न मनाना भारतीय मीडिया के लिए उपेक्षणीय घटना हो सकती थी। चुनी हुई चुप्पी और चुना हुआ शोर-शराबा अब तुरंत बता देता है कि किसी साप्रदायिक हिंसा का चरित्र क्या है। पीड़ित कौन है, उत्पीड़क कौन। जब भी हिंदू जनता हिंसा और अतिक्रमण का शिकार होती है, राजनीतिक वर्ग और अंग्रेजी मीडिया मानो किसी दुरभिसंधि के अंतर्गत मौन हो जाता है। यह आसानी से इसलिए संभव होता है, क्योंकि भारत में कोई संगठित हिंदू राजनीतिक समूह नहीं है। हिंदू भावनाएं, दुख या चाह को व्यक्त करने वाला कोई घोषित या अघोषित संगठन भी नहीं है।

कुछ लोग भाजपा को हिंदू राजनीति से जोड़ते हैं, किंतु इस पर हिंदुत्व थोपा हुआ है। स्वयं भाजपा ने कभी हिंदू चिंता को अपनी टेक घोषित नहीं किया। इसने पिछला लोकसभा चुनाव भी विकास और मजबूती के नारे पर ही लड़ा था। गुजरात, मध्य प्रदेश या बिहार में भी वह हिंदू चिंता की अभिव्यक्ति से बचती है। मुस्लिम संगठन ठीक उलटा करते हैं। इसलिए भाजपा पर हिंदू साप्रदायिक होने या हिंदुत्व से भटकने के दोनों आरोप गलत हैं, जो उसके विरोधी या समर्थक लगाते हैं। विरोधी इसलिए, क्योंकि किसी न किसी को हिंदू-साप्रदायिक कहना उनकी जरूरत है ताकि वे मुस्लिम वोट-बैंक के सामने अपना हाथ फैलाएं। समर्थक भाजपा पर भटकने का आरोप इसलिए लगाते हैं, क्योंकि हिंदू चिंता को उठाने वाला कोई दल न होने के कारण वे भाजपा पर ही अपनी आशाएं लगा बैठते हैं। भाजपा इन आशाओं का विरोध नहीं करती, पर उसने कभी इन आशाओं को पूरा करने का वचन भी नहीं दिया। राम मंदिर बनाने की बात या धारा 370 हटाने की आवश्यकता बताना-हिंदू राजनीति नहीं है। अयोध्या में ताला खुलवाकर पूजा की शुरुआत तो राजीव गांधी ने ही की थी। इसी प्रकार धारा 370 के अस्थायी होने की बात तो संविधान में काग्रेस ने ही लिखी थी।

अत: इक्का-दुक्का भाजपा नेताओं द्वारा कभी-कधार कुछ कहना हिंदू राजनीति नहीं है। यह कभी-कभार हिंदू भावनाओं को उभारती या उपयोग करती है, पर यह नीति भारत में प्रचलित हिंदू-विरोधी सेक्युलरवाद से पार नहीं पा सकती। उसी तरह वह हिंदुत्व भी अकर्मक है जिसमें खुल कर सामने आने का साहस नहीं, जिसमें हर हाल में सही बात कहने की दृढ़ता न हो, जो प्रबल विरोधियों के समक्ष सच कहने से कतराता हो, जिसके कार्यकर्ता पहले अपना निजी स्वार्थ साधने के लोभ में डूबे रहते है। वह भी व्यर्थ हिंदुत्व ही है जो केवल सत्ता पाने अथवा पहले सत्ता में आने के लिए हिंदू भावनाओं का उपयोग करने का प्रयास करता हो। यह सब छद्म हिंदुत्व है जो यहां प्रचलित सेक्युलरवाद से हारता रहा है, हारता रहेगा। उपर्युक्त भाव और रूप किसी दल या नेता की विशेषताएं नहीं हैं। यह विभिन्न संगठनों और विभिन्न नेताओं-कार्यकर्ताओं की विशेषताएं हैं। यह अपने स्वभाव से ही इतना दुर्बल है कि शिकायतें करने और दूसरों पर निर्भर रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकता, इसीलिए छद्म हिंदुत्व, शिकायती हिंदुत्व और हिंदू राजनीति के अभाव में वस्तुत: कोई भेद नहीं है। अत: इस गंभीर सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि जिस तरह मुस्लिम राजनीति एक स्थापित शक्ति है, उसी तरह किसी हिंदू राजनीति का अस्तित्व ही नहीं है। हिंदू भावनाओं वाले कुछ नेता-कार्यकर्ता अनेक दलों में हैं, पर हिंदू भावना एक बात है और हिंदू राजनीति को स्वर देना बिलकुल दूसरी बात।

Empirical research(अनुभवजन्य अनुसंधान)

अनुभवजन्य और वैचारिक रूप से दो दृष्टिकोण हैं जिन्हें आमतौर पर एक शोध आयोजित करते समय नियोजित किया जाता है। संकल्पनात्मक को शोधकर्ताओं के रू...