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राजनीति का अंतरराष्ट्रीय लीकेज

एक चीज है विकीलीक्स। आजकल बड़ा जोर से लीक हो रहेला है। बोलने को तो विकीलीक्स एक इंटरनेट साइट है, पर वास्तव में वो दुनिया का राजनीति का घड़ा है जो चारों बाजू से लीक हो रहेला है।
दुनिया में दो किसिम का देश माना जाता है - एक विकसित और दूसरा विकासशील। विकासशील देश का लोग यह माना करता था कि विकसित देश का कंस्ट्रक्शन मजबूत होता है। उसका सीमेंट में कोई मिलावट नहीं होता। उसका दूध में पानी नहीं होता, गरम मसाला में घोड़ा का लीद नहीं होता। लेकिन, इधर विकीलीक्स ने लीक करना चालू किया तो उधर पता चला कि विकसित देश का छलनी में पन बहोत छेद है। वो पन कम लीक नहीं होता है। आजकल तो विकसित देश का सिरफ छत ईच नहीं, तहखाना पन लीक हो रहेला है।
बड़ा लोग बुद्धि चतुर होता है। आम लोग, बड़ा लोग का बुद्धि चातुर्य से इतना प्रभावित हो जाता कि वो बड़ा लोग का बायोलॉजी भूल जाता है। भूल जाता है कि बड़ा लोग पन छोटा लोग का माफिक खाता है। पीता है। और टॉयलेट पन जाता है। बड़ा लोग जो कुछ करता है, बड़ा लेवल पर करता है। विकीलीक्स ने बताया है कि बड़ा लोग का टॉयलेट कितना बड़ा लेवल पर लीक होता है।
दुनिया में कोई ऐसा नहीं है जो गलती …

राजनीति मार्केटिंग मैनेजमेण्ट के कुछ खास सिद्धान्त...

मार्केटिंग मैनेजमेण्ट के कुछ खास सिद्धान्त होते हैं, जिनके द्वारा जब किसी प्रोडक्ट की लॉंचिंग की जाती है तब उन्हें आजमाया जाता है। ऐसा ही एक प्रोडक्ट भारत की आम जनता के माथे पर थोपने की लगभग सफ़ल कोशिश हुई है। मार्केटिंग के बड़े-बड़े गुरुओं और दिग्विजय सिंह जैसे घाघ और चतुर नेताओं की देखरेख में इस प्रोडक्ट यानी राहुल गाँधी की मार्केटिंग की गई है, और की जा रही है। जब मार्केट में प्रोडक्ट उतारा जा रहा हो, (तथा उसकी गुणवत्ता पर खुद बनाने वाले को ही शक हो) तब मार्केटिंग और भी आक्रामक तरीके से की जाती है, बड़ी लागत में पैसा, श्रम और मानव संसाधन लगाया जाता है, ताकि घटिया से घटिया प्रोडक्ट भी, कम से कम लॉंचिंग के साथ कुछ समय के लिये मार्केट में जम जाये। (मार्केटिंग की इस रणनीति का एक उदाहरण हम “माय नेम इज़ खान” फ़िल्म के पहले भी देख चुके हैं, जिसके द्वारा एक घटिया फ़िल्म को शुरुआती तीन दिनों की ओपनिंग अच्छी मिली)। सरल भाषा में इसे कहें तो “बाज़ार में माहौल बनाना”, उस प्रोडक्ट के प्रति इतनी उत्सुकता पैदा कर देना कि ग्राहक के मन में उस प्रोडक्ट के प्रति लालच का भाव पैदा हो जाये। ग्राहक के चारों ओर ऐसा…

नेहरू -गाँधी परिवार का सच (?)

आजकल जबसे "बबुआ" राहुल गाँधी ने राजनीति में आकर अपने बयान देना शुरू कर दिया है, तब से "नेहरू राजवंश" नामक शब्द बार-बार आ रहा है । नेहरू राजवंश अर्थात Nehru Dynasty... इस सम्बन्ध में अंग्रेजी में विभिन्न साईटों और ग्रुप्स में बहुत चर्चा हुई है....बहुत दिनों से सोच रहा था कि इसका हिन्दी में अनुवाद करूँ या नहीं, गूगल बाबा पर भी खोजा, लेकिन इसका हिन्दी अनुवाद कहीं नहीं मिला, इसलिये फ़िर सोचा कि हिन्दी के पाठकों को इन महत्वपूर्ण सूचनाओं से महरूम क्यों रखा जाये. यह जानकारियाँ यहाँ, यहाँ तथा और भी कई जगहों पर उपलब्ध हैं मुख्य समस्या थी कि इसे कैसे संयोजित करूँ, क्योंकि सामग्री बहुत ज्यादा है और टुकडों-टुकडों में है, फ़िर भी मैने कोशिश की है इसका सही अनुवाद करने की और उसे तारतम्यता के साथ पठनीय बनाने की...जाहिर है कि यह सारी सामग्री अनुवाद भर है, इसमें मेरा सिर्फ़ यही योगदान है... हालांकि मैने लगभग सभी सन्दर्भों (references) का उल्लेख करने की कोशिश की है, ताकि लोग इसे वहाँ जाकर अंग्रेजी में पढ सकें, लेकिन हिन्दी में पढने का मजा कुछ और ही है... बाकी सब पाठकों की मर्जी...हजारों…

हिन्दू होने पर गर्व क्यों ?

सन् 1857 की क्रांति में पराधीनता से मुक्त होने के असफल प्रयास से समाज के मन में ग्लानी का भाव आया। प्रबुद्ध वर्ग में हिन्दुत्व के बारे में हीनता का बोध उत्पन्न हुआ। मुझे गधा कह लो, हिन्दू मत कहो। इस तरह के नकारात्मक भाव की उत्पत्ति हुई थी। इस विषम परिस्थति में स्वामीं विवेकानन्द ने गौरव के भाव को जागृत किया तथा हिन्दू समाज में नये जोश और उत्साह का संचार किया। अपने विस्मृत स्वाभिमान को झकझोरने का कार्य किया। राष्ट्र धर्म एवं संस्कृति की पताका सन् 1893 में शिकागों में सर्वधर्मसम्मेलन में फहराई गई। समूची दुनिया का ध्यान भारतीय संस्कृति की ओर खींचने में सफल हुए। स्वामीजी का कथन है कि ‘‘जब कोई अपने पूर्वजों पर ग्लानी महसूस करें तो समझना चाहिए उसका अंत आ गया है।‘‘ स्वामीजी ने राष्ट्र.धर्म.संस्कृति के प्रति गौरवपूर्ण भाव का जागरण कर हिन्दुत्व को गौरवान्वित किया। इसी बीच सन् 1925 को परम पूजनीय डॉ. साहब के नेतृत्व मार्गदर्शन में ‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ‘‘ की स्थापना भी इसी कड़ी में एक चरण था। सन् 2002 में राष्ट्र जागरण का ध्येय वाक्य था, ‘‘गर्व से कहों हम हिन्दू है।‘‘ भारत दुनिया का सबसे प्राच…

शमशेर: जीवन ही संदेश.............

सहजता अगर मनुष्य का गुण है तो शमशेर बहादुर सिंह का जीवन और काव्य उसका उदाहरण है। न औपचारिकता, न पाखंड। जैसा जीवन, वैसा लेखन। उनके अनुभव का सूत्र पकड में आ जाये तो दुरूह जान पडने वाली कविता भी खुल जाती है। लेकिन वे मानते थे, कला कलेंडर की चीज नहीं। इसलिए अपने अनुभव का निजीपन, जहां तक हो सके, उसे खुलने से रोकते थे। फिर भी सहज थे, सरल नहीं। सरलता तो कभी-कभी नासमझी से भरी होती है। सहजता जीवन का ताप सहकर आती है। कबीर उसे सहज साधना कहते थे। शमशेर को भी साधना से ही सहजता प्राप्त हुई है। अपने प्रिय कवि निराला को याद करते हुए शमशेर ने लिखा था-

भूल कर जब राह- जब-जब राह.. भटका मैं/ तुम्हीं झलके हे महाकवि,/ सघन तम की आंख बन मेरे लिए।

घने अंधेरे में शमशेर के लिए आंख बन निराला इसलिए झलके कि दोनों का जीवन साम्य लिये हुए था। एक जैसा आर्थिक और भावात्मक अभाव। बचपन में मां की मृत्यु, युवाकाल में पत्नी की मृत्यु, अनियमित रोजगार और अकेलापन। देर से ही सही, उन्हें बडे-बडे पुरस्कार भी मिले- साहित्य अकादमी (1977), मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार (1987), कबीर सम्मान (1989)।

शमशेर का जन्म तारीफ सिंह के पुत्र के रूप म…

विज्ञापन का मायाजाल

विज्ञापन की दुनिया काफी मायावी है। बाजारीकरण के मौजूदा दौर में इसकी महत्ता में दिनोंदिन इजाफा ही होता जा रहा है। एक दौर वह भी था जब सूचना और विज्ञापन में कोई खास अन्तर नहीं था।

यह भी कहा जा सकता है कि विज्ञापन को सूचना देने का जरिया माना जाता था। पर, यह अवधारणा काफी पहले ही खंडित हो चुकी है। आज तो हालात ऐसे है कि विज्ञापन का पूरा करोबार ‘जो दिखता है वही बिकता है’ के तर्ज पर चल रहा है। मांग और आपूर्ति की अवधारणा को तोड़ते हुए अब मांग पैदा करने पर जोर है। आज विज्ञापन का मूल उद्देश्य सूचना प्रदान करने की बजाए उत्पाद विशेष के लिए बाजार तैयार करना बन कर रह गया है।

विज्ञापन का इतिहास भी काफी पुराना है। मौजूदा रूप तक पहुंचने के लिए इसने लंबा सफर तय किया है। वैश्विक स्तर पर अगर देखा जाए तो विज्ञापन की शुरूआत के साक्ष्य 550 ईसा पूर्व से ही मिलते हैं। भारत में भी विज्ञापन की शुरुआत सदियों पहले हुई है। यह बात और है कि समय के साथ इसके तौर-तरीके बदलते गए।

बहरहाल, अगर ऐतिहासिक साक्ष्यों को खंगाला जाए तो पता चलता है कि शुरूआती दौर में विज्ञापन, मिश्र, यूनान और रोम में प्रचलित रहा है। मिश्र में विज्ञापन …

आइये जाने कमलेश्वर जी को !!

कमलेश्वर (6 जनवरी 1932-27 जनवरी 2007) हिन्दी लेखक कमलेश्वर बीसवीं शती के सबसे सशक्त लेखकों में से एक समझे जाते हैं। कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, फिल्म पटकथा जैसी अनेक विधाओं में उन्होंने अपनी लेखन प्रतिभा का परिचय दिया। कमलेश्वर का लेखन केवल गंभीर साहित्य से ही जुड़ा नहीं रहा बल्कि उनके लेखन के कई तरह के रंग देखने को मिलते हैं। उनका उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' हो या फिर भारतीय राजनीति का एक चेहरा दिखाती फ़िल्म 'आंधी' हो, कमलेश्वर का काम एक मानक के तौर पर देखा जाता रहा है। उन्होंने मुंबई में जो टीवी पत्रकारिता की, वो बेहद मायने रखती है। ‘कामगार विश्व’ नाम के कार्यक्रम में उन्होंने ग़रीबों, मज़दूरों की पीड़ा-उनकी दुनिया को अपनी आवाज दी।


कमलेश्वर का जन्म 6 जनवरी 1932 को उत्तरप्रदेश के मैनपुरी ज़िले में हुआ। उन्होंने 1954 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया। उन्होंने फिल्मों के लिए पटकथाएँ तो लिखी ही, उनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी। `आंधी', 'मौसम (फिल्म)', 'सारा आकाश', 'रजनीगंधा', 'छोटी सी बात', 'मिस…

भारतीय फिल्म पटकथा

हर फिल्म की एक पटकथा होती है, इसे ही स्क्रिप्ट और स्क्रीनप्ले भी कहते हैं। पटकथा में दृश्य, संवाद, परिवेश और शूटिंग के निर्देश होते हैं। शूटिंग आरंभ करने से पहले निर्देशक अपनी स्क्रिप्ट पूरी करता है। अगर वह स्वयं लेखक नहीं हो, तो किसी दूसरे लेखक की मदद से यह काम संपन्न करता है। भारतीय परिवेश में कहानी, पटकथा और संवाद से स्क्रिप्ट पूरी होती है। केवल भारतीय फिल्मों में ही संवाद लेखक की अलग कैटगरी होती है। यहां कहानी के मूलाधार पर पटकथा लिखी जाती है। कहानी को दृश्यों में बांटकर ऐसा क्रम दिया जाता है कि कहानी आगे बढ़ती दिखे और कोई व्यक्तिक्रम न पैदा हो। शूटिंग के लिए आवश्यक नहीं है कि उसी क्रम को बरकरार रखा जाए, लेकिन एडीटिंग टेबल पर स्क्रिप्ट के मुताबिक ही फिर से क्रम दिया जाता है। उसके बाद उसमें ध्वनि, संगीत आदि जोड़कर दृश्यों के प्रभाव को बढ़ाया जाता है। पटकथा लेखन एक तरह से सृजनात्मक लेखन है, जो किसी भी फिल्म के लिए अति आवश्यक है। इस लेखन को साहित्य में शामिल नहीं किया जाता। ऐसी धारणा है कि पटकथा साहित्य नहीं है। हिंदी फिल्मों के सौ सालों के इतिहास में कुछ ही फिल्मों की पटकथा पुस्तक क…

हिंदू राजनीति का अभाव!!!!!!!!!!!!1

पश्चिम बंगाल के छोटे से शहर देगागा में इस वर्ष दुर्गा पूजा नहीं मनाई गई, क्योंकि तृणमूल काग्रेस से जुड़े एक दबंग मुस्लिम नेता ने हिंदू आबादी पर सुनियोजित हिंसा की। इस पर सत्ताधारी लोग और मीडिया, दोनों लगभग मौन रहे। स्थानीय हिंदुओं को भय है कि उन पर हमले करके आतंकित कर उन्हें वहां से खदेड़ भगाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। असम और बंगाल में कई स्थानों पर यह पहले ही हो चुका है, इसलिए इस जनसाख्यिकी आक्रमण को पहचानने में वे भूल नहीं कर सकते। वस्तुत: ऐसी घटनाओं पर राजनीतिक मौन ही इसके वास्तविक चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण है।

क्या किसी शहर में मुस्लिमों द्वारा किसी बात पर विरोध-स्वरूप ईद न मनाना भारतीय मीडिया के लिए उपेक्षणीय घटना हो सकती थी। चुनी हुई चुप्पी और चुना हुआ शोर-शराबा अब तुरंत बता देता है कि किसी साप्रदायिक हिंसा का चरित्र क्या है। पीड़ित कौन है, उत्पीड़क कौन। जब भी हिंदू जनता हिंसा और अतिक्रमण का शिकार होती है, राजनीतिक वर्ग और अंग्रेजी मीडिया मानो किसी दुरभिसंधि के अंतर्गत मौन हो जाता है। यह आसानी से इसलिए संभव होता है, क्योंकि भारत में कोई संगठित हिंदू राजनीतिक समूह नहीं है। हिंदू भा…

हिंदू राजनीति का अभाव!!!!!!!!!!!!1

पश्चिम बंगाल के छोटे से शहर देगागा में इस वर्ष दुर्गा पूजा नहीं मनाई गई, क्योंकि तृणमूल काग्रेस से जुड़े एक दबंग मुस्लिम नेता ने हिंदू आबादी पर सुनियोजित हिंसा की। इस पर सत्ताधारी लोग और मीडिया, दोनों लगभग मौन रहे। स्थानीय हिंदुओं को भय है कि उन पर हमले करके आतंकित कर उन्हें वहां से खदेड़ भगाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। असम और बंगाल में कई स्थानों पर यह पहले ही हो चुका है, इसलिए इस जनसाख्यिकी आक्रमण को पहचानने में वे भूल नहीं कर सकते। वस्तुत: ऐसी घटनाओं पर राजनीतिक मौन ही इसके वास्तविक चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण है।

क्या किसी शहर में मुस्लिमों द्वारा किसी बात पर विरोध-स्वरूप ईद न मनाना भारतीय मीडिया के लिए उपेक्षणीय घटना हो सकती थी। चुनी हुई चुप्पी और चुना हुआ शोर-शराबा अब तुरंत बता देता है कि किसी साप्रदायिक हिंसा का चरित्र क्या है। पीड़ित कौन है, उत्पीड़क कौन। जब भी हिंदू जनता हिंसा और अतिक्रमण का शिकार होती है, राजनीतिक वर्ग और अंग्रेजी मीडिया मानो किसी दुरभिसंधि के अंतर्गत मौन हो जाता है। यह आसानी से इसलिए संभव होता है, क्योंकि भारत में कोई संगठित हिंदू राजनीतिक समूह नहीं है। हिंदू भ…

मुस्लिम -हिन्दू और भारत !!!!!!!!!!!

आज हमारे चारों ओर का माहौल कुछ ऐसा सुलगता हुआ सा प्रतीत होता है, जैसे हम फ़ूटे ज्वालामुखी के पिघले लावे के बीच से रास्ता बनाते हुए कहीं जा पा रहे हों । वृहत्तर भारत के कई खंड में विभाजित हो जाने और अलग-अलग टुकड़ों पर अपनी रोटियां अलग पकाकर खाने के बावज़ूद हमारे कलेज़े की आग कहीं से भी ठंडी होती प्रतीत नहीं होती । विश्व राजनीति, अर्थनीति और भौतिकवाद ने मानव समाज की सोच को इतने संकुचित दायरे में क़ैद कर दिया है, कि मनुष्य का अपना प्राकृतिक स्वभाव होता क्या है, इसको जानने के लिये भी वन्य पशुओं के स्वभाव का अध्ययन करना पड़ रहा है । बढ़ती जनसंख्या भी इसका कारण रही जिसने क्रमश: घर, समाज, प्रान्त और देशों तक में दीवारें खड़ी करने का एक कभी खत्म न होने वाला सिलसिला बना दिया । फ़िर भी हमारा भारत ही इससे अधिक आक्रांत रहा है, क्योंकि इतनी विशालता के बावज़ूद इसका एकीकृत ढांचा विदेशी ताक़तों के लिये परेशानी और ईर्ष्या का सबब रहा । पिछले चार-पांच सौ वर्षों में लगातार विदेशी आक्रमण झेलते इस भूभाग पर परिस्थितियों ने एक धर्म से कई धर्म, पंथ और मज़हबों में इसको विभक्त कर दिया, जिसका दंश झेलना हमारी बाध्यता बन चुकी…

भगवान श्रीराम को फिर से वनवास????- डॉ0 प्रवीण तोगड़िया

भारत ही नहीं वरन् विश्व का हिन्दू अयोध्या में भगवान् राम की जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर की सदियों से राह देख रहा है ! भगवान् राम तो लोभ-मोह से परे एक बार वनवास में चले गए थे – तब पिता का सम्मान रखना था उन्हें ! अब फिर से भगवान् राम की जन्मभूमि पर के मंदिर को यानी कि भगवान् राम को ही फिर से वनवास भेजा गया ! 450 वर्ष का अन्याय 4,00,000 हिन्दुओं का बलिदान, कोठारी बन्धुओं के वृद्ध माता-पिता के आंसुओं में से भी धधकती हुई राम मंदिर की आशा, जिन लोगों का राम जन्मभूमि पर इंच भर भी हक नहीं, ऐसे-ऐसे लोगों के साथ हिन्दुओं के सम्मान्य साधु-संतों को बिठा-बिठाकर किए गए समझौते के अनेकानेक प्रयास…….यह सब कुछ सरयू के जल में बह गया क्या ? तब भगवान् राम ने पिता के सम्मान के लिए वनवास भी झेला।

अब हम भी भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च न्यायपालिका के सम्मान के लिए यह दुःख भी झेलेंगे कि अब फिर से भगवान् राम वनवास भेजे गए ! उनके अपने जन्मस्थान पर उनका अपना एक मंदिर हो – मंदिर भगवान् का घर माना जाता है – इसके लिए भगवान् को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर करने वालों ने यानी कि बार-बार निरर्थक अर्जियां प्रस्तुत कर देश औ…

डरी हुई लड़कियां !!!!!!!!!!!!!!

यह वाकई चिंता की बात है कि देश के महानगरों और बड़े शहरों की 77 फीसदी लड़कियों को छेड़खानी का डर सताता
रहता है। गैर सरकारी संगठन 'प्लान इंडिया' के एक सर्वे में यह खुलासा हुआ है। इस सर्वे के मुताबिक 69 प्रतिशत लड़कियां शहरों को अपने लिए सुरक्षित नहीं मानतीं। यह राय हर वर्ग की लड़कियों की है, चाहे वह झुग्गी- झोपड़ी में रहती हों, स्कूल-कॉलेजों में पढ़ती हों या नौकरीपेशा हों।

निश्चय ही यह उन शहरों की कानून-व्यवस्था और सामाजिक वातावरण पर एक कड़ी टिप्पणी है। एक आधुनिक समाज की पहचान इस बात से भी होती है कि वहां महिलाएं अपने को कितना सुरक्षित और स्वतंत्र महसूस करती हैं। इस नजरिए से देखें तो हमारे शहर अब भी आधुनिक मूल्यों से काफी दूर नजर आते हैं। वहां छेड़खानी और यौन अपराधों का होना इस बात का संकेत है कि वहां के समाज में स्त्री-पुरुष संबंध में सहजता अभी नहीं आई है। सामंती समाज में स्त्री-पुरुष का रिश्ता गैर बराबरी का रहा है। इस कारण उनमें आपसी संवाद की गुंजाइश भी बेहद कम रही है। लेकिन ज्यों-ज्यों समाज बदला, स्त्री को हर स्तर पर आगे बढ़ने के मौके मिले। धीरे-धीरे उनके प्रति नजरिए में तब्…

आखिर कब तक टलेगा फैसला !!!!!!!!

आप गौर कीजिए, अयोध्या मामले पर फैसला आने के पहले किस तरह कुछ शहरों में चौराहों पर आपसी सदभावना के लिए
फूल बांटे जा रहे थे। आप पिछले दिनों आने वाले एसएमएसों की भाषा में शांति की चाहत देखिए। हालांकि अंतहीन इंतजार के बाद अयोध्या पर कोई फैसला आ जाने की उम्मीद एक बार फिर अधर में अटक गई है। फैसले की घोषणा के साथ कानून-व्यवस्था की कुछ चिंताएं जुड़ी थीं, पर कहीं न कहीं इसमें यह राहत भी शामिल थी कि अंतत: यह किस्सा खत्म होने की ओर तो बढ़ा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मामला और लंबा खिंचने के आसार बनने लगे हैं।

एक बात बिल्कुल साफ है कि अब से बीसेक साल पहले, यानी 1989 से 1992 के बीच मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर जैसा तनाव पूरे देश में दिखाई पड़ रहा था, उसकी छाया भी आज कहीं नजर नहीं आ रही है। इस बीच जन्मी और पली-बढ़ी भारत की नई पीढ़ी का जीवन, उसके सपने और उसकी परेशानियां कुछ और हैं। उस सामाजिक ठहराव को वह बहुत पीछे छोड़ आई है, जिससे ठलुआ किस्म के ढेरों निरर्थक विवाद इस देश में पैदा होते आए हैं। उसके मन में आस्था के लिए कुछ स्पेस जरूर है, लेकिन आस्था के नाम पर मार-काट उसके अजेंडा में दूर-द…

पेट के बाद शिक्षा !

इतिहास इस बात का साक्षी है कि मानव विकास की कहानी ज्ञान की लेखनी से ही लिखी गई है। आज प्रगति के शिखर को स्पर्श करने वाला मानव, शिक्षा के विविध आयामों के माध्यम से अपनी महत्वाकांक्षी परिकल्पनाओं को साकार करने में सक्षम है। तथापि यह भी एक कटु सत्य है कि बच्चों की पारिवारिक परिस्थितियों उनकी शिक्षा में बाधा भी उत्पन्न कर करती है।
परिवार भी सामाजिक संरचना का हिस्सा है। फलतः समाज में होने वाले छोटे-बड़े परिवर्तनों से परिवार भी प्रभावित होते हैं। परिवार यदि सामाजिक ढाँचे का निर्माण करते हैं, तो दूसरी ओर समाज का दायित्व भी इन परिवारों के प्रति पूर्णरूपेण बनता है। वर्तमान समय में हमारा समाज स्पष्ट रूप से तीन वर्गों में विभाजित दिखाई देता है। प्रथम- धनी वर्ग, द्वितीय- मध्यम वर्ग, तृतीय- निर्धन वर्ग। कुछ ऐसा ही विभाजन पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर शिक्षा क्षेत्र में भी स्पष्ट देखा जा सकता है। अंग्रेजी स्कूलों तक उन्ही की पहुँच हो पाती है जो आर्थिक आधार पर खरे उतरते हैं। मोटी आमदनी उनके बच्चों की राह आसान कर देती है। वे अपने बच्चों के लिये तत्परता से कार्य करते हैं। उनकी सजगता उनके बच्चों के सुनह…

बंधक बनाने वालों से कैसी बातचीत?

क्या भारत सरकार को उन संगठनों से बातचीत करनी चाहिए जो लोगों को बंधक बनाकर अपनी माँगें मनवाना चाहते हैं?

बीस साल पहले तत्कालीन गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद को विदेशी /कश्मीरी चरमपंथियों के चंगुल से छुड़वाने का मामला हो या फिर इंडियन एअरलाइंस के विमान को छुड़वाने के लिए कश्मीरी चरमपंथियों की रिहाई का मामला हो भारत सरकार के पास बंधक-संकट से निपटने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है.

हालाँकि यासिर अराफ़ात से लेकर काँग्रेस समर्थक पाँडे बंधु तक विमान अपहरण करके अपनी माँगे मनवाने की कोशिश कर चुके हैं. और अब बिहार में माओवादियों ने चार पुलिस वालों को बंधक बनाया हुआ था जिसमे से एक की ह्त्या भी कर दी गयी है
तो क्या बंधकों को बचाने के लिए सरकार को बंधक बनाने वालों से बातचीत करनी चाहिए या नहीं?

ये कैसी राजनीति है !

मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देने के चलते देश में आतंकवाद फैल रहा है। धरती का स्वर्ग जम्मू-कश्मीर नरक के रूप में तब्दील हो गया है। घुसपैठियों को नागरिकता दिलाने की कोशिश की जा रही है, जबकि त्याग व सेवा के प्रतीक भगवा ध्वज को आतंक कहा जा रहा है।
भारत में स्वाधीनता के बाद भी अंग्रेजी कानून और मानसिकता जारी है। इसीलिए इस्लामी, ईसाई और वामपंथी आतंकवाद के सामने ‘भगवा आतंक’ का शिगूफा कांग्रेसी नेता छेड़ रहे हैं। इसकी आड़ में वे उन हिन्दू संगठनों को लपेटने के चक्कर में हैं, जिनकी देशभक्ति तथा सेवा भावना पर विरोधी भी संदेह नहीं करते। किसी समय इस झूठ मंडली की नेता सुभद्रा जोशी हुआ करती थीं; पर अब लगता है इसका भार चिदम्बरम और दिग्विजय सिंह ने उठा लिया है।

ये कैसी मानसिकता है !

भारत में स्वाधीनता के बाद भी अंग्रेजी कानून और मानसिकता जारी है। इसीलिए इस्लामी, ईसाई और वामपंथी आतंकवाद के सामने ‘भगवा आतंक’ का शिगूफा कांग्रेसी नेता छेड़ रहे हैं। इसकी आड़ में वे उन हिन्दू संगठनों को लपेटने के चक्कर में हैं, जिनकी देशभक्ति तथा सेवा भावना पर विरोधी भी संदेह नहीं करते। किसी समय इस झूठ मंडली की नेता सुभद्रा जोशी हुआ करती थीं; पर अब लगता है इसका भार चिदम्बरम और दिग्विजय सिंह ने उठा लिया है।
ये लोग हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबेल्स के चेले हैं। उसके दो सिद्धांत थे। एक – किसी भी झूठ को सौ बार बोलने से वह सच हो जाता है। दो – यदि झूठ ही बोलना है, तो सौ गुना बड़ा बोलो। इससे सबको लगेगा कि बात भले ही पूरी सच न हो; पर कुछ है जरूर। इसी सिद्धांत पर चलकर ये लोग अजमेर, हैदराबाद, मालेगांव या गोवा आदि के बम विस्फोटों के तार हिन्दू संस्थाओं से जोड़ रहे हैं। उन्हें लगता है कि दुनिया भर में फैले इस्लामी आतंकवाद के सामने इसे खड़ाकर भारत में मुसलमान वोटों की फसल काटी जा सकती है। सच्चर, रंगनाथ मिश्र और सगीर अहमद रिपोर्टों की कवायद के बाद यह उनका अगला कदम है।
सच तो यह है कि आतंकवाद का हिन्दुओं …

कहाँ तक सही है ?

आज जामिया मिल्लिया इस्लामिया विशाविध्यल्या में हिंदी विभाग के विभाग्यध्क्ष्य श्री अब्दुल बिस्मिल्हा जी ने कहा की समकालीन में मुस्लिम साहित्यकारों की पुस्तकों या रचनाओ को पढ़ा नहीं जा रहा है ,वे एक परिचर्चा में बोल रहे थे . परिचर्चा का विषय था ,साहित्य और आधुनिक समकालीन हिंदी , परिचर्चा के मुख्य अथिथि थे विवेक कुमार दुबे , बिसमिला जी ने कहा की प्रकाशको द्वारा भी मुस्लिम लेखको की अवहेलना की जाती है .आप सभी लेखक बंधू इस वक्तव्य को कहा तक उचित मानते है ? क्या सच में एसा हो रहा है ?

बदली बदली सी नज़र आयेगी कांग्रेस ....

लगातार चौथी बार कांग्रेस की सत्ता को संभालने के लिए सोनिया गांधी बेहद आतुर नजर आ रही हैं। हालात देखकर उनकी ताजपोशी मुकम्मल ही मानी जा रही है। अपनी नई पारी में सोनिया गांधी के तेवर कड़े होने की बात कही जा रही है। खामोशी के साथ लंबे समय से कांग्रेस और सरकार का तांडव देख रहीं सोनिया अपनी चौथी पारी में कांग्रेस के साथ ही साथ सरकार को भी नए क्लेवर में प्रस्तुत कर सकतीं हैं। मजे की बात यह है कि इस काम में वे किसी घाट राजनेता के बजाए अपनी व्यक्तिगत मित्रमण्डली और राहुल गांधी की मदद ले रही हैं, आखिर राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी जो करनी है।
अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का चेहरा सवा सौ साल पुराना हो चुका है। कांग्रेस ने अपने इस जीवनकाल में अनेक उतार चढ़ाव देखे होंगे पर पिछले दो दशकों में कांग्रेस ने अपना जो चेहरा देखा है, वह भूलना उसके लिए आसान नजर नहीं आ रहा है। वैसे भी जब से श्रीमति सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद संभाला है, उसके बाद से उनका दिन का चैन और रात की नींद हराम ही नजर आ रही है। दस साल से अधिक के अपने अध्यक्षीय सफर के उपरांत अब श्रीमति सोनिया गांधी ने कांग्रेस और कांग्रेसनी…

राष्ट्रमंडल खेल बनाम भ्रष्टाचार

आखिर जिस बात का डर था वही हुआ। इससे पहले कि राष्ट्रमंडल खेल शुरू होते भ्रष्टाचार का हाहाकार मच गया। अब चाहे सरकार हो, ओलंपिक कमेटी या फिर दूसरे सभी लोग, खेलों का आयोजन उनके लिए दूसरे नंबर की प्राथमिकता हो गई। आरोप-प्रत्यारोप, जांच, बर्खास्तगी, निलंबन, संसद में हंगामा और मीडिया में धुआंधार कवरेज पहली प्राथमिकता बन गई है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि खेलों के आयोजन में कुछ न कुछ गड़बडि़यां हो रही हैं, कुछ न कुछ गोलमाल, घालमेल चल रहा है। संसद में सुबह से शाम तक राष्ट्रमंडल खेलों में गड़बडि़यों का हल्ला मच रहा है। और तो और खेल मंत्री को यहां तक कहना पड़ा कि भारत एशियाई खेल आयोजित करने का बहुत इच्छुक नहीं है। मतलब यह है कि दूध का जला अब छाछ भी पीने को तैयार नहीं है। टीएस दरबारी, संजय महेंद्रू, अनिल खन्ना और एम जयचंद्रन को खेलों के आयोजन से हटा दिया गया है। जितनी सरकारी एजेंसियां हैं, सबकी निगाहें खेलों के आयोजन में हो रही गड़बडि़यों की ओर लगी हुई हैं। आयोजन समिति के दफ्तर में तनाव का माहौल है और सभी सहमे हुए हैं। कोई किसी किस्म का फैसला लेने से डर रहा है, क्योंकि सबको भय है कि कल…