रविवार, 18 जुलाई 2010

बिहार में मीडिया का असली चेहरा क्या है ?

किसका मीडिया, कैसा मीडिया। जवाब सीधा है, पूंजीपतियों का मीडिया। सामंतों का मीडिया। दलालों का मीडिया। समरथ को नहीं दोष गोषाईं… आदि-आदि का मीडिया। जी हां, मीडिया की परिभाषा आज बदल चुकी है। मीडिया यानी खबरों, विचारों और मनोरंजन को लोगों तक पहुंचाना अब गाली लगती है। खबरें, साबुन, सर्फ, पेस्ट की तरह इस्तेमाल होने लगी हैं। सवाल है कि इस्तेमाल आखिर कौन कर रहा है। पत्रकार या मालिक। जाहिर है लाखों-करोड़ों पैसा लगाने वाला मीडिया हाउस का मालिक। फिर मीडिया किसका मीडिया हुआ? खबर खबर नहीं, विचार विचार नहीं, मनोरंजन मनोरंजन नहीं। वह बन जाता है उपभोक्ता वस्तु। फिर खबर हो या साबुन क्या फर्क पड़ता है, जब दोनों को बेचना ही है। खबरें भी ‘प्रोडक्ट’ की तरह बेची जा रही हैं। कहा जा सकता है कि बाजार तैयार हो चुका है। बल्कि मीडिया में बाजार घुस चुका है।

मीडिया के माध्यम से खबरों को बेचने का कारोबार फल-फूल रहा है। घटनाएं कई हैं, जो किसका मीडिया और कैसा मीडिया को नंगा करने के लिए काफी है। मीडिया के लिए उर्वर जमीन माने जाने वाले बिहार के मीडिया पर नजर डालते हैं। घटना है, बिहार की राजधानी पटना में राष्ट्रमंडल खेल के लिए देश भ्रमण पर निकले क्विंस बैटन रिले की। गत 14 जुलाई को क्विंस बैटन रिले पटना में आयोजित की गयी। ताम-झाम, धूम-धड़ाम के साथ रिले निकला। इसमें राजनेता, अधिकारी, हीरो-हिरोइन, खिलाड़ी, संस्कृतिकर्मी, पत्रकार, लेखक सहित आमजनों की भागीदारी रही। राजभवन से राज्यपाल ने बैटन को कला और संस्कृति विभाग के सचिव को सौंपा। उसके बाद बैटन रिले की यात्रा शहर के पैंतीस पड़ावों पर होते हुए श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल पर जाकर समाप्त हुआ। पैंतीस पड़ावों पर बैटन को लेकर आगे बढ़ने वालों में राजनेता से लेकर पदाधिकारी, हीरो होंडा के पदाधिकारी और बिहार के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई खिलाड़ी और एक अभिनेत्री शामिल थी। क्विंस बैटन रिले को कवर करने वालों में प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया का हुजूम भी पूरी तन्मयता से मौजूद रहा। बिहार के मीडिया ने क्विंस बैटन रिले के कवरेज को प्राथमिकता से जगह दी। मामला राष्ट्र हित का था और होना भी चाहिए था।

बिहार से प्रकाशित सभी अखबारों ने पहले पेज पर जगह दी। लेकिन बिहार के मीडिया का चेहरा एक बार फिर साफ हो गया कि आखिर उसकी सोच क्या है? यानी किसका मीडिया, कैसा मीडिया और किसके लिए? प्रश्न सामने आ ही गया। लोग भी चौंके। क्विंस बैटन रिले खबर तो बनी। अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू समाचार पत्रों ने क्विंस बैटन रिले की खबर तस्वीर मुख्यपृष्ठ पर तस्वीर के साथ प्रकाशित की। लेकिन बैटन के साथ कोई खिलाड़ी नजर नहीं आया। नजर आयी जानी-मानी फिल्म अभिनेत्री नीतू चंद्रा। राज्यपाल के साथ बैटन थामे नीतू की तस्वीर ने मीडिया की सोच को सामने ला दिया। वहीं एक अंग्रेजी और उर्दू के अखबार ने राज्यपाल को फोटो से हटाकर नीतू चंद्रा को क्विंस बैटन के साथ की तस्वीर को मुख्यपृष्ठ पर प्रकाशित किया। आश्चर्य की बात यह है कि रिले के दौरान क्विंस बैटन को थामने वालों में कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी मौजूद थे, लेकिन उनकी तस्वीर बैटन लिये हुए मुख्यपृष्ठ पर खबर नहीं बनी? एक बार फिर मीडिया ग्लैमर सेलिब्रेटरी के आगोश में समा गया। खेल प्रेमी हताश हुए, निराश हुए।

मीडिया के इस रवैये को लेकर खेल पत्रकारों और खेल प्रेमियों के पेट में गुदगुदी भी हुई। लेकिन गुदगुदी से उठी हंसी में मीडिया के रवैये के प्रति गुस्से का इजहार था, पीड़ा थी। मीडिया के अंदर और मीडिया के बाहर सवाल यहां उठता है किसका मीडिया? जी हां, जिसका मीडिया है, मालिक का – तो वह चीजों को अपनी तरह से ही लोगों के सामने परोसेगा ही? न कि जनता से पूछकर? स्वीटीः हाई प्रोफाइलः के पेट में दर्द होता है तो मीडिया खबर को उछाल-उछाल कर बवाल मचा देती है जबकि कजरी: गरीब-गुरबाः के पेट में दर्द होता है तो उसे नोटिस तक नहीं लिया जाता। मीडियाकर्मियों का मालिक कहता है कि उसे सुंदर चेहरे दिखाना है, सेलिब्रेटरी को दिखाना है। जो बिके, उसे खबर बनानी हैं। हो यही रहा है। मटुक-जूली की प्रेम कहानी, राखी-मीका की लड़ाई, अभिषेक व धोनी की शादी, कमिश्नर के कुत्ते, बिल्ली के छज्जे पर चढ़ जाने सहित कई खबरें हैं, जिन्हें मीडिया ने जमकर बेचा। वही जनहित की खबरें आयीं भी तो महज दिखावे के लिए।

Empirical research(अनुभवजन्य अनुसंधान)

अनुभवजन्य और वैचारिक रूप से दो दृष्टिकोण हैं जिन्हें आमतौर पर एक शोध आयोजित करते समय नियोजित किया जाता है। संकल्पनात्मक को शोधकर्ताओं के रू...