संदेश

September, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मुस्लिम -हिन्दू और भारत !!!!!!!!!!!

आज हमारे चारों ओर का माहौल कुछ ऐसा सुलगता हुआ सा प्रतीत होता है, जैसे हम फ़ूटे ज्वालामुखी के पिघले लावे के बीच से रास्ता बनाते हुए कहीं जा पा रहे हों । वृहत्तर भारत के कई खंड में विभाजित हो जाने और अलग-अलग टुकड़ों पर अपनी रोटियां अलग पकाकर खाने के बावज़ूद हमारे कलेज़े की आग कहीं से भी ठंडी होती प्रतीत नहीं होती । विश्व राजनीति, अर्थनीति और भौतिकवाद ने मानव समाज की सोच को इतने संकुचित दायरे में क़ैद कर दिया है, कि मनुष्य का अपना प्राकृतिक स्वभाव होता क्या है, इसको जानने के लिये भी वन्य पशुओं के स्वभाव का अध्ययन करना पड़ रहा है । बढ़ती जनसंख्या भी इसका कारण रही जिसने क्रमश: घर, समाज, प्रान्त और देशों तक में दीवारें खड़ी करने का एक कभी खत्म न होने वाला सिलसिला बना दिया । फ़िर भी हमारा भारत ही इससे अधिक आक्रांत रहा है, क्योंकि इतनी विशालता के बावज़ूद इसका एकीकृत ढांचा विदेशी ताक़तों के लिये परेशानी और ईर्ष्या का सबब रहा । पिछले चार-पांच सौ वर्षों में लगातार विदेशी आक्रमण झेलते इस भूभाग पर परिस्थितियों ने एक धर्म से कई धर्म, पंथ और मज़हबों में इसको विभक्त कर दिया, जिसका दंश झेलना हमारी बाध्यता बन चुकी…

भगवान श्रीराम को फिर से वनवास????- डॉ0 प्रवीण तोगड़िया

चित्र
भारत ही नहीं वरन् विश्व का हिन्दू अयोध्या में भगवान् राम की जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर की सदियों से राह देख रहा है ! भगवान् राम तो लोभ-मोह से परे एक बार वनवास में चले गए थे – तब पिता का सम्मान रखना था उन्हें ! अब फिर से भगवान् राम की जन्मभूमि पर के मंदिर को यानी कि भगवान् राम को ही फिर से वनवास भेजा गया ! 450 वर्ष का अन्याय 4,00,000 हिन्दुओं का बलिदान, कोठारी बन्धुओं के वृद्ध माता-पिता के आंसुओं में से भी धधकती हुई राम मंदिर की आशा, जिन लोगों का राम जन्मभूमि पर इंच भर भी हक नहीं, ऐसे-ऐसे लोगों के साथ हिन्दुओं के सम्मान्य साधु-संतों को बिठा-बिठाकर किए गए समझौते के अनेकानेक प्रयास…….यह सब कुछ सरयू के जल में बह गया क्या ? तब भगवान् राम ने पिता के सम्मान के लिए वनवास भी झेला।

अब हम भी भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च न्यायपालिका के सम्मान के लिए यह दुःख भी झेलेंगे कि अब फिर से भगवान् राम वनवास भेजे गए ! उनके अपने जन्मस्थान पर उनका अपना एक मंदिर हो – मंदिर भगवान् का घर माना जाता है – इसके लिए भगवान् को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर करने वालों ने यानी कि बार-बार निरर्थक अर्जियां प्रस्तुत कर देश औ…

डरी हुई लड़कियां !!!!!!!!!!!!!!

यह वाकई चिंता की बात है कि देश के महानगरों और बड़े शहरों की 77 फीसदी लड़कियों को छेड़खानी का डर सताता
रहता है। गैर सरकारी संगठन 'प्लान इंडिया' के एक सर्वे में यह खुलासा हुआ है। इस सर्वे के मुताबिक 69 प्रतिशत लड़कियां शहरों को अपने लिए सुरक्षित नहीं मानतीं। यह राय हर वर्ग की लड़कियों की है, चाहे वह झुग्गी- झोपड़ी में रहती हों, स्कूल-कॉलेजों में पढ़ती हों या नौकरीपेशा हों।

निश्चय ही यह उन शहरों की कानून-व्यवस्था और सामाजिक वातावरण पर एक कड़ी टिप्पणी है। एक आधुनिक समाज की पहचान इस बात से भी होती है कि वहां महिलाएं अपने को कितना सुरक्षित और स्वतंत्र महसूस करती हैं। इस नजरिए से देखें तो हमारे शहर अब भी आधुनिक मूल्यों से काफी दूर नजर आते हैं। वहां छेड़खानी और यौन अपराधों का होना इस बात का संकेत है कि वहां के समाज में स्त्री-पुरुष संबंध में सहजता अभी नहीं आई है। सामंती समाज में स्त्री-पुरुष का रिश्ता गैर बराबरी का रहा है। इस कारण उनमें आपसी संवाद की गुंजाइश भी बेहद कम रही है। लेकिन ज्यों-ज्यों समाज बदला, स्त्री को हर स्तर पर आगे बढ़ने के मौके मिले। धीरे-धीरे उनके प्रति नजरिए में तब्…

आखिर कब तक टलेगा फैसला !!!!!!!!

आप गौर कीजिए, अयोध्या मामले पर फैसला आने के पहले किस तरह कुछ शहरों में चौराहों पर आपसी सदभावना के लिए
फूल बांटे जा रहे थे। आप पिछले दिनों आने वाले एसएमएसों की भाषा में शांति की चाहत देखिए। हालांकि अंतहीन इंतजार के बाद अयोध्या पर कोई फैसला आ जाने की उम्मीद एक बार फिर अधर में अटक गई है। फैसले की घोषणा के साथ कानून-व्यवस्था की कुछ चिंताएं जुड़ी थीं, पर कहीं न कहीं इसमें यह राहत भी शामिल थी कि अंतत: यह किस्सा खत्म होने की ओर तो बढ़ा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मामला और लंबा खिंचने के आसार बनने लगे हैं।

एक बात बिल्कुल साफ है कि अब से बीसेक साल पहले, यानी 1989 से 1992 के बीच मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर जैसा तनाव पूरे देश में दिखाई पड़ रहा था, उसकी छाया भी आज कहीं नजर नहीं आ रही है। इस बीच जन्मी और पली-बढ़ी भारत की नई पीढ़ी का जीवन, उसके सपने और उसकी परेशानियां कुछ और हैं। उस सामाजिक ठहराव को वह बहुत पीछे छोड़ आई है, जिससे ठलुआ किस्म के ढेरों निरर्थक विवाद इस देश में पैदा होते आए हैं। उसके मन में आस्था के लिए कुछ स्पेस जरूर है, लेकिन आस्था के नाम पर मार-काट उसके अजेंडा में दूर-द…

पेट के बाद शिक्षा !

इतिहास इस बात का साक्षी है कि मानव विकास की कहानी ज्ञान की लेखनी से ही लिखी गई है। आज प्रगति के शिखर को स्पर्श करने वाला मानव, शिक्षा के विविध आयामों के माध्यम से अपनी महत्वाकांक्षी परिकल्पनाओं को साकार करने में सक्षम है। तथापि यह भी एक कटु सत्य है कि बच्चों की पारिवारिक परिस्थितियों उनकी शिक्षा में बाधा भी उत्पन्न कर करती है।
परिवार भी सामाजिक संरचना का हिस्सा है। फलतः समाज में होने वाले छोटे-बड़े परिवर्तनों से परिवार भी प्रभावित होते हैं। परिवार यदि सामाजिक ढाँचे का निर्माण करते हैं, तो दूसरी ओर समाज का दायित्व भी इन परिवारों के प्रति पूर्णरूपेण बनता है। वर्तमान समय में हमारा समाज स्पष्ट रूप से तीन वर्गों में विभाजित दिखाई देता है। प्रथम- धनी वर्ग, द्वितीय- मध्यम वर्ग, तृतीय- निर्धन वर्ग। कुछ ऐसा ही विभाजन पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर शिक्षा क्षेत्र में भी स्पष्ट देखा जा सकता है। अंग्रेजी स्कूलों तक उन्ही की पहुँच हो पाती है जो आर्थिक आधार पर खरे उतरते हैं। मोटी आमदनी उनके बच्चों की राह आसान कर देती है। वे अपने बच्चों के लिये तत्परता से कार्य करते हैं। उनकी सजगता उनके बच्चों के सुनह…

विज्ञापन

बंधक बनाने वालों से कैसी बातचीत?

क्या भारत सरकार को उन संगठनों से बातचीत करनी चाहिए जो लोगों को बंधक बनाकर अपनी माँगें मनवाना चाहते हैं?

बीस साल पहले तत्कालीन गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद को विदेशी /कश्मीरी चरमपंथियों के चंगुल से छुड़वाने का मामला हो या फिर इंडियन एअरलाइंस के विमान को छुड़वाने के लिए कश्मीरी चरमपंथियों की रिहाई का मामला हो भारत सरकार के पास बंधक-संकट से निपटने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है.

हालाँकि यासिर अराफ़ात से लेकर काँग्रेस समर्थक पाँडे बंधु तक विमान अपहरण करके अपनी माँगे मनवाने की कोशिश कर चुके हैं. और अब बिहार में माओवादियों ने चार पुलिस वालों को बंधक बनाया हुआ था जिसमे से एक की ह्त्या भी कर दी गयी है
तो क्या बंधकों को बचाने के लिए सरकार को बंधक बनाने वालों से बातचीत करनी चाहिए या नहीं?