सोमवार, 30 अगस्त 2010

ये कैसी राजनीति है !

मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देने के चलते देश में आतंकवाद फैल रहा है। धरती का स्वर्ग जम्मू-कश्मीर नरक के रूप में तब्दील हो गया है। घुसपैठियों को नागरिकता दिलाने की कोशिश की जा रही है, जबकि त्याग व सेवा के प्रतीक भगवा ध्वज को आतंक कहा जा रहा है।
भारत में स्वाधीनता के बाद भी अंग्रेजी कानून और मानसिकता जारी है। इसीलिए इस्लामी, ईसाई और वामपंथी आतंकवाद के सामने ‘भगवा आतंक’ का शिगूफा कांग्रेसी नेता छेड़ रहे हैं। इसकी आड़ में वे उन हिन्दू संगठनों को लपेटने के चक्कर में हैं, जिनकी देशभक्ति तथा सेवा भावना पर विरोधी भी संदेह नहीं करते। किसी समय इस झूठ मंडली की नेता सुभद्रा जोशी हुआ करती थीं; पर अब लगता है इसका भार चिदम्बरम और दिग्विजय सिंह ने उठा लिया है।

ये कैसी मानसिकता है !

भारत में स्वाधीनता के बाद भी अंग्रेजी कानून और मानसिकता जारी है। इसीलिए इस्लामी, ईसाई और वामपंथी आतंकवाद के सामने ‘भगवा आतंक’ का शिगूफा कांग्रेसी नेता छेड़ रहे हैं। इसकी आड़ में वे उन हिन्दू संगठनों को लपेटने के चक्कर में हैं, जिनकी देशभक्ति तथा सेवा भावना पर विरोधी भी संदेह नहीं करते। किसी समय इस झूठ मंडली की नेता सुभद्रा जोशी हुआ करती थीं; पर अब लगता है इसका भार चिदम्बरम और दिग्विजय सिंह ने उठा लिया है।
ये लोग हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबेल्स के चेले हैं। उसके दो सिद्धांत थे। एक – किसी भी झूठ को सौ बार बोलने से वह सच हो जाता है। दो – यदि झूठ ही बोलना है, तो सौ गुना बड़ा बोलो। इससे सबको लगेगा कि बात भले ही पूरी सच न हो; पर कुछ है जरूर। इसी सिद्धांत पर चलकर ये लोग अजमेर, हैदराबाद, मालेगांव या गोवा आदि के बम विस्फोटों के तार हिन्दू संस्थाओं से जोड़ रहे हैं। उन्हें लगता है कि दुनिया भर में फैले इस्लामी आतंकवाद के सामने इसे खड़ाकर भारत में मुसलमान वोटों की फसल काटी जा सकती है। सच्चर, रंगनाथ मिश्र और सगीर अहमद रिपोर्टों की कवायद के बाद यह उनका अगला कदम है।
सच तो यह है कि आतंकवाद का हिन्दुओं के संस्कार और व्यवहार से कोई तालमेल नहीं है। वैदिक, रामायण या महाभारत काल में ऐसे लोगों को असुर या राक्षस कहते थे। वे निरपराध लोगों को मारते और गुलाम बनाते थे। इसे ही साहित्य की भाषा में कह दिया गया कि वे लोगों को खा लेते थे; पर वर्तमान आतंकवादी उनसे भी बढ़कर हैं। ये विधर्मियों को ही नहीं, स्वधर्मियों और स्वयं को भी मार देते हैं।
हिन्दू चिंतन में ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की भावना और भोजन से पूर्व गाय, कुत्तो और कौए के लिए भी अंश निकालने का प्रावधान है। ‘अतिथि देवो भव’ का सूत्र तो शासन ने भी अपना लिया है। अपनी रोटी खाना प्रकृति, दूसरे की रोटी खाना विकृति और अपनी रोटी दूसरे को खिला देना संस्कृति है। यह संस्कृति हर हिन्दू के स्वभाव में है। ऐसे लोग आतंकवादी नहीं हो सकते; पर मुसलमान वोटों के लिए एक-दो दुर्घटनाओं के बाद कुछ सिरफिरों को पकड़कर उसे ‘भगवा आतंक’ कहा जा रहा है।
कांग्रेस वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या विश्व हिन्दू परिषद और लश्कर, सिमी या हजारों नामों से काम करने वाले इन आतंकी गिरोहों को न जानते हों, यह भी असंभव है; पर आखों पर जब काला चश्मा लगा हो, तो फिर सब काला दिखेगा ही।
संघ को समझने के लिए बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं होती। देश भर में हर दिन सुबह-शाम संघ की लगभग 50,000 शाखाएं सार्वजनिक स्थानों पर लगती हैं। इनमें से किसी में भी जाकर संघ को समझ सकते हैं। शाखा में प्रारम्भ के 40 मिनट शारीरिक कार्यक्रम होते हैं। बुजुर्ग लोग आसन करते हैं, तो नवयुवक और बालक खेल व व्यायाम। इसके बाद वे कोई देशभक्तिपूर्ण गीत बोलते हैं। किसी महामानव के जीवन का कोई प्रसंग स्मरण करते हैं और फिर भगवा ध्वज के सामने पंक्तियों में खड़े होकर भारत माता की वंदना के साथ एक घंटे की शाखा सम्पन्न हो जाती है।
मई-जून मास में देश भर में संघ के एक सप्ताह से 30 दिन तक के प्रशिक्षण वर्ग होते हैं। प्रत्येक में 100 से लेकर 1,000 तक शिक्षार्थी भाग लेते हैं। इनके समापन कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में जनता तथा पत्रकार आते हैं। प्रतिदिन समाज के प्रबुध्द एवं प्रभावी लोगों को भी बुलाया जाता है। आज तक किसी शिक्षार्थी, शिक्षक या नागरिक ने नहीं कहा कि उसे इन शिविरों में हिंसक गतिविधि दिखाई दी है।
संघ के स्वयंसेवक देश में हजारों संगठन तथा संस्थाएं चलाते हैं। इनके प्रशिक्षण वर्ग भी वर्ष भर चलते रहते हैं। इनमें भी लाखों लोग भाग ले चुके हैं। विश्व हिन्दू परिषद वाले सत्संग और सेवा कार्यों का प्रशिक्षण देते हैं। बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी वाले नियुद्ध ि(जूडो, कराटे) तथा एयर गन से निशानेबाजी भी सिखाते हैं। इससे मन में साहस का संचार होकर आत्मविश्वास बढ़ता है। इन शिविरों के समापन कार्यक्रम भी सार्वजनिक होते हैं। संघ और संघ प्रेरित संगठनों का व्यापक साहित्य प्राय: हर बड़े नगर के कार्यालय पर उपलब्ध है। अब तक हजारों पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं तथा करोड़ों पुस्तकें बिकी होंगी। किसी पाठक ने यह नहीं कहा कि उसे इस पुस्तक में से हिंसा की गंध आती है।
सच तो यह है कि जिस व्यक्ति, संस्था या संगठन का व्यापक उद्देश्य हो, जिसे हर जाति, वर्ग, नगर और ग्राम के लाखों लोगों को अपने साथ जोड़ना हो, वह हिंसक हो ही नहीं सकता। हिंसावादी होने के लिए गुप्तता अनिवार्य है और संघ का सारा काम खुला, सार्वजनिक और संविधान की मर्यादा में होता है। संघ पर 1947 के बाद तीन बार प्रतिबंध लग चुका है। उस समय कार्यालय पुलिस के कब्जे में थे। तब भी उन्हें वहां से कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली।
दूसरी ओर आतंकी गिरोह गुप्त रूप से काम करते हैं। वे इस्लामी हों या ईसाई, नक्सली हों या माओवादी कम्यूनिस्ट; सब भूमिगत रहकर काम करते हैं। उनके पर्चे किसी बम विस्फोट या नरसंहार के बाद ही मिलते हैं। उनके प्रशिक्षण शिविर पुलिस, प्रशासन या जनता की नजरों से दूर घने जंगलों में होते हैं। ये गिरोह जनता, व्यापारी तथा सरकारी अधिकारियों से जबरन धन वसूली करते हैं। न देने वाले की हत्या इनके बायें हाथ का खेल है। ऐसे सब गिरोहों को बड़ी मात्रा में विदेशों से भी धन तथा हथियार मिलते हैं।
हिन्दू संगठनों की प्रेरणा हिन्दू धर्मग्रन्थ ही होते हैं; और किसी धर्मग्रन्थ में निरपराध लोगों की हत्या करने को नहीं कहा गया हैं। हां, अत्याचारी का वध जरूर होना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता का तो यही संदेश है; लेकिन दूसरी ओर इस्लाम, ईसाई या कम्युनिस्टों के मजहबी ग्रन्थों में अपने विरोधी को किसी भी तरह से मारना उचित कहा गया है। विश्व भर में फैली मजहबी हिंसा का कारण यही किताबें हैं। अधिकांश लोग इन्हें गलती से धर्मग्रन्थ कह देते हैं, जबकि ये मजहबी किताबें हैं।
संघ और वि.हि.परिषद का जन्म हिन्दू समाज को संगठित करने के लिए हुआ है; और हिंसा से विघटन पैदा होता है, संगठन नहीं। संघ मुस्लिम और ईसाई तुष्टीकरण का विरोधी है। वह उस मनोवृति का भी विरोधी है, जिसने देश को बांटा और अब अगले बंटवारे के षडयन्त्र रच रहे हैं। इसके बाद भी संघ का हिंसा में विश्वास नहीं है। वह मुसलमान तथा ईसाइयों में से भी अच्छे लोगों को खोज रहा है। संघ किसी को अछूत नहीं मानता। उसे सबके बीच काम करना है और सबको जोड़ना है। ऐसे में वह किसी वर्ग, मजहब या पंथ के सब लोगों के प्रति विद्वेष रखकर नहीं चल सकता।
इसलिए भगवा आतंक का शिगूफा केवल और केवल एक षड्यंत्र है। यह खिसियानी बिल्ली के खंभा नोचने का प्रयास मात्र है। दिग्विजय सिंह हों या उनकी महारानी, वे आज तक किसी इस्लामी आतंकवादी को फांसी नहीं चढ़ा सके हैं। अब भगवा आतंक का नाम लेकर वे इस तराजू को बराबर करना चाहते हैं। उनका यह षड्यंत्र हर बार की तरह इस बार भी विफल होगा।

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

कहाँ तक सही है ?

आज जामिया मिल्लिया इस्लामिया विशाविध्यल्या में हिंदी विभाग के विभाग्यध्क्ष्य श्री अब्दुल बिस्मिल्हा जी ने कहा की समकालीन में मुस्लिम साहित्यकारों की पुस्तकों या रचनाओ को पढ़ा नहीं जा रहा है ,वे एक परिचर्चा में बोल रहे थे . परिचर्चा का विषय था ,साहित्य और आधुनिक समकालीन हिंदी , परिचर्चा के मुख्य अथिथि थे विवेक कुमार दुबे , बिसमिला जी ने कहा की प्रकाशको द्वारा भी मुस्लिम लेखको की अवहेलना की जाती है .आप सभी लेखक बंधू इस वक्तव्य को कहा तक उचित मानते है ? क्या सच में एसा हो रहा है ?

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

बदली बदली सी नज़र आयेगी कांग्रेस ....

लगातार चौथी बार कांग्रेस की सत्ता को संभालने के लिए सोनिया गांधी बेहद आतुर नजर आ रही हैं। हालात देखकर उनकी ताजपोशी मुकम्मल ही मानी जा रही है। अपनी नई पारी में सोनिया गांधी के तेवर कड़े होने की बात कही जा रही है। खामोशी के साथ लंबे समय से कांग्रेस और सरकार का तांडव देख रहीं सोनिया अपनी चौथी पारी में कांग्रेस के साथ ही साथ सरकार को भी नए क्लेवर में प्रस्तुत कर सकतीं हैं। मजे की बात यह है कि इस काम में वे किसी घाट राजनेता के बजाए अपनी व्यक्तिगत मित्रमण्डली और राहुल गांधी की मदद ले रही हैं, आखिर राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी जो करनी है।
अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का चेहरा सवा सौ साल पुराना हो चुका है। कांग्रेस ने अपने इस जीवनकाल में अनेक उतार चढ़ाव देखे होंगे पर पिछले दो दशकों में कांग्रेस ने अपना जो चेहरा देखा है, वह भूलना उसके लिए आसान नजर नहीं आ रहा है। वैसे भी जब से श्रीमति सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद संभाला है, उसके बाद से उनका दिन का चैन और रात की नींद हराम ही नजर आ रही है। दस साल से अधिक के अपने अध्यक्षीय सफर के उपरांत अब श्रीमति सोनिया गांधी ने कांग्रेस और कांग्रेसनीत संप्रग सरकार का चेहरा मोहरा बदलने की ठान ही ली है।

इस साल सितम्बर माह के मध्य में कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर श्रीमति सोनिया गांधी की ताजपोशी में कोई संदेह नहीं दिख रहा है। इसके लिए यह आवश्यक होगा कि 2 सितम्बर तक कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए कोई अपनी दावेदारी पेश न करे। अगर एसा होता है तो 02 सितम्बर के उपरांत चुनाव अवश्यंभावी हो जाएंगे। वैसे तो उम्मीद की जा रही है कि 02 सितम्बर तक कोई कांग्रेसी नेता अध्यक्ष पद के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत न करे। अगर एसा होता है तो 02 सितम्बर को नामांकन की समय सीमा की समाप्ति के साथ ही श्रीमति सोनिया गांधी की चौथी मर्तबा ताजपोशी की घोषणा कर दी जाएगी।

कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि यूपीए सरकार पार्ट टू में सरकार की मुश्किलों और परेशानी बढ़ाने वाले नुमाईंदों पर सोनिया गांधी ने बारीक नजर रखी है। अब तक चुप्पी साधे रखने वाली श्रीमति सोनिया गांधी आने वाले दिनों में अनेक खद्दरधारी नेताओं को नागवार गुजरने वाले कड़े कदम और फैसले लेने वाली हैं।

गौरतलब है कि कांग्रेसजन अपनी राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी पर यह दबाव बना रहे है कि 2014 में होने वाले आम चुनावों के पहले युवराज राहुल गांधी की ताजपोशी मुकम्मल कर दें, इसलिए सरकार और संगठन दोनों ही पर राहुल गांधी का नियंत्रण सार्वजनिक तौर पर सामने आने लगे। वर्तमान में राहुल गांधी की छवि विशुद्ध उत्तर प्रदेश विशेषकर अमेठी और रायबरेली के शुभचिंतक के तौर पर बनती जा रही है।

खबरें तो यहां तक हैं कि सत्ता और संगठन के कामकाज को लेकर मां बेटे अर्थात राहुल गांधी और श्रीमति सोनिया गांधी के बीच चर्चाओं के कई दौर हो चुके हैं। दोनों की ही भाव भंगिमाएं देखकर लगने लगा है कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है। पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस के आला मंत्रियों और कार्यकर्ता यहां तक कि पदाधिकारी भी नेतृत्व की चिंता किए बिना अनर्गल बयानबाजी जारी रखे हुए हैं।

पार्टी के अंदरूनी मामलातों में वरिष्ठ पदाधिकारियों का ढीला पोला रवैया, कांग्रेस की सूबाई इकाईयों का सुसुप्तावस्था में होना, एंटोनी कमेटी की रिपोर्ट की सरासर अनदेखी, मंत्रियों, पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं के बीच खाई पाटने के बजाए दूरी बढ़ते जाना, संगठनात्मक चुनावों में अनावश्क विलंब, जिन राज्यों मेें कांग्रेस विपक्ष में बैठी है, वहां बार बार जनता के बीच जाने के मुद्दे मिलने के बाद भी प्रदेश इकाईयों का पूरी तरह निष्क्रीय होना, युवाओं एवं पढ़े लिखों के साथ ही साथ कांग्रेस का परांपरागत आदिवासी वोट बैंक का धरातल खिसकना आदि बातो ंपर सोनिया गांधी बहुत ही चिंतित प्रतीत हो रही हैं।

इंडियन प्रीमियर लीग में कांग्रेस के मंत्रियों की हुई फजीहत, कामन वेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार की जबर्दस्त गूंज, लंबे समय तक मंहगाई का बना रहना, शर्म अल शेख से लेकर पाकिस्तान में इस्लामाद तक हुई फजीहत, काश्मीर के आतंकवादी, पूर्वोत्तर में अलगाववादी, देश भर में नक्सलवादी चुनौतियां, मंत्रियों की आपस में खींचतान और पार्टी लाईन से हटकर अनर्गल बयानबाजी, नौकरशाही में शीर्ष पदों पर काबिज होने के लिए मची होड़ और इसके लिए सरकार को बार बार कटघरे में खड़ा करना, महिला आरक्षण बिल का परवान न चढ़ पाना, खाद्य सुरक्षा विधेयक के मामले में सरकार और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का अलग अलग सुरों में राग अलापना, देश की जनता के फटेहाल रहने के बावजूद भी सांसदों का वेतन बढ़ाने को लेकर हंगामा और फिर वेतन बढ़ाने की सिफारिश के बाद सरकार का सांसदों के सामने घुटने टेकना, शिक्षा के अधिकार कानून का औंधे मुंह गिर जाना, करोड़ों टन अनाज का सड़ जाना, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक, दलित जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकारी नीतियों का कागजों पर ही सिमटे होना जैसे अनेक मामलों को लेकर कांग्रेस का नेतृत्व निश्चित तौर पर अपने आप को असहज ही महसूस कर रहा होगा।

मामला कुछ इस तरह का भी सामने आया है कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के उपर भारी दबाव है कि वे राहुल गांधी को जल्द ही फ्रंटफुट पर लाएं वरना आने वाले दिनों में कांग्रेस का नामलेवा भी नहीं बचेगा। संभवतः यही कारण है कि पिछले दिनों कुछ समाचार चेनल्स ने सोनिया गांधी की पुत्री श्रीमति प्रियंका वढेरा के हेयर स्टाईल को देखकर ही सारे दिन खबर चलाई और प्रियंका की तुलना उनकी नानी एवं पूर्व प्रधानमंत्री स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी से करना आरंभ कर दिया है। इसके पहले लोकसभा चुनावों के दरम्यान चेनल्स ने प्रियंका द्वारा श्रीमति इंदिरा गांधी की साड़ी पहनने की खबरें दिखाकर उस समय भी प्रियंका की तुलना श्रीमति इंदिरा गांधी से की गई थी। अरे भई, प्रियंका कोई और नहीं स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी की नातिन है, सो वह लगेंगी ही इंदिरा जी जैसी इसमें अजूबे वाली क्या बात है? जो इलेक्ट्रानिक मीडिया पिल पड़ा एक साथ।

कहा जा रहा है कि अगर श्रीमति सोनिया गांधी की ताजपोशी चौथी बार अध्यक्ष के तौर पर हो गई तो संसद सत्र के अवसान के उपरांत और 25 सितम्बर से पितरों के मास आरंभ होने के पहले कांग्रेस और सरकार दोनों ही नए क्लेवर में नजर आने वाले हैं। वैसे भी योजना आयोग द्वारा मंत्रियों के कामकाज की एक साल के उपरांत की पहली तिमाही की समीक्षा लगभग पूरी होने को है, इसके उपरांत योजना आयोग अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप देगा।

अमूमन जैसा होता आया है कि इस रिपोर्ट पर प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी सर जोड़ कर बैठ जाएंगे, फिर मंत्रियों को साईज में लाने का काम किया जाएगा। इस दौरान अनेक मंत्रियों के विभागों को बदलकर या तो वजनदार विभाग या फिर कम महत्व के विभाग सौंपे जाएंगे। यह काम सिर्फ कांग्रेस के कोटे के मंत्रियों के साथ ही संभव होगा, क्योंकि गठबंधन की बैसाखी को छेड़ना श्रीमति सोनिया गांधी के बूते की बात दिख नहीं रही है, तभी तो शरद पवार और ममता बनर्जी जैसे मंत्री पूरी तरह से मनमानी पर उतारू हैं, और कांग्रेस अध्यक्ष हैं कि मूकदर्शक बनी बैठी हैं।

सरकार का नया चेहरा बनाने के उपरांत फिर बारी आएगी कांग्रेस के अपने संगठन की, सो इसमें सोनिया गांधी तबियत से कैंची चला सकती हैं। कांग्रेस में पद धारण करने वाले निष्क्रिय होने का तगमा धारित अनेक पदाधिकारियों को संगठन के महत्वपूर्ण पदों से हटाया जा सकता है, साथ ही युवा एवं काम करने वाले लोगों को पारितोषक मिलने की उम्मीद भी जगने लगी है। सोनिया द्वारा अगर अपने पुत्र राहुल गांधी को कार्यकारी अध्यक्ष या उपाध्यक्ष पद से नवाज दिया जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

बुधवार, 25 अगस्त 2010

राष्ट्रमंडल खेल बनाम भ्रष्टाचार

आखिर जिस बात का डर था वही हुआ। इससे पहले कि राष्ट्रमंडल खेल शुरू होते भ्रष्टाचार का हाहाकार मच गया। अब चाहे सरकार हो, ओलंपिक कमेटी या फिर दूसरे सभी लोग, खेलों का आयोजन उनके लिए दूसरे नंबर की प्राथमिकता हो गई। आरोप-प्रत्यारोप, जांच, बर्खास्तगी, निलंबन, संसद में हंगामा और मीडिया में धुआंधार कवरेज पहली प्राथमिकता बन गई है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि खेलों के आयोजन में कुछ न कुछ गड़बडि़यां हो रही हैं, कुछ न कुछ गोलमाल, घालमेल चल रहा है। संसद में सुबह से शाम तक राष्ट्रमंडल खेलों में गड़बडि़यों का हल्ला मच रहा है। और तो और खेल मंत्री को यहां तक कहना पड़ा कि भारत एशियाई खेल आयोजित करने का बहुत इच्छुक नहीं है। मतलब यह है कि दूध का जला अब छाछ भी पीने को तैयार नहीं है। टीएस दरबारी, संजय महेंद्रू, अनिल खन्ना और एम जयचंद्रन को खेलों के आयोजन से हटा दिया गया है। जितनी सरकारी एजेंसियां हैं, सबकी निगाहें खेलों के आयोजन में हो रही गड़बडि़यों की ओर लगी हुई हैं। आयोजन समिति के दफ्तर में तनाव का माहौल है और सभी सहमे हुए हैं। कोई किसी किस्म का फैसला लेने से डर रहा है, क्योंकि सबको भय है कि कल सीबीआई तथा दूसरी जांच एजेंसियां उनकी गर्दन पकड़ सकती हैं। इस माहौल में खीझ कर भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष और इन खेलों के कर्ताधर्ता सुरेश कलमाड़ी ने भी न्यायिक जांच कराने का प्रस्ताव दे दिया है। आयोजन समिति के दफ्तर में खेलों के शौकीन लोग बिना किसी लालच के मुफ्त में काम कर रहे थे। इज्जत बचाने के डर से अब वे भी वहां से भाग रहे हैं। मणिशंकर अय्यर और शरद यादव जैसे लोगों के चेहरे पर मुस्कान देखी जा सकती है और मुस्कान हो भी क्यों नहीं, उन्होंने जो कहा वह सच साबित हो रहा है।
इसमें कोई शक नहीं है कि कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर चल रहा है, अन्यथा इन अफसरों को हटाने की जरूरत नहीं थी। अखबारों में आरोप छपने के बाद कुछ पदाधिकारियों द्वारा इस्तीफा देने की जरूरत नहीं पड़ती। इस बात में भी अब कोई संदेह नहीं बचा है कि पूरे राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन और उसके लिए हुए निर्माण में आरोपों की जांच भी सरकार कराएगी। जांच का मतलब है कि साल भर जमकर मीडियाबाजी होगी, तमाम लोग पकड़े जाएंगे। उनकी बदनामी होगी। जब इतने आरोप लग चुके हैं तो जांच होनी भी चाहिए। सरकार के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह इसकी जांच कराए, क्योंकि तकरीबन 2500 करोड़ रुपये केंद्र सरकार ने इन खेलों के आयोजन पर खर्च किए हैं। ओलंपिक समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी का कहना है कि उन्होंने कोई गड़बड़ी नहीं की है। सब कुछ पारदर्शी ढंग से हुआ है और हर निर्णय में भारत सरकार के आला आईएएस अफसर शामिल थे। वित्त समिति हो या टेंडर समिति-सभी में ये अफसर थे। मीडिया में आरोपों की झड़ी और उसके बाद कलमाड़ी का प्रत्युत्तर इस पूरे आयोजन को और रहस्यमय बना देता है। इस हालत में इनकी जांच बहुत जरूरी है ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
इस सबके बावजूद आज की तारीख में हमारी पहली प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? भारत की इज्जत या कुछ व्यक्तियों की धरपकड़? मेरा सिर्फ इतना कहना है कि खेलों के आयोजन में 60 दिन भी नहीं बचे हैं। यह एक विश्व आयोजन है, पूरी दुनिया की निगाहें हमारी तरफ हैं। वैसे भी विदेशी लोगों ने खेल आयोजन की आलोचना शुरू कर दी है। अनेक नामी खिलाड़ी खेलों में भाग लेना नहीं चाहते। इस घमासान को बहाना बनाकर भारत न आने को उन्हें मौका मिल जाएगा। यह पहली बार हो रहा है कि ब्रिटेन की महारानी कॉमनवेल्थ खेलों का उद्घाटन करने नहीं आ रही हैं। फिर भी वह अपने बेटे राजकुमार चा‌र्ल्स को भेज रही हैं। मुझे डर है कि कहीं प्रिंस चा‌र्ल्स भी बहाना बनाकर अपनी यात्रा रद न कर दें, जो हमारे मुंह पर एक बड़ा तमाचा होगा। आज हम सबकी यह प्राथमिकता होनी चाहिए कि पहले हम इन खेलों को सफल बनाएं। इनकी सफलता से पूरे विश्व को चमत्कृत कर दें कि भारत सबसे अच्छा आयोजन कर सकता है। भारत का झंडा गाड़ दें। जब खेल समाप्त हो जाएं और सारे विदेशी मेहमान चले जाएं तब हम वह हल्ला बोलें जो हम आज बोल रहे हैं। जिसने भी गलती की हो उसकी जांच की जाए। कहीं किसी किस्म की कोताही न बरती जाए।
जो हल्ला बोल आज शुरू हो गया है वह सवा दो महीने बाद हो तो बेहतर है। तब तक कोई गड़बड़ी न हो, इसके लिए सरकार जिम्मेदार लोगों की कमेटी बना दे जो सारे फैसले ले। बेहतर होगा कि कुछ केंद्रीय मंत्रियों का एक समूह बना दिया जाए, जो महत्वपूर्ण फैसले ले और बाद में वे फैसले आयोजन समिति द्वारा लागू किए जाएं। वैसे भी चूंकि इन खेलों पर ज्यादातर पैसा भारत सरकार का लग रहा है इसलिए जरूरी हो जाता है कि भारत सरकार के हाथ में इसकी कमान दी जाए। खेल मंत्रालय और खेल प्राधिकरण की इतनी गलती थी कि जो पैसा उनको खर्च करना था उन्होंने आयोजन समिति के हाथ में दे दिया। शहरी विकास मंत्रालय ने ऐसे ठेकेदारों पर अंकुश नहीं रखा जो आदतन चार रुपये की चीज 14 में बनाते हैं, मगर ये सारी चीजें खेलों के बाद दुरुस्त की जा सकती हैं। अभी यदि ठेकेदारों, इंजीनियरों ने काम बंद कर दिया तो सब कुछ आधा-अधूरा रह जाएगा इसलिए पहले खेल पूरे हों और बाद में ये सब काम हों। वैसे हम इस तर्क से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि इस तरह के खेलों के आयोजन नहीं होने चाहिए और यह पैसे की बर्बादी है। फिर तो आप कुछ नहीं कर सकते हैं।
विकास के काम भी कोई क्यों करे, क्योंकि सबमें पैसा लगता है। जब इस तरह के आयोजन होते हैं तो हजारों लोगों को रोजगार मिलता है, नए निर्माण होते हैं और उद्योग व्यापार को भी बढ़ावा मिलता है। हजारों विदेशियों के आने से पर्यटन को भी बढ़ावा मिलता है। जिस शहर में आयोजन होता है उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलता है। जो भी विदेशी यहां आएंगे सब यहां पैसा खर्च करेंगे। कोई यहां से लाखों करोड़ डॉलर नहीं ले जा रहा है। सब इसी देश में व्यय होगा। इसके अलावा जो निर्माण कार्य होगा वह हमेशा के लिए मुकम्मल रहेगा और उसके तमाम फायदे उठाए जा सकते हैं। भारत यह सोच भी नहीं सकता है कि चीन ने ओलंपिक पर कितना पैसा खर्च किया। यदि चीन की कम्युनिस्ट सरकार यह सोच कर चलती कि खेलों का आयोजन पैसों की बर्बादी है तो वहां ओलंपिक का इतना भव्य आयोजन नहीं हो पाता। आज हम तो ओलंपिक की सोच भी नहीं सकते हैं। जब 70 देशों के राष्ट्रमंडल खेलों के लिए इतनी हाय-तौबा मची है तो ओलंपिक खेल लाने की हिम्मत कौन जुटा पाएगा!

स्त्री विमर्श के बहाने- यथार्थ

आज वर्तमान समय में चाहे भारतीय समाज कितनी ही तीव्र गति से उन्नति कर रहा हो, परन्तु आज भी कहीं न कहीं स्त्री की इच्छाओं को कुचल दिया जाता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि औसत भारतीय स्त्री की स्थिति न केवल परिवार में, बल्कि परिवार के बाहर भी अतिशय दयनीय है। उसके बस कर्त्तव्य ही कर्त्तव्य हैं, अधिकार कोई नहीं है। परिवार की आय और संपत्ति में स्त्री का कोई हिस्सा नहीं है। यहां तक कि मकान में भी वह मेहमान की तरह रहती है और पति के नाराज होने पर उसे कभी भी सड़क पर खड़ा किया जा सकता है। कार्य स्थल पर उसका तरह-तरह से शोषण और अपमान होता है। स्त्री की यौनिकता का तो जैसे कोई अर्थ ही नहीं है। यौन शोषण और बलात्कार की बढ़ती हुई संख्या ने हर स्त्री में असुरक्षा की भावना भर दी है।
यह संतोष की बात है कि हिन्दी के स्त्री लेखन में और खासकर स्त्री विमर्श में स्त्री की इस ट्रेजेडी के प्रति गहरा सरोकार दिखता है। प्रश्न यह है कि यह सरोकार स्त्री विमर्श तक सीमित रहेगा या सामाजिक सक्रियता के स्तर पर भी इसकी अभिव्यक्ति होगी?

यह सवाल इसलिए अत्यंत प्रासंगिक है कि हिंदुस्तान की स्त्रियों में शिक्षा तथा जागरूकता की कमी है। इसलिए उनके उत्थान के लिए सिर्फ पढ़ना-लिखना काफी नहीं है। पढ़ने-लिखने से बौद्धिक स्त्रियों का सम्मान भले ही बढ़ जाता हो और उनकी आमदनी में इजाफा हो जाता हो, पर इससे आम भारतीय स्त्री का कोई खास भला नहीं होता। उनकी जंजीरों के कसाव में कोई कमी नहीं आती। इसलिए हिन्दी में पहली बार दिखाई दे रहे स्त्री शक्ति के उभार का दायरा बढ़े और वह करोड़ों दीन-दुखी, शोषित-प्रताड़ित-अपमानित स्त्रियों की मुक्ति का धारदार औजार बने तो कितना अच्छा हो।
आज हमें एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था गढ़ने की आवश्यकता है जिसमें स्त्री परस्परता व पूरकता से जी पाये व समूची मानव जाति एक दूसरे की सहयोगी हो। जब तक परस्परता व पूरकता को नहीं अपनाया जायेगा, तब तक किसी भी मानवीय सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व्यवस्था का निर्माण नहीं हो पाएगा और न ही मानवीय स्थितियां समाज में कायम होंगी।वैदिक काल में पत्नी और माता के रूप में स्त्री को पर्याप्त अधिकार प्राप्त थे, किन्तु पुत्री के रूप में उसकी स्वीकार्यता पुत्र के समान नहीं थी। कई वेदमंत्रें में ऋषियों ने पुत्रजन्म की कामना की है। पुत्री की कामना करते मंत्र कहीं नहीं दिखते। कन्या के रूप में पुत्री की स्वीकार्यता सामान्यतया उस समय भी नहीं थी। यह स्थिति आज के वर्तमान युग तक चली आ रही है। कन्या भू्रण हत्या को लेकर वर्तमान में की गई चिंता के बीज शायद वैदिक काल से ही बोए गए जो कई सारे सवाल खड़ा करते हैं।
स्त्री के साथ भेद दृष्टि और लैंगिक असमानता के सैकड़ों संदर्भ समस्त धर्म, साहित्य और परम्परा में बिखरे पड़े हैं। कोई भी धर्म इससे अछूता नहीं है। वर्तमान मानव धरती पर कहीं परम्परावादी है, कहीं प्रगतिशील है और कहीं पर आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता का उस पर प्रभाव है तो कहीं विज्ञान व साम्यवाद के प्रभाव में उसका कार्य-व्यवहार है। लेकिन सभी जगह स्त्री-पुरुष समानता और स्त्री को मानव के रूप में प्रतिस्थापित करने के प्रयास आकांक्षाओं के रूप में ही दिखते हैं। वास्तविकता में इनका दर्शन दुर्लभ है। सम्प्रदाय मानसिकता में जीने वाली परम्पराएं मानव के रूप में स्त्री को प्रतिष्ठित नहीं कर पायी हैं। विडंबना यह है कि स्वयं पुरुष भी मानव के रूप में प्रतिष्ठित नहीं हो पाया है।
यदि तुलनात्मक रूप से देखा जाये तो पुरुष की भी स्थिति सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र में अच्छी नहीं है। कुछ पुरुषों द्वारा अन्य पुरुषों का शोषण जारी है और स्थितियां तेजी से बिगड़ रही हैं। स्वयं पुरुष भी चिन्तित है। पुरुष के पास भी उस मानवीय समझ का अभाव है जिसके प्रकाश में वह मानव के रूप में अभिव्यक्त हो पाता। उसकी जगह वह धन बल, रूपबल, पदबल, बाहुबल आदि के रूप में व्यक्त हो रहा है, इसी से सभी विषमताएं तैयार हुई हैं।
प्रश्न यह भी है कि पदार्थवादी चिंतन जो स्वयं अस्थिरता व अनिश्चितता के सिध्दान्त पर खड़ा है, वह कैसे न्याय व व्यवस्था जैसी स्थिरता की पहचान कर पायेगा। आज पूरे विश्व में पदार्थवादी और उपभोक्तावादी चिंतन से ओत-प्रोत शिक्षा का प्रभाव है जिससे मनुष्य नित नये द्वंद्व में फंसता जा रहा है। सभी मानव समुदाय आपस में असुरक्षित हैं। ऐसी अव्यवस्था में स्त्री को न्याय कहां मिलेगा? यह स्वयं विचारणीय प्रश्न है।
स्त्री-पुरुष शब्द अपने आप में संकीर्णता लिए हुए है। ‘स्त्री’ शब्द स्त्री की शरीरगत पहचान को ही प्रस्तुत कर पाता है, जबकि स्त्री, मानव के रूप में शरीर की सीमा से अधिक प्रकाशित है। यदि स्त्री को हम शरीरगत आधार पर पहचानने जाते हैं तो स्त्री-पुरुष के मध्य समानता के ध्रुव बिन्दुओं की पहचान कठिन हो जाती है।
दूसरी ओर ‘मानव’ शब्द में नर-नारी या स्त्री-पुरुष दोनों का सम्बोधन समाया हुआ है। यह आज की जरूरत है कि ‘स्त्री’ को ‘मानव’ के संदर्भ में देखा जाए। ‘मानव’ शब्द की महिमा अथवा प्रयोजन लिंग विधा से परे है अथवा भिन्न है। हम पाते हैं कि रूप, गुण, स्वभाव धर्म के संयुक्त रूप में ‘मानव’ शब्द अपना अर्थ प्राप्त करता है।
वर्तमान समय में जितनी भी राजनीतिक व आर्थिक न्यायिक व्यवस्थाएं प्रचलित हैं, वे परिवार संस्था को नहीं पहचानती हैं। ये सभी राजनीतिक सरंचनाएं व्यक्तिवादी सोच पर आधारित हैं। अत: परिवार संस्था धीरे-धीरे कमजोर हुई है। लेकिन यह सोचने की जरूरत है कि यदि परिवार ही नहीं रहेगा तो मनुष्य जियेगा कहां? परिवार ही वह जगह है जहां मनुष्य मानसिक, शारीरिक, आर्थिक सुरक्षा पाता है, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। अत: हमें स्त्री सशक्तिकरण को परिवार के संदर्भ में विशेषकर देखने की महती आवश्यकता है। विगत में नारीवादी सोच ने भी परिवार संस्था को ठेस पहुंचाई है। कहने का आशय यह बिल्कुल नहीं है कि परिवारों में नारी की स्थिति बहुत अच्छी है। निश्चित रूप से यहां अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
धर्म और राजनीति के मध्ययुगीन विचार आज धीरे-धीरे पुन: हावी होते जा रहे हैं। धर्म के नाम पर स्त्री के जीवन को पुन: घर में ही समेट देने की कवायद तो सभी इस्लामिक मुल्कों में चल रही है, लेकिन सभ्य कहे जाने वाले मुल्कों में भी बाजारवादी सोच के चलते स्त्री की सुंदर देह का भरपूर उपयोग किया जा रहा है।

दो तरह की अतियों से स्त्री का जीवन नर्क बना हुआ है पहली अति वह जिसे हम पश्चिम में देख रहे हैं। वहाँ की स्त्री ने स्वतंत्रता के नाम पर जो नग्नता दिखाई है, उसे लक्ष्मण रेखा को पार कर जाना ही कहा जाएगा। इस पश्चिमी नाच से घबराकर इस्लामिक मुल्कों में दूसरी तरह की अति शुरू हो चुकी है।
सवाल यह उठता है कि स्त्रियों को स्त्रियों की तरह होना चाहिए या स्त्रतंत्रता के नाम पर पुरुषों की तरह? आज हम देखते हैं कि पश्चिम में स्त्रियाँ स्वतंत्रता के चक्कर में प्रत्येक वह कार्य करती है जो पुरुष करता है। जैसे सिगरेट और शराब पीना, जिम ज्वाइन करना, तंग जिंस और शर्ट पहनना, देर तक पब में डांस करना और यहाँ तक ‍कि पुरुषों की हर वह स्टाइल अपनाना जो सिर्फ पुरुष के लिए ही है। क्या स्वतंत्रता का यही अर्थ है? पुरुष को पुरुष और स्त्री को स्त्री होने में लाखों वर्ष लगे हैं, लेकिन वर्तमान युग दोनों को दोनों जैसा नहीं रहने देगा। होमोसेक्सुअल लोगों की तादाद बढ़ने के कई और भी कारण हो सकते हैं। दरअसल यह पढ़े और समझे बगैर बौद्धिक, सम्पन्न और आधुनिक होने की जो होड़ चल पड़ी है इससे प्रत्येक व्यक्ति का चरित्र पाखंडी होता जा रहा है। हम टीवी चैनल और फिल्मों की संस्कृति में देखते हैं कि ये कैसे अजीब किस्म के चेहरे वाले लोग है। जरा भी सहजता नहीं। कहना होगा कि ये सभ्य किस्म के जाहिल लोग हैं। रियलिटी शो की रियलिटी से सभी परिचित है।

मीडिया, फिल्म और बाजार की स्वतंत्रता के दुरुपयोग के चलते इस तरह के फूहड़ प्रदर्शन के कारण ही धर्म और राजनीति के ठेकेदारों के मन में नैतिकता और धार्मिक ‍मूल्यों की रक्षा की चिंता बढ़ने लगी है। महिलाओं ने अभी अपना धर्म विकसित नहीं किया है और शायद भविष्य में भी नहीं कर पाएँगी। इसके लिए साहस, संकल्प और एकजुटता की आवश्यकता होती है। पुरुष जैसा होने की होड़ के चलते तो वह सभी क्षेत्र में किसी भी तरीके से बढ़- चढ़कर आगे आ जाएगी और आ भी रही हैं, लेकिन वह जिस तरह से अपनी स्वतंत्रता का प्रदर्शन कर रही है उससे खुद उसके सामने धर्म, समाज और राष्ट्र की आचार संहिताओं की चुनौतियाँ बढ़ती जाएँगी। जैसा आज हम देख रहे ‍हैं अफगानिस्तान और पाकिस्तान में क्या हो रहा है। पश्चिम की स्त्रियों ने स्वतंत्रता का जो निर्वस्त्र नाच दिखाया है उसी से घबराकर इस्लामिक मुल्कों में स्त्रियों पर ढेर सारी पाबंदियाँ लगाई जा रही है। यह दो तरह की अतिवादिता है।
महिला शक्ति को सलाम, लेकिन हमें सोचना होगा उन महिलाओं के बारे में जो बुरी स्थिति में हैं। असमानताओं के बारे में सोचा जाए जो आज भी समाज में कायम है। हम उसके लिए क्या कर सकते हैं यह सोचा जाना अब भी शेष है।

स्त्री विमर्श के बहाने- यथार्थ

आज वर्तमान समय में चाहे भारतीय समाज कितनी ही तीव्र गति से उन्नति कर रहा हो, परन्तु आज भी कहीं न कहीं स्त्री की इच्छाओं को कुचल दिया जाता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि औसत भारतीय स्त्री की स्थिति न केवल परिवार में, बल्कि परिवार के बाहर भी अतिशय दयनीय है। उसके बस कर्त्तव्य ही कर्त्तव्य हैं, अधिकार कोई नहीं है। परिवार की आय और संपत्ति में स्त्री का कोई हिस्सा नहीं है। यहां तक कि मकान में भी वह मेहमान की तरह रहती है और पति के नाराज होने पर उसे कभी भी सड़क पर खड़ा किया जा सकता है। कार्य स्थल पर उसका तरह-तरह से शोषण और अपमान होता है। स्त्री की यौनिकता का तो जैसे कोई अर्थ ही नहीं है। यौन शोषण और बलात्कार की बढ़ती हुई संख्या ने हर स्त्री में असुरक्षा की भावना भर दी है।
यह संतोष की बात है कि हिन्दी के स्त्री लेखन में और खासकर स्त्री विमर्श में स्त्री की इस ट्रेजेडी के प्रति गहरा सरोकार दिखता है। प्रश्न यह है कि यह सरोकार स्त्री विमर्श तक सीमित रहेगा या सामाजिक सक्रियता के स्तर पर भी इसकी अभिव्यक्ति होगी?

यह सवाल इसलिए अत्यंत प्रासंगिक है कि हिंदुस्तान की स्त्रियों में शिक्षा तथा जागरूकता की कमी है। इसलिए उनके उत्थान के लिए सिर्फ पढ़ना-लिखना काफी नहीं है। पढ़ने-लिखने से बौद्धिक स्त्रियों का सम्मान भले ही बढ़ जाता हो और उनकी आमदनी में इजाफा हो जाता हो, पर इससे आम भारतीय स्त्री का कोई खास भला नहीं होता। उनकी जंजीरों के कसाव में कोई कमी नहीं आती। इसलिए हिन्दी में पहली बार दिखाई दे रहे स्त्री शक्ति के उभार का दायरा बढ़े और वह करोड़ों दीन-दुखी, शोषित-प्रताड़ित-अपमानित स्त्रियों की मुक्ति का धारदार औजार बने तो कितना अच्छा हो।
आज हमें एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था गढ़ने की आवश्यकता है जिसमें स्त्री परस्परता व पूरकता से जी पाये व समूची मानव जाति एक दूसरे की सहयोगी हो। जब तक परस्परता व पूरकता को नहीं अपनाया जायेगा, तब तक किसी भी मानवीय सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व्यवस्था का निर्माण नहीं हो पाएगा और न ही मानवीय स्थितियां समाज में कायम होंगी।वैदिक काल में पत्नी और माता के रूप में स्त्री को पर्याप्त अधिकार प्राप्त थे, किन्तु पुत्री के रूप में उसकी स्वीकार्यता पुत्र के समान नहीं थी। कई वेदमंत्रें में ऋषियों ने पुत्रजन्म की कामना की है। पुत्री की कामना करते मंत्र कहीं नहीं दिखते। कन्या के रूप में पुत्री की स्वीकार्यता सामान्यतया उस समय भी नहीं थी। यह स्थिति आज के वर्तमान युग तक चली आ रही है। कन्या भू्रण हत्या को लेकर वर्तमान में की गई चिंता के बीज शायद वैदिक काल से ही बोए गए जो कई सारे सवाल खड़ा करते हैं।
स्त्री के साथ भेद दृष्टि और लैंगिक असमानता के सैकड़ों संदर्भ समस्त धर्म, साहित्य और परम्परा में बिखरे पड़े हैं। कोई भी धर्म इससे अछूता नहीं है। वर्तमान मानव धरती पर कहीं परम्परावादी है, कहीं प्रगतिशील है और कहीं पर आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता का उस पर प्रभाव है तो कहीं विज्ञान व साम्यवाद के प्रभाव में उसका कार्य-व्यवहार है। लेकिन सभी जगह स्त्री-पुरुष समानता और स्त्री को मानव के रूप में प्रतिस्थापित करने के प्रयास आकांक्षाओं के रूप में ही दिखते हैं। वास्तविकता में इनका दर्शन दुर्लभ है। सम्प्रदाय मानसिकता में जीने वाली परम्पराएं मानव के रूप में स्त्री को प्रतिष्ठित नहीं कर पायी हैं। विडंबना यह है कि स्वयं पुरुष भी मानव के रूप में प्रतिष्ठित नहीं हो पाया है।
यदि तुलनात्मक रूप से देखा जाये तो पुरुष की भी स्थिति सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र में अच्छी नहीं है। कुछ पुरुषों द्वारा अन्य पुरुषों का शोषण जारी है और स्थितियां तेजी से बिगड़ रही हैं। स्वयं पुरुष भी चिन्तित है। पुरुष के पास भी उस मानवीय समझ का अभाव है जिसके प्रकाश में वह मानव के रूप में अभिव्यक्त हो पाता। उसकी जगह वह धन बल, रूपबल, पदबल, बाहुबल आदि के रूप में व्यक्त हो रहा है, इसी से सभी विषमताएं तैयार हुई हैं।
प्रश्न यह भी है कि पदार्थवादी चिंतन जो स्वयं अस्थिरता व अनिश्चितता के सिध्दान्त पर खड़ा है, वह कैसे न्याय व व्यवस्था जैसी स्थिरता की पहचान कर पायेगा। आज पूरे विश्व में पदार्थवादी और उपभोक्तावादी चिंतन से ओत-प्रोत शिक्षा का प्रभाव है जिससे मनुष्य नित नये द्वंद्व में फंसता जा रहा है। सभी मानव समुदाय आपस में असुरक्षित हैं। ऐसी अव्यवस्था में स्त्री को न्याय कहां मिलेगा? यह स्वयं विचारणीय प्रश्न है।
स्त्री-पुरुष शब्द अपने आप में संकीर्णता लिए हुए है। ‘स्त्री’ शब्द स्त्री की शरीरगत पहचान को ही प्रस्तुत कर पाता है, जबकि स्त्री, मानव के रूप में शरीर की सीमा से अधिक प्रकाशित है। यदि स्त्री को हम शरीरगत आधार पर पहचानने जाते हैं तो स्त्री-पुरुष के मध्य समानता के ध्रुव बिन्दुओं की पहचान कठिन हो जाती है।
दूसरी ओर ‘मानव’ शब्द में नर-नारी या स्त्री-पुरुष दोनों का सम्बोधन समाया हुआ है। यह आज की जरूरत है कि ‘स्त्री’ को ‘मानव’ के संदर्भ में देखा जाए। ‘मानव’ शब्द की महिमा अथवा प्रयोजन लिंग विधा से परे है अथवा भिन्न है। हम पाते हैं कि रूप, गुण, स्वभाव धर्म के संयुक्त रूप में ‘मानव’ शब्द अपना अर्थ प्राप्त करता है।
वर्तमान समय में जितनी भी राजनीतिक व आर्थिक न्यायिक व्यवस्थाएं प्रचलित हैं, वे परिवार संस्था को नहीं पहचानती हैं। ये सभी राजनीतिक सरंचनाएं व्यक्तिवादी सोच पर आधारित हैं। अत: परिवार संस्था धीरे-धीरे कमजोर हुई है। लेकिन यह सोचने की जरूरत है कि यदि परिवार ही नहीं रहेगा तो मनुष्य जियेगा कहां? परिवार ही वह जगह है जहां मनुष्य मानसिक, शारीरिक, आर्थिक सुरक्षा पाता है, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। अत: हमें स्त्री सशक्तिकरण को परिवार के संदर्भ में विशेषकर देखने की महती आवश्यकता है। विगत में नारीवादी सोच ने भी परिवार संस्था को ठेस पहुंचाई है। कहने का आशय यह बिल्कुल नहीं है कि परिवारों में नारी की स्थिति बहुत अच्छी है। निश्चित रूप से यहां अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
धर्म और राजनीति के मध्ययुगीन विचार आज धीरे-धीरे पुन: हावी होते जा रहे हैं। धर्म के नाम पर स्त्री के जीवन को पुन: घर में ही समेट देने की कवायद तो सभी इस्लामिक मुल्कों में चल रही है, लेकिन सभ्य कहे जाने वाले मुल्कों में भी बाजारवादी सोच के चलते स्त्री की सुंदर देह का भरपूर उपयोग किया जा रहा है।

दो तरह की अतियों से स्त्री का जीवन नर्क बना हुआ है पहली अति वह जिसे हम पश्चिम में देख रहे हैं। वहाँ की स्त्री ने स्वतंत्रता के नाम पर जो नग्नता दिखाई है, उसे लक्ष्मण रेखा को पार कर जाना ही कहा जाएगा। इस पश्चिमी नाच से घबराकर इस्लामिक मुल्कों में दूसरी तरह की अति शुरू हो चुकी है।
सवाल यह उठता है कि स्त्रियों को स्त्रियों की तरह होना चाहिए या स्त्रतंत्रता के नाम पर पुरुषों की तरह? आज हम देखते हैं कि पश्चिम में स्त्रियाँ स्वतंत्रता के चक्कर में प्रत्येक वह कार्य करती है जो पुरुष करता है। जैसे सिगरेट और शराब पीना, जिम ज्वाइन करना, तंग जिंस और शर्ट पहनना, देर तक पब में डांस करना और यहाँ तक ‍कि पुरुषों की हर वह स्टाइल अपनाना जो सिर्फ पुरुष के लिए ही है। क्या स्वतंत्रता का यही अर्थ है? पुरुष को पुरुष और स्त्री को स्त्री होने में लाखों वर्ष लगे हैं, लेकिन वर्तमान युग दोनों को दोनों जैसा नहीं रहने देगा। होमोसेक्सुअल लोगों की तादाद बढ़ने के कई और भी कारण हो सकते हैं। दरअसल यह पढ़े और समझे बगैर बौद्धिक, सम्पन्न और आधुनिक होने की जो होड़ चल पड़ी है इससे प्रत्येक व्यक्ति का चरित्र पाखंडी होता जा रहा है। हम टीवी चैनल और फिल्मों की संस्कृति में देखते हैं कि ये कैसे अजीब किस्म के चेहरे वाले लोग है। जरा भी सहजता नहीं। कहना होगा कि ये सभ्य किस्म के जाहिल लोग हैं। रियलिटी शो की रियलिटी से सभी परिचित है।

मीडिया, फिल्म और बाजार की स्वतंत्रता के दुरुपयोग के चलते इस तरह के फूहड़ प्रदर्शन के कारण ही धर्म और राजनीति के ठेकेदारों के मन में नैतिकता और धार्मिक ‍मूल्यों की रक्षा की चिंता बढ़ने लगी है। महिलाओं ने अभी अपना धर्म विकसित नहीं किया है और शायद भविष्य में भी नहीं कर पाएँगी। इसके लिए साहस, संकल्प और एकजुटता की आवश्यकता होती है। पुरुष जैसा होने की होड़ के चलते तो वह सभी क्षेत्र में किसी भी तरीके से बढ़- चढ़कर आगे आ जाएगी और आ भी रही हैं, लेकिन वह जिस तरह से अपनी स्वतंत्रता का प्रदर्शन कर रही है उससे खुद उसके सामने धर्म, समाज और राष्ट्र की आचार संहिताओं की चुनौतियाँ बढ़ती जाएँगी। जैसा आज हम देख रहे ‍हैं अफगानिस्तान और पाकिस्तान में क्या हो रहा है। पश्चिम की स्त्रियों ने स्वतंत्रता का जो निर्वस्त्र नाच दिखाया है उसी से घबराकर इस्लामिक मुल्कों में स्त्रियों पर ढेर सारी पाबंदियाँ लगाई जा रही है। यह दो तरह की अतिवादिता है।
महिला शक्ति को सलाम, लेकिन हमें सोचना होगा उन महिलाओं के बारे में जो बुरी स्थिति में हैं। असमानताओं के बारे में सोचा जाए जो आज भी समाज में कायम है। हम उसके लिए क्या कर सकते हैं यह सोचा जाना अब भी शेष है।


रविवार, 15 अगस्त 2010

आजादी की 63 वी वर्षगाँठ पर हार्दिक बधाई

आजादी की 63 वी वर्षगाँठ पर हार्दिक बधाई, शुभकामनाये.ये दिन है आजादी का जश्न मनाने का, उन शहीदों और वीर पुरुष, महिलाओ को नमन करने का जिन्होंने हमें ये आजादी सौपी है, उन बहादुर सैनिको की याद में आँखे नम करने का जिन्होंने आजाद भारत के लिए अपनी शहादत दी है, उन लाखो सैनिको और जागरूक नागरिको को सलाम करने का जो देश को बुलंदियों की ओर जा रहे हैं.
कोई बात है इस देश की मिटटी में जिसकी खुशबु ही मर मिटने का जज्बा पैदा कर देती है, देश के लिए प्राण देने के वालो की फसल तैयार करती रहती है.हालाँकि वक़्त बदला है क्योंकि भारत मां अब बलिदान नहीं योगदान मांगती है. इसकी 1 अरब 20 करोड़ संताने ही इसकी ताकत हैं.कुछ बच्चे बिगड़ गए हैं लेकिन फिर भी इस भीड़ में लाखो भगत और बिस्मिल घूम रहे हैं जिनका एक ही धर्म है "भारतीय",एक ही जाति "भारतीय" एक ही मकसद है "स्वाबलंबी और मजबूत भारत"
भारतीय - एक शब्द जिसके आगे हर सम्मान, हर उपाधि, हर पुरुस्कार छोटा लगता है,
मुझे गर्व है कि मैं इस देश में पैदा हुआ जहाँ देवता भी जन्म लेने को तरसते हैं, मुझे गर्व है कि मैं भारतीय हूँ. आइये अपने इतिहास से प्रेरणा लेकर एक सुनहरा वर्तमान रचते हैं. जय हिंद

Empirical research(अनुभवजन्य अनुसंधान)

अनुभवजन्य और वैचारिक रूप से दो दृष्टिकोण हैं जिन्हें आमतौर पर एक शोध आयोजित करते समय नियोजित किया जाता है। संकल्पनात्मक को शोधकर्ताओं के रू...