बुधवार, 29 सितंबर 2010

मुस्लिम -हिन्दू और भारत !!!!!!!!!!!

आज हमारे चारों ओर का माहौल कुछ ऐसा सुलगता हुआ सा प्रतीत होता है, जैसे हम फ़ूटे ज्वालामुखी के पिघले लावे के बीच से रास्ता बनाते हुए कहीं जा पा रहे हों । वृहत्तर भारत के कई खंड में विभाजित हो जाने और अलग-अलग टुकड़ों पर अपनी रोटियां अलग पकाकर खाने के बावज़ूद हमारे कलेज़े की आग कहीं से भी ठंडी होती प्रतीत नहीं होती । विश्व राजनीति, अर्थनीति और भौतिकवाद ने मानव समाज की सोच को इतने संकुचित दायरे में क़ैद कर दिया है, कि मनुष्य का अपना प्राकृतिक स्वभाव होता क्या है, इसको जानने के लिये भी वन्य पशुओं के स्वभाव का अध्ययन करना पड़ रहा है । बढ़ती जनसंख्या भी इसका कारण रही जिसने क्रमश: घर, समाज, प्रान्त और देशों तक में दीवारें खड़ी करने का एक कभी खत्म न होने वाला सिलसिला बना दिया । फ़िर भी हमारा भारत ही इससे अधिक आक्रांत रहा है, क्योंकि इतनी विशालता के बावज़ूद इसका एकीकृत ढांचा विदेशी ताक़तों के लिये परेशानी और ईर्ष्या का सबब रहा । पिछले चार-पांच सौ वर्षों में लगातार विदेशी आक्रमण झेलते इस भूभाग पर परिस्थितियों ने एक धर्म से कई धर्म, पंथ और मज़हबों में इसको विभक्त कर दिया, जिसका दंश झेलना हमारी बाध्यता बन चुकी है । कहीं कुछ तो है ही, जिसने इस भूभाग से लम्बे समय के बाद ही सही, घुसपैठियों की जड़ें जम चुकने के बावज़ूद उन्हें कालान्तर में हमारी ज़मीन छोड़ने पर मज़बूर किया । शायद इसी तासीर पर किसी शायर को कहना पड़ा कि, ‘कुछ बात है के हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा’।
अब बात करें हिन्दू-मुसलमान की । क्योंकि कब-कब क्या-क्या हुआ, कब अफ़गानिस्तान वाला भूभाग अलग हो गया, फ़िर कब बर्मा (आज का म्यांमार) हमारा नहीं रहा, और फ़िर उसी प्रकार पूर्वी-पश्चिमी पाकिस्तान और गुलाम कश्मीर से हम कब हाथ धो बैठे, यह सबकुछ कुछ पुराने, और कुछ नए इतिहास का विषय है, जिसपर चर्चा करना इस लेख का विषय नहीं है । किसी ब्लाँग में इतिहास-भूगोल की चर्चा हमेशा उबाऊ ही होती है । हमें बात करनी है समाज में निरंतर बढ़ती जा रही उस अ-सहिष्णुता की भावनाओं की, जो हमें निरंतर किसी विदेशी दार्शनिक की उस भविष्यवाणी को चरितार्थ होने की ओर ठेलती हुई सी प्रतीत हो रही हैं, जिसमें उसने एक-दो दशक में ही भारत के कम से कम बीस टुकड़े होने की कल्पना की थी । आज पूर्वोत्तर से लेकर कश्मीर तक अलगाववाद की भावना जिस तेज़ी के साथ जोर पकड़ती जा रही है, उससे तो यही संकेत मिल रहे हैं, कि देर-सवेर कहीं हमें इन तत्वों के आगे घुटने तो नहीं टेक देने पड़ेंगे? उसपर कोढ़ में खाज की तरह इस्लामिक और भगवा आतंकवाद का नारा एक अलग प्रकार के सिरदर्द का कारण बनता जा रहा है । हिन्दू-मुस्लिम दोनों पक्ष के वे ढेर सारे लोग, जिसमें बुद्धिजीवी और आमजन दोनों प्रकार के लोग और ज़मातें हैं, जो कभी अ-सहिष्णुता और कट्टरवाद को कुछ सिरफ़िरे लोगों की सोच होने की दलीलें दिया करते थे, उनके विगत कुछ वर्षों में बदलते तेवर देखकर हैरानी होती है । कट्टरवाद अब कुछ गिनती के हिन्दू-मुस्लिम संगठनों की सीमा से बाहर होकर सड़कों पर आता जा रहा है । समाज पहले भी धर्म और सम्प्रदाय के आधार पर दो खेमों में बंटा हुआ था, परन्तु एक अव्यक्त सी मर्यादा दोनों को कहीं न कहीं जोड़ती थी । उस मर्यादा की दीवारें तेज़ी से ढहती जा रही हैं, यह चिन्ता का विषय है । जहां जिसकी आबादी अधिक है, वहां स्वाभाविक रूप से बहुसंख्यक आबादी अल्प-संख्यक पर भारी पड़ती है, यह एक स्वाभाविक मनोविज्ञान है । हर ऐसी जगह पर अल्पसंख्यक आबादी को कुछ समझौते अपनी स्वच्छन्दता के साथ करते हुए बहुसंख्यक समाज के साथ एडजस्ट करना पड़ता है, ऐसा शुरू से ही होता आया है । वोट की राजनीति अपनी आवश्यकताओं के हिसाब से समाज को आपस में लड़ाते आई है ।
परन्तु आज की असहिष्णुता के तेवर घातक इसलिये हैं, क्योंकि इसका अंजाम घातक है । शायद बहुसंख्यक समाज इस खतरे से कहीं न कहीं जानबूझकर आंख चुराता हुआ सा प्रतीत हो रहा है । कश्मीर के मुसलमान शुरू से ही भारत के अन्य मुसलमानों से अलग श्रेणी के रहे, क्योंकि इस श्रेणी को हमने ही गढ़ा, और उसे परवान चढ़ाया । आर्थिक पैकेज दे-देकर हमने वहां के मुसलमानों को काहिल, मुफ़्तखोर, मुंहज़ोर और बिगड़ैल बना दिया, जैसे किसी रईसज़ादे के बच्चे होते हैं । ऐसे विधान बनाकर दे दिये कि इधर का कोई वहां जाकर न तो बस सकता है, न ही कोई धंधा रोज़गार जमा सकता है । लिहाज़ा वहां के मुसलमान पूरी तरह अपनी मर्ज़ी के मालिक और पाकिस्तान से रोटी-बेटी का रिश्ता होने के कारण उसके क़रीबी बनते चले गए । इसके विपरीत इधर के मुसलमानों के लिये हमने कुछ भी खास नहीं किया ताक़ि वह भी मुख्यधारा के साथ मिलकर अपने को विकसित कर सकें । कुछ गिने-चुने लोगों का विकास हुआ, और आज वही लोग उस समाज के अगुआ बने हुए हैं । सवाल यह है कि मुसलमान के नाम पर यदि हम उन्हें भी कश्मीरी मुसलमान और बाहरी इस्लामिक कट्टरवादियों आतंकवादियों की श्रेणी में रखकर देखते हैं, तो फ़िर वहीं यह सवाल भी पैदा होता है कि आखिर हम चाहते क्या हैं? मुसलमान क़ौम से छुटकारा? कैसे? उनसे आर-पार की लड़ाई लड़ के? फ़िर क्या होगा? आज जो मुस्लिम आबादी भारत में है, सबको पता है कि पाकिस्तान की पूरी आबादी से भी अधिक है । तब फ़िर अपनी ज़मीन के और टुकड़े करने के लिये भी हमें मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिये । क्योंकि हिन्दू मुस्लिम से अलग हो जायं, या मुस्लिम हिन्दू से, बात बिल्कुल बराबर है , कोई फ़र्क़ नहीं । यदि मारकर किसी सम्प्रदाय को समाप्त किया जा सकता, तो पहला मौक़ा आक्रमणकारी मुग़लों के हाथ आया था । क्यों नहीं वे हिन्दुओं का खात्मा कर पूरे भारत को मुस्लिम आबादी में तब्दील कर पाए? मार-काट मचाकर भी जब समाप्त नहीं कर पाए, तो धर्मांतरण का सहारा लेना पड़ा, फ़िर भी शत-प्रतिशत हिन्दुओं को मुसलमान नहीं बना पाए । आज वही आबादी हिन्दू-मुस्लिम दो खेमों में विभक्त है । जब मुसलमान हिन्दुओं को समाप्त नहीं कर पाए, तो हिन्दू भी कभी मुसलमानों को समाप्त नहीं कर सकते । एक ही विकल्प निकलेगा इस लड़ाई का, कि ज़मीन के टुकड़े कीजिये, तथा एक और देश की सीमा तय कर लीजिये । इस विकल्प से भी बात बनती कहां है? पाकिस्तान बनने के बाद भी तमाम मुसलमानों ने अपनी धरती, जहां उनके पुरखे पैदा हुए थे, वहीं मर जाना पसन्द किया, उधर गए नहीं । उधर के कुछ हिन्दुओं ने भी ऐसा ही किया था, जो आज वहां अल्पसंख्यक हैं ।
ले-देकर बात वहीं अटकती है कि इस झगड़े को बढ़ावा देकर, दोनों में से किसी भी कौम द्वारा अपने लोगों में कट्टरवादिता को प्रश्रय देकर कुछ भी हासिल नहीं होने वाला । कुछ लोगों की दुकानदारी ज़रूर चमकती है इन भावनाओं को भड़काकर, जैसे नेता और कुछ तथाकथित हिन्दूवादी खबरची और प्रतिक्रियावादी । जिनको विधानसभाओं और लोकसभा या फ़िर अपनी स्थानीय निकाय की सीट पक्की करनी होती है, या फ़िर तीखे तेवरों वाली पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान स्थापित करनी होती है, या फ़िर थोडी दूरी पर अपने गुट का धार्मिक या राजनीतिक नेता बनने की सम्भावना दिखती है । मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि हिन्दू हों या मुसलमान, इस विचारधारा के लोग ही समाज के असली दुश्मन और अलगाववाद को प्रश्रय देने वाले लोग होते हैं । हम दूसरे किसी भी देश से अपनी तुलना करने की स्थिति में कभी नहीं हो पाएंगे, क्योंकि किसी भी देश की आबादी जाति-धर्म और पंथ की इतनी विभिन्नताओं के साथ आबाद नहीं है । हमारे लिये एक और एकमात्र रास्ता है कि आज विज्ञान और टेक्नाँलाँजी के ज़माने में विकास के सारे सुख प्राप्त करने हेतु, सभी जाति पंथ और मजहब एक होकर आतंकवाद, अलगाववाद और वह कोई भी ताक़त जो हमारे विकास का रोड़ा बनती हो, उसको एकजुट होकर पूरी ताक़त से कुचल दें । इसके लिये हमें सम्प्रदायवाद की संकीर्णता से ऊपर उठना ही होगा, क्योंकि और कोई चारा नहीं है । हिन्दू हो या मुस्लिम, कोई इस देश के टुकड़े होता देखना कभी पसन्द नहीं करेगा, सिवाय विदेशी खर्चों पर पल रहे भाड़े के टट्टुओं के । इनकी तो न कोई जाति है, न मजहब, न ही आमजन के जीने मरने से कोई वास्ता । इनके दमन के लिये हम सब का कर्त्तव्य बनता है कि अपने जवानों, चाहे किसी भी फ़ोर्स से सम्बन्धित हों, उनको नैतिक समर्थन देने के लिये हमेशा आगे रहें । नेताओं की बातों को तौलें । यदि वे देश और समाज के हित में काम करते हैं, तो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उन्हें समर्थन दें । यदि उनकी किसी गतिविधि में उनका दलगत या व्यक्तिगत स्वार्थ दिखता हो, तो उन्हें कभी बढ़ावा न दें । हम सुधरेंगे, तो समाज और देश दोनों स्वत: सुधर जाएंगे ।

रविवार, 26 सितंबर 2010

भगवान श्रीराम को फिर से वनवास????- डॉ0 प्रवीण तोगड़िया


भारत ही नहीं वरन् विश्व का हिन्दू अयोध्या में भगवान् राम की जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर की सदियों से राह देख रहा है ! भगवान् राम तो लोभ-मोह से परे एक बार वनवास में चले गए थे – तब पिता का सम्मान रखना था उन्हें ! अब फिर से भगवान् राम की जन्मभूमि पर के मंदिर को यानी कि भगवान् राम को ही फिर से वनवास भेजा गया ! 450 वर्ष का अन्याय 4,00,000 हिन्दुओं का बलिदान, कोठारी बन्धुओं के वृद्ध माता-पिता के आंसुओं में से भी धधकती हुई राम मंदिर की आशा, जिन लोगों का राम जन्मभूमि पर इंच भर भी हक नहीं, ऐसे-ऐसे लोगों के साथ हिन्दुओं के सम्मान्य साधु-संतों को बिठा-बिठाकर किए गए समझौते के अनेकानेक प्रयास…….यह सब कुछ सरयू के जल में बह गया क्या ? तब भगवान् राम ने पिता के सम्मान के लिए वनवास भी झेला।

अब हम भी भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च न्यायपालिका के सम्मान के लिए यह दुःख भी झेलेंगे कि अब फिर से भगवान् राम वनवास भेजे गए ! उनके अपने जन्मस्थान पर उनका अपना एक मंदिर हो – मंदिर भगवान् का घर माना जाता है – इसके लिए भगवान् को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर करने वालों ने यानी कि बार-बार निरर्थक अर्जियां प्रस्तुत कर देश और हिन्दुओं का अपमान करनेवालों ने तो न्यायपालिका का सम्मान नहीं किया ! लेकिन इस देश का हिन्दू आज दुःखी है ! किसी भी अन्य देश में 85 प्रतिशत से अधिक संख्या में शांति से रहने वालों पर 15 प्रतिशत द्वारा बड़े-बड़े अन्याय नहीं किए जाते – लेकिन भारत में हिन्दू भी अब भगवान् राम के साथ वनवास भेजे गए ! भगवान् राम को और करोड़ों हिन्दुओं की आशा जगी हुई थी कि इतने वर्षों के न्यायालयीन प्रयासों के बाद अब भगवान् राम को उनकी अपनी जन्मभूमि पर एक मंदिर मिलेगा ! लेकिन नहीं !

यह देरी करने में याचिकाकर्ता का क्या मतलब और क्या दुर्हेतु है, यह देश के हिन्दू नहीं समझते ऐसा भी नहीं है, लेकिन भगवान् राम तो अवश्य देख और समझ रहे होंगे कि उनको उनके मंदिर से कौन, क्यों, कब तक वंचित रख रहे हैं !

अयोध्या की परिक्रमा मार्ग में 400 मुस्लिम परिवारों को गरीब आवास योजना में अभी-अभी घर दिए गए – लेकिन अयोध्या में भगवान् राम को उनकी अपनी जन्मभूमि पर मंदिर के लिए कितनी राह देखनी होगी ? और तो और जब दूसरे दिन इसका निर्णय होनेवाला हो उस दिन फिर से भगवान् राम वनवास में ? 1 अक्टूबर को प्रयाग (जिसे कुछ लोग अल्लाहाबाद कहते हैं) के न्यायालय के एक न्यायाधीश सेवानिवृत्त हो रहे हैं – इसका अर्थ यह है कि फिर से नए सिरे से ट्रायल चलेगी ? फिर अब तक इतने वर्षों से जो सुनवाइयां हुईं, जो निर्णय लिखा भी गया होगा, उसका क्या ? यह देरी करने में याचिकाकर्ता का क्या मतलब और क्या दुर्हेतु है, यह देश के हिन्दू नहीं समझते ऐसा भी नहीं है, लेकिन भगवान् राम तो अवश्य देख और समझ रहे होंगे कि उनको उनके मंदिर से कौन, क्यों, कब तक वंचित रख रहे हैं ! समझौते का बुरका पहनाकर हिन्दुओं को जलील करने की चाल आज तक बहुत चली गयी-न्यायालयों का सम्मान करनेवाले हिन्दू सब दुःख सहते रहेंगे – लेकिन कब तक भगवान् राम अपने मंदिर से वंचित रखे जायेंगे ? क्यों ? इतनी हताशा हिन्दुओं में निर्माण हो, यह किस का प्रयास चल रहा है ?

सेकुलर दिखने की यह फैशन भारत में कैंसर की तरह फैली है – जिनके मन में आज लड्डू फूट रहे होंगे कि वाह-वाह ! देखो हिन्दुओं के राम का मंदिर नहीं बन रहा है ना – वे यह अच्छी तरह समझ लें कि हिन्दू धर्म ने भगवान् राम की न्यायप्रियता देखी है और महाभारत के काल में शिशुपाल और भगवान् श्रीकृष्ण की कहानी भी देखी है ! जो यह सोचकर आज उत्सव मना रहे होंगे कि अब उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश सेवानिवृत्त होंगे, फिर नयी बेंच बनेगी, फिर नए सिरे से सुनवाई होगी और भगवान् राम को मंदिर कभी भी नहीं मिलेगा – ऐसे लोग यह भी समझ लें कि भारत का हिन्दू अब न्यायालयों की परम्परागत देरियों से उकता गया है, दुःखी है, आहत है ! हमारे जैसे लोग संपूर्ण देश में, समाज के हर वर्ग में प्रवास करते रहते हैं – हर वर्ग के हर उम्र के हिन्दुओं से मांग आ रही है कि अब बस ! यदि शाहबानो केस में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बावजूद भारत की संसद अलग कानून बना सकती है, तो भगवान् राम के मंदिर के लिए क्यों नहीं ? क्यों भारत की संसद भगवान् राम को भावी जन्मभूमि पर मंदिर के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर रही है ? भारत की संसद यह भी समझे कि भारत का हिन्दू 6 दशकों से स्वतन्त्र भारत में न्याय की राह देख रहा था – यह न्याय अपने लिए हिन्दू नहीं मांग रहे हैं !

भगवान् राम की अपनी जन्मभूमि पर उनका अपना मंदिर बने, जो पहले से ही था, इसके लिए हिन्दू तरस रहा था – अब हिन्दुओं को और ना तरसाओ, यही मांग भारत का हिन्दू भारत की संसद से कर रहा है ! बहुत देख ली न्यायालयीन प्रक्रियाओं की देरी, बहुत देखी ली झूठ-मूठ की याचिकाएं और बहुत देख लिए राजनीति से प्रेरित समझौते के खोखले प्रयास ! विदेशी बाबर के ढांचे को सम्मान देने वाले सेकुलर भी भारत ने बहुत देख लिए, अब बस ! बस हुआ भगवान् राम का कलियुगी वनवास ! नहीं राह देखनी है हिन्दुओं को न्यायालयीन देरी की – हिन्दू न्यायालयों का सम्मान करते हैं, करते रहेंगे लेकिन बस ! यह मसला भारत की अस्मिता का मसला है।

अब भारत की संसद भगवान् राम का मंदिर बनाने का कानून भगवान् सोमनाथ की तर्ज पर बनाए, यही एक तात्कालिक मांग है ! और सभी राजकीय पक्ष इसमें एक होकर हिन्दुओं का श्रद्धा स्थान और भारत का सम्मान ऐसे भगवान् राम के मंदिर के लिए कानून बनाए और वह भी अब बिना देरी के ! भारत के हिन्दुओं के धर्मसंयम की और परीक्षा अब ना ले कोई, यही भगवान् राम से प्रार्थना है !

डरी हुई लड़कियां !!!!!!!!!!!!!!

यह वाकई चिंता की बात है कि देश के महानगरों और बड़े शहरों की 77 फीसदी लड़कियों को छेड़खानी का डर सताता
रहता है। गैर सरकारी संगठन 'प्लान इंडिया' के एक सर्वे में यह खुलासा हुआ है। इस सर्वे के मुताबिक 69 प्रतिशत लड़कियां शहरों को अपने लिए सुरक्षित नहीं मानतीं। यह राय हर वर्ग की लड़कियों की है, चाहे वह झुग्गी- झोपड़ी में रहती हों, स्कूल-कॉलेजों में पढ़ती हों या नौकरीपेशा हों।

निश्चय ही यह उन शहरों की कानून-व्यवस्था और सामाजिक वातावरण पर एक कड़ी टिप्पणी है। एक आधुनिक समाज की पहचान इस बात से भी होती है कि वहां महिलाएं अपने को कितना सुरक्षित और स्वतंत्र महसूस करती हैं। इस नजरिए से देखें तो हमारे शहर अब भी आधुनिक मूल्यों से काफी दूर नजर आते हैं। वहां छेड़खानी और यौन अपराधों का होना इस बात का संकेत है कि वहां के समाज में स्त्री-पुरुष संबंध में सहजता अभी नहीं आई है। सामंती समाज में स्त्री-पुरुष का रिश्ता गैर बराबरी का रहा है। इस कारण उनमें आपसी संवाद की गुंजाइश भी बेहद कम रही है। लेकिन ज्यों-ज्यों समाज बदला, स्त्री को हर स्तर पर आगे बढ़ने के मौके मिले। धीरे-धीरे उनके प्रति नजरिए में तब्दीली आई। और इस तरह स्त्री-पुरुष संबंध का तानाबाना भी बहुत कुछ बदला। दोनों का अपरिचय काफी हद तक खत्म हुआ। गांवों-कस्बों की तुलना में शहरों-महानगरों में स्त्री को ज्यादा आजादी मिली, शिक्षा और रोजी-रोजगार के अवसर ज्यादा मिले। लेकिन पुरुष वर्ग की मानसिकता में सामंती मूल्यों के अवशेष अब भी बचे हुए हैं। यौन अपराध कहीं न कहीं उसी की अभिव्यक्ति हैं।

असल में सामाजिक विकास की प्रक्रिया भी हर जगह एक सी नहीं रही है। उनमें काफी असंतुलन है। यही वजह है दिल्ली जैसे महानगर में एक तरफ तो लिव इन रिलेशन को भी स्वीकार किया जा रहा है, दूसरी ओर ऑनर किलिंग की घटनाएं भी घट रही हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि पुलिस-प्रशासन में भी पुरुषवाद हावी है। महिलाओं के साथ होने वाले किसी भी अपराध को आमतौर पर पुलिस गंभीरता से नहीं लेती या बेहद ढीले-ढाले ढंग से कार्रवाई करती है। इस वजह से यौन अपराधों में सजा दिए जाने की दर बेहद कम है। पुलिस का यह रवैया शरारती तत्वों के हौसले बढ़ाता है। महिलाएं भी यथासंभव सब कुछ चुपचाप बर्दाश्त करके चलती हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि आवाज उठाने से वे मुसीबत में पड़ जाएंगी। सर्वे में 40 फीसदी लड़कियों ने कहा है कि वे अपने साथ छेड़छाड़ को नजरअंदाज करती हैं। महिलाओं के सशक्तीकरण की आज खूब बातें की जा रही हैं। पर जब वे बेखौफ होकर सड़क पर चल भी नहीं सकतीं तो उनके एम्पॉवरमेंट का क्या मतलब है।

आखिर कब तक टलेगा फैसला !!!!!!!!

आप गौर कीजिए, अयोध्या मामले पर फैसला आने के पहले किस तरह कुछ शहरों में चौराहों पर आपसी सदभावना के लिए
फूल बांटे जा रहे थे। आप पिछले दिनों आने वाले एसएमएसों की भाषा में शांति की चाहत देखिए। हालांकि अंतहीन इंतजार के बाद अयोध्या पर कोई फैसला आ जाने की उम्मीद एक बार फिर अधर में अटक गई है। फैसले की घोषणा के साथ कानून-व्यवस्था की कुछ चिंताएं जुड़ी थीं, पर कहीं न कहीं इसमें यह राहत भी शामिल थी कि अंतत: यह किस्सा खत्म होने की ओर तो बढ़ा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मामला और लंबा खिंचने के आसार बनने लगे हैं।

एक बात बिल्कुल साफ है कि अब से बीसेक साल पहले, यानी 1989 से 1992 के बीच मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर जैसा तनाव पूरे देश में दिखाई पड़ रहा था, उसकी छाया भी आज कहीं नजर नहीं आ रही है। इस बीच जन्मी और पली-बढ़ी भारत की नई पीढ़ी का जीवन, उसके सपने और उसकी परेशानियां कुछ और हैं। उस सामाजिक ठहराव को वह बहुत पीछे छोड़ आई है, जिससे ठलुआ किस्म के ढेरों निरर्थक विवाद इस देश में पैदा होते आए हैं। उसके मन में आस्था के लिए कुछ स्पेस जरूर है, लेकिन आस्था के नाम पर मार-काट उसके अजेंडा में दूर-दूर तक नहीं है। रहा सवाल पुरानी पीढ़ी का तो इन दो दशकों में उसने भी अपने सारे हाथ आजमा कर देख लिए हैं। उसे पता है कि अयोध्या विवाद एक राजनीतिक मामला है और जिन लोगों की रोजी-रोटी इससे चलती है वे इसे भुनाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।

इस सामाजिक मोहभंग को देखते हुए ही मंदिर या मस्जिद के लिए अपना जीवन होम कर देने की डींगें हांकने वाले लोग भी इस मुद्दे पर पहले की तरह आक्रामक होने से बच रहे हैं। इस माहौल में अच्छा यही होगा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट अपना फैसला सुनाकर झंझट खत्म करे। इसके बजाय फैसला टालने या मुकदमा और लंबा खिंचने से समाज में उन लोगों का पक्ष मजबूत होगा, जो आस्था को आधार बनाकर अदालत का फैसला न मानने पर अड़े हुए हैं। खतरा यह भी है कि 60 साल पुराने मुकदमे के फैसले की घोषणा खुद सुप्रीम कोर्ट द्वारा टाल दिए जाने से कहीं हमारी न्यायपालिका के औचित्य पर ही सवाल न खड़ा होने लगे।
from-nbt

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

पेट के बाद शिक्षा !

इतिहास इस बात का साक्षी है कि मानव विकास की कहानी ज्ञान की लेखनी से ही लिखी गई है। आज प्रगति के शिखर को स्पर्श करने वाला मानव, शिक्षा के विविध आयामों के माध्यम से अपनी महत्वाकांक्षी परिकल्पनाओं को साकार करने में सक्षम है। तथापि यह भी एक कटु सत्य है कि बच्चों की पारिवारिक परिस्थितियों उनकी शिक्षा में बाधा भी उत्पन्न कर करती है।
परिवार भी सामाजिक संरचना का हिस्सा है। फलतः समाज में होने वाले छोटे-बड़े परिवर्तनों से परिवार भी प्रभावित होते हैं। परिवार यदि सामाजिक ढाँचे का निर्माण करते हैं, तो दूसरी ओर समाज का दायित्व भी इन परिवारों के प्रति पूर्णरूपेण बनता है। वर्तमान समय में हमारा समाज स्पष्ट रूप से तीन वर्गों में विभाजित दिखाई देता है। प्रथम- धनी वर्ग, द्वितीय- मध्यम वर्ग, तृतीय- निर्धन वर्ग। कुछ ऐसा ही विभाजन पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर शिक्षा क्षेत्र में भी स्पष्ट देखा जा सकता है। अंग्रेजी स्कूलों तक उन्ही की पहुँच हो पाती है जो आर्थिक आधार पर खरे उतरते हैं। मोटी आमदनी उनके बच्चों की राह आसान कर देती है। वे अपने बच्चों के लिये तत्परता से कार्य करते हैं। उनकी सजगता उनके बच्चों के सुनहरे भविष्य का निर्माण करती है। इसमें कुछ अनुचित भी नही है।

मेहनत-मजदूरी या फिर दैनिक वेतन पर गुजर-बसर करने वाले अधिसंख्य निर्धन तबके के लिये तो अंग्रेजी स्कूल एक सपना और सरकारी स्कूल एक उलझन साबित होती हैं। ये अभिभावक भी जो बीज परिवार ने अतीत में बोया था, वर्तमान में उसी को काट रहे हैं। क्या करेंगे बच्चों को पढ़ा-लिखा कर ? अपना कामधंधा ही तो आगे चलाना है।……मध्यम वर्ग के परिवार बच्चों को शिक्षा देना चाहते हैं। किंतु यहाँ भी बेटा-बेटी का भेदभाव दिखाई देता है। बेटे को अच्छी शिक्षा देंगे तो बुढ़ापे की लाठी बनेगा। लड़की तो पराया धन है। उस पर धन खर्च करने से क्या लाभ ? ऊपर से ब्याह भी करना है। थोड़ा बहुत पढ़ ले वही बहुत है। इस पारिवारिक मानसिकता के चलते ही बालिकाओं की शिक्षा बाधित हो रही है।
भले ही शिक्षा का मार्ग पेट भर भोजन के मार्ग से ही क्यों न जाता हो, किंतु यह सत्य है कि मध्यान्ह भोजन व्यवस्था ने बच्चों को स्कूल तक पहुँचाया है। अशिक्षित माता-पिता बच्चों को पढ़ने विद्यालय भेजते तो हैं, किंतु बच्चों की प्रगति के प्रति उदासीन ही रहते हैं। शिक्षा के महत्व को अधिक न समझ पाने के कारण वे शिक्षा को बच्चों के भविष्य से जोड़ कर नहीं देख पाते हैं। विद्यालयों में बच्चों की आये दिन अनुपस्थिति इसी बात की ओर संकेत करती है। घरेलू कार्यों के लिए उन्हें घर में रोक लिया जाता है या फिर पूरी तरह से उनकी शिक्षा रोक दी जाती है। यही कारण है कि प्रति वर्ष विद्यालय छोड़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।
कई परिवार ऐसे हैं जहाँ आर्थिक तंगी के चलते घमासान मचा रहता है। माता-पिता का अलगाव, उनमें किसी एक का जीवित न रहना, घरेलू कलह आदि अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करता बचपन वेदना के उस के उस अंधे कूप में जा गिरता है, जहाँ से निकलने की छटपटाहट तो सुनी जा सकती है किंतु समाधान शून्य में कहीं खो जाता है। कुहनी से फटी बनियान, बेतरतीब बाल, सूनी आँखें, रूखे चेहरे भविष्य के प्रति शून्य भाव किसी के भी मन को विचलित कर देगा। मन में प्रश्न उठने लगते हैं, क्या यही हैं हमारे देश का भविष्य ?
मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित निर्धन परिवार में आँखें खोलने वाले ये बच्चे करें भी तो क्या ? सामाजिक न्याय-अन्याय की भाषा इन्हें नहीं आती। इन्हें तो रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातें सुनाने का मन है, लेकिन बाल सुलभ इन बातों को सुनने का समय किसके पास है ? वास्तविक धरातल का कठोर यथार्थ उन्हें किसी बात की अनुमति नहीं देता। उनका निरर्थक पड़ा बस्ता दूसरे दिन की प्रातः तक उसी प्रकार पड़ा रहता है। जीवन की समस्याओं में उलझे उनके अभिभावकों को भी उनका यह बस्ता बोझ ही लगने लगता है।

मदिरापान कर जब उनका पिता उन्हें पीटता है, गालियाँ देता है, उनका बस्ता फेंक देता है या उन्हें घर से बाहर कर देता है तब वे क्या करें ? कैसे कक्षा में दिया गया कार्य करें ? स्कूल जा पाएँगे या नहीं ? यह मानसिक एवं शारीरिक चोट किस अनहोनी की ओर संकेत कर रही है ?
अपवादस्वरूप कई अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे शिखर तक पहुँचें। किंतु उनके सपने तब चूर-चूर हो जाते हैं, जब हजारों-लाखों की बात होती है। थक हार कर इन मेधावी निर्धन बच्चों की आशा निराशा में परिवर्तित हो जाती है। सरकारी प्रयास कितने सार्थक एवं न्यायपूर्ण क्यों न हों, पारिवारिक परिस्थितियाँ इन पर भारी पड़ती रही हैं। शिक्षा को गंभीरता से न लेना, शिक्षा के महत्व को न समझ पाना, दिन भर की परेशानी से बचने के लिए बच्चों को स्कूल भेजना, छात्रवृत्ति हेतु उत्साह दिखाना, उस राशि का प्रयोग बच्चों के लिए नहीं घरेलू कार्यों के लिए करना आदि कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर ढूँढना शेष है।
पारिवारिक परिस्थितियाँ धनी वर्ग के बच्चों के लिए भी कभी-कभी बाधा बनकर खड़ी हो जाती हैं। छोटे-छोटे बच्चों को संपत्ति की चमक चकाचौंध कर जाती है। भले-बुरे का ज्ञान मिट जाता है और वे शिक्षा से विमुख होकर कुमार्गी बन जाते हैं। अभिभावकों को तब समझ आती है जब उनके बच्चों के भविष्य का मार्ग पूरी तरह बंद हो चुका होता है। पाश्चात्य सभ्यता का विपरीत असर कई परिवारों में देखने को मिलता है। बच्चों की पढ़ाई के समय परिवार के सदस्य दूरदर्शन पर अपने मनपसन्द कार्यक्रम देखने लगते हैं। घर का वातावरण सिनेमा हॉल में बदल जाता है। बच्चों का भविष्य, उनकी प्रगति सबकुछ शोरगुल में डूब जाता है।
ग्रामीण परिवारों में शिक्षा वहाँ की मान्यताओं, भौगोलिक परिस्थितियों तथा कृषि कार्यों की आवश्यकताओं के आधार पर निर्धारित होती हैं। घर में कार्य की अधिकता के आधार पर बच्चों का स्कूल न जाना स्वतः ही तय हो जाया करता है। वर्तमान समय में ग्रामीण क्षेत्रों के परिवारों में शिक्षा के प्रति उत्साह देखा जा सकता है, तथापि शिक्षा सहमति-असहमति के मध्य देखी जा सकती है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि जैसी पारिवारिक परिस्थितियाँ होती हैं उसी के अनुरूप शिक्षा का स्वरूप भी परिवर्तित होता रहता है। जटिल पारिवारिक परिस्थितियाँ श्क्षिा के मार्ग को बाधित करती हैं और अनुकूल पारिवारिक परिस्थितियाँ शिक्षा के मार्ग को सुगम बना देती हैं। किसी भी परिस्थिति में निर्धन वर्ग को बहुत कुछ सहना पड़ता है।

रविवार, 5 सितंबर 2010

बंधक बनाने वालों से कैसी बातचीत?

क्या भारत सरकार को उन संगठनों से बातचीत करनी चाहिए जो लोगों को बंधक बनाकर अपनी माँगें मनवाना चाहते हैं?

बीस साल पहले तत्कालीन गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद को विदेशी /कश्मीरी चरमपंथियों के चंगुल से छुड़वाने का मामला हो या फिर इंडियन एअरलाइंस के विमान को छुड़वाने के लिए कश्मीरी चरमपंथियों की रिहाई का मामला हो भारत सरकार के पास बंधक-संकट से निपटने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है.

हालाँकि यासिर अराफ़ात से लेकर काँग्रेस समर्थक पाँडे बंधु तक विमान अपहरण करके अपनी माँगे मनवाने की कोशिश कर चुके हैं. और अब बिहार में माओवादियों ने चार पुलिस वालों को बंधक बनाया हुआ था जिसमे से एक की ह्त्या भी कर दी गयी है
तो क्या बंधकों को बचाने के लिए सरकार को बंधक बनाने वालों से बातचीत करनी चाहिए या नहीं?

Empirical research(अनुभवजन्य अनुसंधान)

अनुभवजन्य और वैचारिक रूप से दो दृष्टिकोण हैं जिन्हें आमतौर पर एक शोध आयोजित करते समय नियोजित किया जाता है। संकल्पनात्मक को शोधकर्ताओं के रू...