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August, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ये कैसी राजनीति है !

मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देने के चलते देश में आतंकवाद फैल रहा है। धरती का स्वर्ग जम्मू-कश्मीर नरक के रूप में तब्दील हो गया है। घुसपैठियों को नागरिकता दिलाने की कोशिश की जा रही है, जबकि त्याग व सेवा के प्रतीक भगवा ध्वज को आतंक कहा जा रहा है।
भारत में स्वाधीनता के बाद भी अंग्रेजी कानून और मानसिकता जारी है। इसीलिए इस्लामी, ईसाई और वामपंथी आतंकवाद के सामने ‘भगवा आतंक’ का शिगूफा कांग्रेसी नेता छेड़ रहे हैं। इसकी आड़ में वे उन हिन्दू संगठनों को लपेटने के चक्कर में हैं, जिनकी देशभक्ति तथा सेवा भावना पर विरोधी भी संदेह नहीं करते। किसी समय इस झूठ मंडली की नेता सुभद्रा जोशी हुआ करती थीं; पर अब लगता है इसका भार चिदम्बरम और दिग्विजय सिंह ने उठा लिया है।

ये कैसी मानसिकता है !

भारत में स्वाधीनता के बाद भी अंग्रेजी कानून और मानसिकता जारी है। इसीलिए इस्लामी, ईसाई और वामपंथी आतंकवाद के सामने ‘भगवा आतंक’ का शिगूफा कांग्रेसी नेता छेड़ रहे हैं। इसकी आड़ में वे उन हिन्दू संगठनों को लपेटने के चक्कर में हैं, जिनकी देशभक्ति तथा सेवा भावना पर विरोधी भी संदेह नहीं करते। किसी समय इस झूठ मंडली की नेता सुभद्रा जोशी हुआ करती थीं; पर अब लगता है इसका भार चिदम्बरम और दिग्विजय सिंह ने उठा लिया है।
ये लोग हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबेल्स के चेले हैं। उसके दो सिद्धांत थे। एक – किसी भी झूठ को सौ बार बोलने से वह सच हो जाता है। दो – यदि झूठ ही बोलना है, तो सौ गुना बड़ा बोलो। इससे सबको लगेगा कि बात भले ही पूरी सच न हो; पर कुछ है जरूर। इसी सिद्धांत पर चलकर ये लोग अजमेर, हैदराबाद, मालेगांव या गोवा आदि के बम विस्फोटों के तार हिन्दू संस्थाओं से जोड़ रहे हैं। उन्हें लगता है कि दुनिया भर में फैले इस्लामी आतंकवाद के सामने इसे खड़ाकर भारत में मुसलमान वोटों की फसल काटी जा सकती है। सच्चर, रंगनाथ मिश्र और सगीर अहमद रिपोर्टों की कवायद के बाद यह उनका अगला कदम है।
सच तो यह है कि आतंकवाद का हिन्दुओं …

कहाँ तक सही है ?

आज जामिया मिल्लिया इस्लामिया विशाविध्यल्या में हिंदी विभाग के विभाग्यध्क्ष्य श्री अब्दुल बिस्मिल्हा जी ने कहा की समकालीन में मुस्लिम साहित्यकारों की पुस्तकों या रचनाओ को पढ़ा नहीं जा रहा है ,वे एक परिचर्चा में बोल रहे थे . परिचर्चा का विषय था ,साहित्य और आधुनिक समकालीन हिंदी , परिचर्चा के मुख्य अथिथि थे विवेक कुमार दुबे , बिसमिला जी ने कहा की प्रकाशको द्वारा भी मुस्लिम लेखको की अवहेलना की जाती है .आप सभी लेखक बंधू इस वक्तव्य को कहा तक उचित मानते है ? क्या सच में एसा हो रहा है ?

बदली बदली सी नज़र आयेगी कांग्रेस ....

लगातार चौथी बार कांग्रेस की सत्ता को संभालने के लिए सोनिया गांधी बेहद आतुर नजर आ रही हैं। हालात देखकर उनकी ताजपोशी मुकम्मल ही मानी जा रही है। अपनी नई पारी में सोनिया गांधी के तेवर कड़े होने की बात कही जा रही है। खामोशी के साथ लंबे समय से कांग्रेस और सरकार का तांडव देख रहीं सोनिया अपनी चौथी पारी में कांग्रेस के साथ ही साथ सरकार को भी नए क्लेवर में प्रस्तुत कर सकतीं हैं। मजे की बात यह है कि इस काम में वे किसी घाट राजनेता के बजाए अपनी व्यक्तिगत मित्रमण्डली और राहुल गांधी की मदद ले रही हैं, आखिर राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी जो करनी है।
अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का चेहरा सवा सौ साल पुराना हो चुका है। कांग्रेस ने अपने इस जीवनकाल में अनेक उतार चढ़ाव देखे होंगे पर पिछले दो दशकों में कांग्रेस ने अपना जो चेहरा देखा है, वह भूलना उसके लिए आसान नजर नहीं आ रहा है। वैसे भी जब से श्रीमति सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद संभाला है, उसके बाद से उनका दिन का चैन और रात की नींद हराम ही नजर आ रही है। दस साल से अधिक के अपने अध्यक्षीय सफर के उपरांत अब श्रीमति सोनिया गांधी ने कांग्रेस और कांग्रेसनी…

राष्ट्रमंडल खेल बनाम भ्रष्टाचार

आखिर जिस बात का डर था वही हुआ। इससे पहले कि राष्ट्रमंडल खेल शुरू होते भ्रष्टाचार का हाहाकार मच गया। अब चाहे सरकार हो, ओलंपिक कमेटी या फिर दूसरे सभी लोग, खेलों का आयोजन उनके लिए दूसरे नंबर की प्राथमिकता हो गई। आरोप-प्रत्यारोप, जांच, बर्खास्तगी, निलंबन, संसद में हंगामा और मीडिया में धुआंधार कवरेज पहली प्राथमिकता बन गई है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि खेलों के आयोजन में कुछ न कुछ गड़बडि़यां हो रही हैं, कुछ न कुछ गोलमाल, घालमेल चल रहा है। संसद में सुबह से शाम तक राष्ट्रमंडल खेलों में गड़बडि़यों का हल्ला मच रहा है। और तो और खेल मंत्री को यहां तक कहना पड़ा कि भारत एशियाई खेल आयोजित करने का बहुत इच्छुक नहीं है। मतलब यह है कि दूध का जला अब छाछ भी पीने को तैयार नहीं है। टीएस दरबारी, संजय महेंद्रू, अनिल खन्ना और एम जयचंद्रन को खेलों के आयोजन से हटा दिया गया है। जितनी सरकारी एजेंसियां हैं, सबकी निगाहें खेलों के आयोजन में हो रही गड़बडि़यों की ओर लगी हुई हैं। आयोजन समिति के दफ्तर में तनाव का माहौल है और सभी सहमे हुए हैं। कोई किसी किस्म का फैसला लेने से डर रहा है, क्योंकि सबको भय है कि कल…

स्त्री विमर्श के बहाने- यथार्थ

आज वर्तमान समय में चाहे भारतीय समाज कितनी ही तीव्र गति से उन्नति कर रहा हो, परन्तु आज भी कहीं न कहीं स्त्री की इच्छाओं को कुचल दिया जाता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि औसत भारतीय स्त्री की स्थिति न केवल परिवार में, बल्कि परिवार के बाहर भी अतिशय दयनीय है। उसके बस कर्त्तव्य ही कर्त्तव्य हैं, अधिकार कोई नहीं है। परिवार की आय और संपत्ति में स्त्री का कोई हिस्सा नहीं है। यहां तक कि मकान में भी वह मेहमान की तरह रहती है और पति के नाराज होने पर उसे कभी भी सड़क पर खड़ा किया जा सकता है। कार्य स्थल पर उसका तरह-तरह से शोषण और अपमान होता है। स्त्री की यौनिकता का तो जैसे कोई अर्थ ही नहीं है। यौन शोषण और बलात्कार की बढ़ती हुई संख्या ने हर स्त्री में असुरक्षा की भावना भर दी है।
यह संतोष की बात है कि हिन्दी के स्त्री लेखन में और खासकर स्त्री विमर्श में स्त्री की इस ट्रेजेडी के प्रति गहरा सरोकार दिखता है। प्रश्न यह है कि यह सरोकार स्त्री विमर्श तक सीमित रहेगा या सामाजिक सक्रियता के स्तर पर भी इसकी अभिव्यक्ति होगी?

यह सवाल इसलिए अत्यंत प्रासंगिक है कि हिंदुस्तान की स्त्रियों में शिक्षा तथा जागरूकता की कमी …

स्त्री विमर्श के बहाने- यथार्थ

आज वर्तमान समय में चाहे भारतीय समाज कितनी ही तीव्र गति से उन्नति कर रहा हो, परन्तु आज भी कहीं न कहीं स्त्री की इच्छाओं को कुचल दिया जाता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि औसत भारतीय स्त्री की स्थिति न केवल परिवार में, बल्कि परिवार के बाहर भी अतिशय दयनीय है। उसके बस कर्त्तव्य ही कर्त्तव्य हैं, अधिकार कोई नहीं है। परिवार की आय और संपत्ति में स्त्री का कोई हिस्सा नहीं है। यहां तक कि मकान में भी वह मेहमान की तरह रहती है और पति के नाराज होने पर उसे कभी भी सड़क पर खड़ा किया जा सकता है। कार्य स्थल पर उसका तरह-तरह से शोषण और अपमान होता है। स्त्री की यौनिकता का तो जैसे कोई अर्थ ही नहीं है। यौन शोषण और बलात्कार की बढ़ती हुई संख्या ने हर स्त्री में असुरक्षा की भावना भर दी है।
यह संतोष की बात है कि हिन्दी के स्त्री लेखन में और खासकर स्त्री विमर्श में स्त्री की इस ट्रेजेडी के प्रति गहरा सरोकार दिखता है। प्रश्न यह है कि यह सरोकार स्त्री विमर्श तक सीमित रहेगा या सामाजिक सक्रियता के स्तर पर भी इसकी अभिव्यक्ति होगी?

यह सवाल इसलिए अत्यंत प्रासंगिक है कि हिंदुस्तान की स्त्रियों में शिक्षा तथा जागरूकता की कम…

आजादी की 63 वी वर्षगाँठ पर हार्दिक बधाई

आजादी की 63 वी वर्षगाँठ पर हार्दिक बधाई, शुभकामनाये.ये दिन है आजादी का जश्न मनाने का, उन शहीदों और वीर पुरुष, महिलाओ को नमन करने का जिन्होंने हमें ये आजादी सौपी है, उन बहादुर सैनिको की याद में आँखे नम करने का जिन्होंने आजाद भारत के लिए अपनी शहादत दी है, उन लाखो सैनिको और जागरूक नागरिको को सलाम करने का जो देश को बुलंदियों की ओर जा रहे हैं.
कोई बात है इस देश की मिटटी में जिसकी खुशबु ही मर मिटने का जज्बा पैदा कर देती है, देश के लिए प्राण देने के वालो की फसल तैयार करती रहती है.हालाँकि वक़्त बदला है क्योंकि भारत मां अब बलिदान नहीं योगदान मांगती है. इसकी 1 अरब 20 करोड़ संताने ही इसकी ताकत हैं.कुछ बच्चे बिगड़ गए हैं लेकिन फिर भी इस भीड़ में लाखो भगत और बिस्मिल घूम रहे हैं जिनका एक ही धर्म है "भारतीय",एक ही जाति "भारतीय" एक ही मकसद है "स्वाबलंबी और मजबूत भारत"
भारतीय - एक शब्द जिसके आगे हर सम्मान, हर उपाधि, हर पुरुस्कार छोटा लगता है,
मुझे गर्व है कि मैं इस देश में पैदा हुआ जहाँ देवता भी जन्म लेने को तरसते हैं, मुझे गर्व है कि मैं भारतीय हूँ. आइये अपने इतिहास से प्रे…