गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

अंतरराष्ट्रीय संचार व्यवस्था

अंतर्राष्ट्रीय संचार व्यवस्था और सूचना राजनीति
अवधेश कुमार यादव


प्रजातांत्रिक देशों में सत्ता का संचालन संवैधानिक प्रावधानों के तहत होता है। इन्हीं प्रावधानों के अनुरूप नागरिक आचरण करते हैं तथा संचार माध्यम संदेशों का सम्प्रेषण। संचार माध्यमों पर राष्ट्रों की अस्मिता भी निर्भर हैक्योंकि इनमें दो देशों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध को बनानेबनाये रखने और बिगाड़ने की क्षमता होती है। आधुनिक संचार माध्यम तकनीक आधारित है। इस आधार पर सम्पूर्ण विश्व को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहला- उन्नत संचार तकनीक वाले देशजो सूचना राजनीति के तहत साम्राज्यवाद के विस्तार में लगे हैंऔर दूसरा- अल्पविकसित संचार तकनीक वाले देशजो अपने सीमित संसाधनों के बल पर सूचना राजनीति और साम्राज्यवाद के विरोधी हैं। उपरोक्त विभाजन के आधार पर कहा जा सकता है कि विश्व वर्तमान समय में भी दो गुटों में विभाजित है। यह बात अलग है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के तत्काल बाद का विभाजन राजनीतिक था तथा वर्तमान विभाजन संचार तकनीक पर आधारित है।


अंतर्राष्ट्रीय संचार : अंतर्राष्ट्रीय संचार की अवधारणा का सम्बन्ध मानव सभ्यता के साथ जुड़ा हुआ है,क्योंकि मानव जैसे-जैसे विकास की ओर अग्रसर होता गयावैसे-वैसे अन्य देशों की सूचनाओं और सांस्कृतियों गतिविधियों के संदर्भ में जानने का प्रयत्न करने लगा। परिणामतः अंतर्राष्ट्रीय संचार की अवधारणा का सूत्रपात हुआ। सभ्यता के विकास के प्रारंभिक युग में 'देशाटन' एक मात्र अंतर्राष्ट्रीय संचार का माध्यम थाजिसके तहत एक देश के नागरिक समूह बनाकर जल-थल मार्ग से दूसरे देश का भ्रमण करते थे तथा वहां के नागरिकों से मिलकर एक-दूसरे की सांस्कृतिक गतिविधियों से परिचित होते थे। इसके बादस्वदेश लौटकर अपने समाज के लोगों को यात्रा-वृतांत सुनाते तथा दूसरे देशों की संस्कृति के बारे में जानकारी देते थे।

अंतर्राष्ट्रीय संचार के क्षेत्र में तकनीकी का उपयोग18वीं शताब्दी में सर्वप्रथम ब्रिटेन ने अपने विदेशी उपनिवेशों में सत्ता पर शासकीय नियंत्रण बनाये रखने के लिए किया। इसके लिए सम्रुद्री केबल लाइन की सहायता से संदेशों का आदान-प्रदान किया जाता था। हालांकिइसमें सामान्य जनों की सहभागिता नहीं होती थी। सामान्य जन 'देशाटन' के माध्यम से ही अंतर्राष्ट्रीय संचार का कार्य करते थे। बाद में मुद्रण तकनीक के उद्भव व विकास के बाद पुस्तकों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय संचार का कार्य किया जाने लगा।

अंतर्राष्ट्रीय संचार और समाचार समिति: प्रिण्ट माध्यमों के विकास के बाद अंतर्राष्ट्रीय संचार के क्षेत्र में समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं का उपयोग किया जाने लगा। बंदरगाहों पर नियुक्त संवाददाता नाविकों और यात्रियों से वार्तालाप कर अंतर्राष्ट्रीय समाचारों का संकलन करते थेे। ऐसे समाचारों में निष्पक्षता व प्रमाणिकता का अभाव थाजिसके चलते एक निश्चित स्थान पर विश्वसनीय स्रोतों से समाचारों के संकलन और प्रकाशन के लिए उपलब्ध कराने की आवश्यकता महसूस की गईजिसके चलते समाचार समिति (News Agency)  की परिकल्पना का जन्म हुआ। फ्रांसीसी नागरिक चाल्र्स आवास को आधुनिक समाचार समिति का जनक कहा जाता हैजिसने सन् 1825 में 'न्यूज ब्यूरो' नामक दुनिया की पहली समाचार समिति स्थापित की तथा समाचार संकलन के लिए यूरोपीय देशों की राजधानियों में संवाददाता नियुक्त किया। प्रारंभ में आवास अपने ग्राहकों तक विशेष वाहक या डाक विभाग की सहायता से देश-दुनिया के समाचारों को उपलब्ध कराया। बाद मेंइस कार्य के लिए तार का उपयोग करने लगा। सन् 1840 में आवास ने प्रायोगिक तौर पर पेरिसलंदन एवं ब्रुसेल्स के बीच कबूतरों के माध्यम से समाचार भेजने का कार्य प्रारंभ कियाजो अंतर्राष्ट्रीय संचार का अनोखा उदाहरण है। इससे 'न्यूज ब्यूरो' को अत्यधिक लोकप्रियता मिली। सन् 1848 में चाल्र्स आवास ने 6 से10 किलोमीटर की दूरी पर टाॅवर बनाकर टेलीस्कोपी की सहायता से समाचारों को भेजना प्रारंभ किया। इसी साल टेलीग्राफ से समाचार भेजने की प्रणाली विकसित हुई। सन् 1849 में आवास के दो कर्मचारियों ने स्वतंत्र रूप से समाचार समिति का गठन किया। इनमें पहला था- बर्नार्ड वोल्फजिसनेवोल्फ’ नामक समाचार समिति शुरू की। हालांकिबर्नार्ड वोल्फ ने एक साल पहले ही प्रायोगिक तौर पर बर्लिन से नेशनल जीतंुग’ शीर्षक से स्टॉक एक्सचेंज का भाव देना प्रारंभ कर दिया था। दूसरा था- जर्मनी का जुलियस रायटर थाजिसने 'रायटर' नामक समाचार समिति का गठन किया। जुलियस रायटर की समाचार समिति ने समाचार संकलन और वितरण के लिए डाकतार एवं रेलवे का भरपूर उपयोग किया।

समाचार समिति का उद्भव भले ही यूरोपीय देशों में हुआलेकिन इसके प्रभाव से अमेरिका अछूता नहीं रहा। सन् 1848 में न्यूयार्क के कुछ समाचार-पत्रों ने मिलकर 'हार्बर न्यूज एसोसिएशन' नामक समाचार समिति का गठन हुआजो नौकाओं के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय समाचार प्रेषित करती थी। सन् 1850 में 'जनरल न्यूज एसोसिएशन' का गठन हुआ। सन् 1857 में दोनों का 'नेशनल न्यूयार्क एसोसिएटेड प्रेस' के रूप में विलय हो गया। इस समिति ने यूरोप के समाचारों के लिए 'आवास' और'रायटर' के साथ व्यापारिक समझौता कियाजो अंतर्राष्ट्रीय संचार के विकास का उदाहरण है। हालांकि यह समझौता लम्बे समय तक चल नहीं सका। इसी दौरान एक नई समाचार समिति 'यूनाइटेड प्रेस एसोसिएशन' का गठन हुआजिसका सन् 1909 में 'यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल' नामक एक नई समाचार समिति में विलय हो गया। यूरोप की तीनों समाचार समितियों- 'आवास', 'वोल्फ' 'रायटर' ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करने का निर्णय लिया। इससे अंतर्राष्ट्रीय संचार माध्यम के रूप में समाचार समिति का विकास व विस्तार को गति मिली।

अंतर्राष्ट्रीय सूचना-प्रवाह : द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) के बाद का विश्व राजनीतिक आधार पर दो गुटो में विभाजित था। एक गुट का साम्राज्यवादी अमेरिका तथा दूसरे गुट का साम्यवादी सोवियत संघ नेतृत्व करने लगा। इनके बीच भारत जैसे कुछ तीसरी दुनिया के विकासशील देश थेजो धीरे-धीरे विदेशी उपनिवेश से स्वतंत्र हो रहे थे। इनमें अधिकांश देश कमजोर आर्थिक स्थिति वाले थे,जिनकी न तो अंतर्राष्ट्रीय सूचना-प्रवाह में कोई योगदान था और न तो इसके महत्व को समझ पा रहे थे। अमेरिकी विदेश मंत्री 'विलियम वेन्स' ने विकसित देशों के हित में अंतर्राष्ट्रीय सूचना-प्रवाह पर जोर दिया। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) का उपयोग भी किया।

इस प्रकारअमेरिका समेत पश्चिम के विकसित देशों का अंतर्राष्ट्रीय सूचना-प्रवाह पर एकाधिकार और मजबूत हो गया। विकसित देश अपनी समाचार समितियों के माध्यम से जैसा चाहते थेवैसी सूचना दुनिया को उपलब्ध कराने लगे। एक तरफा प्रवाह के कारण विकसित देशों की सूचनाओं को विकासशील देश ज्यों का त्यों स्वीकार करने को विवश थे। पश्चिमी देशों की समाचार समितियों द्वारा सम्प्रेषित सूचनाएं विकासशील देशों के अनुरूप नहीं होती थी। इन सूचनाओं में विकासशील देशों के नकारात्मक पक्ष को प्रमुखता से तथा सकारात्मक पक्ष को दबाकर या विकृत रूप में प्रचारित किया जाता था। विकसित देशों की सूचना राजनीति को तीसरी दुनिया के विकासशील देश शीघ्र ही समझ गए और अंतर्राष्ट्रीय मंचों के माध्यम से भनई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था्य की मांग करने लगे।

नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (NWICO) :  अंतर्राष्ट्रीय संचार के इतिहास की पड़ताल से पता चलता है कि नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था की मांग का प्रमुख कारण विकसित देशों द्वारा असंतुलित सूचना प्रवाह था। इसके अलावा भी कई अन्य थेजिसके चलते तीसरी दुनिया के विकासशील देश पहली दुनिया के विकसित देशों के खिलाफ लामबन्द होने लगे। यथा-
1.         द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद छोटे-छोटे साम्राज्यों के टूटने से नये देशों का अभ्युदय।
2.         पश्चिमी के औद्योगिक व विकसित देशों का नये देशों के साथ सम्बन्धजिससे पश्चिमी देशों का आर्थिक और राजनैतिक प्रभाव का लगातार बढ़ना।
3.         यू.एस. और यू.एस.एस.आर. के आक्रामक प्रभाव से परेशान होकर नये देशों का गुटनिरपेक्ष देशों के साथ जुड़ना।
4.         अंतर्राष्ट्रीय संगठनों- यू.एन.ओ. और यूनेस्को में विकसित देशों का वर्चस्व।

इस मुद्दे को विकासशील देशों ने गुट निरपेक्ष आंदोलन (G-77)संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) तथा संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रमुखता से उठाया। अल्जीरिया में आयोजित (5-9 सितम्बर, 1975) गुट निरपेक्ष देशों के चतुर्थ सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय संचार को बढ़ावा देने के लिए नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (NWICO) की मांग की गई। इस सम्मेलन में 75 सदस्य देश तथा 24 पर्यवेक्षक देश और तीन अतिथि देश सम्मलित हुए थे। इस मुद्दे पर सन् 1976 में ट्यनिस एवं कोलम्बो सम्मेलन में भी विचार-विमर्श किया गया।

अंतर्राष्ट्रीय संचार व्यवस्था पर आधारित विचार-विमर्श का प्रमुख केन्द्र होने के कारण यूनेस्को नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (न्यूको) की स्थापना के लिए प्रयास किया। इसके लिए मैकब्राइड आयोग का गठन और सम्मेलन का आयोजन किया। सन् 1980 में यूनेस्को के सामान्य अधिवेशन में नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (NWICO) के लिए निम्नलिखित दिशा-निर्देशों का निर्धारित किया:-

1.     वर्तमान संचार व्यवस्था में व्याप्त असंतुलन को समाप्त करना।
2.   एकाधिकारीसार्वजनिकनिजी और अति केन्द्रीकृत व्यवस्था के नकारात्मक प्रभाव को समाप्त करना।
3.   विचारों एवं सूचनाओं के स्वतंत्र प्रवाह एवं विस्तारीकरण के मार्ग में आने वाली आन्तरिक एवं वाह्य बाधाओं को दूर करना।
4.   सूचना के साधनों एवं माध्यमों की संख्या में बढ़ोत्तरी करना।
5.   सूचना एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना।
6.   पत्रकारों एवं जनमाध्यमों से जुड़े लोगों की उत्तरदायित्वपूर्ण स्वतंत्रता सुनिश्चित करना।
7.   विकासशील देशों को उनकी क्षमता के अनुरूप उपकरण व प्रशिक्षण में वृद्धि करना और आधारभूत सुविधाओंआवश्यकताओं एवं उद्देश्यों के अनुरूप् संचार व्यवस्था का विकास करना।
8.     विकसित देशों में इन उद्देश्यों की प्राप्ति में सहयोग करने की भावना जागृत करना।
9.     एक दूसरे की सांस्कृतिक पहचान और प्रत्येक देश को अपने व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक हित के बारे में विश्व को सूचित करने के अधिकार का सम्मान करना।
10.   सूचना के अंतर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान के संदर्भ में वैयक्तिक अधिकारों का सम्मान करना।
11.   प्रत्येक व्यक्ति की सूचना एवं संचार व्यवस्था में सहभागिता के अधिकार का सम्मान करना।

नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था ही तीसरी दुनिया के देशों के विकास का प्रमुख साधन है। इसके लिए विकासशील देश लगातार प्रयत्नशील हैं।

मैकब्राइड आयोग : यूनेस्को ने सन् 1977 में एक अंतर्राष्ट्रीय आयोग का गठन कियाजिसके अध्यक्ष आयरलैण्ड के पूर्व विदेशमंत्री सीयेन मैकब्राइड थे। इस आयोग में कनाडा के विश्व विख्यात संचारविद् मार्शल मैकलुहान के अलावा मिचियो नगाईमुस्तफा मसमूदीमोक्तर लूविसएल्बे मा एकेंजो समेत कुल 15 संचार विशेषज्ञशिक्षाविद्पत्रकारिता एवं प्रसारण विशेषज्ञों को सदस्य बनाया गया था। मैकब्राइड आयोग ने नई अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में विकासशील देशों की आवश्यकता को केन्द्र में रखकर सूचना के मुक्त एवं संतुलित प्रवाह की समस्या का अध्ययन किया तथा 82 महत्वपूर्ण सुझाव दिये। अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद मैकब्राइड आयोग स्वतः समाप्त हो गया।

सन् 1980 में मैकब्राइड आयोग ने 'दुनिया एक - विचार अनेक(Many Voices One world) शीर्षक से अपनी अध्ययन रिपोर्ट प्रस्तुत कियाजिसमें पश्चिमी देशों के संचार माध्यमों के साम्राज्यवादी एवं एकाधिकारवादी प्रभुत्व पर चिन्ता व्यक्त की गई थी। इस रिपोर्ट में यूनेस्को ने बेलग्रेड सम्मेलन में प्रस्तुत किया। इस दौरान पश्चिम के विकसित देशों ने मैकब्राइड आयोग के सुझावों को मानने से इंकार कर दिया। मैकब्राइड आयोग का सुझाव था कि- 'संचार माध्यमों का सामाजिक या आर्थिक नीति के औजार के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए।' जबकि पश्चिमी देशों का तर्क था कि- 'संचार माध्यमों को अपने उद्देश्य का निर्धारण और क्रियान्वयन के मापदण्डों का स्वयं निर्धारित करना चाहिएन कि सरकारों या अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को।'

बेलग्रेड बैठक में जिन प्रस्तावों को स्वीकृति मिलीउनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सभी सदस्य देशों से आह्वान किया गया कि वे अपनी राष्ट्रीय संचार क्षमताओं का विकास करें और विचार,अभिव्यक्ति एवं सूचना की स्वतंत्रता की रक्षा की मूल आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए संचार के विकास की रणनीति का हिस्सा बनाये। साथ ही यूनेस्कों से अपेक्षा की गई कि वह सूचना और संचार के नए क्षेत्र में समस्याओं की पहचान करने तथा उनके समाधान में निर्णायक भूमिका का निर्वाह करें। इसके बावजूद किसी प्रकार का अंतर्राष्ट्रीय कानून बनाने का निर्णय नहीं लिया। अंतर्राष्ट्रीय संचार एवं सूचना प्रवाह के संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय कानून बनाने का सबसे पहले अमेरिका ने विरोध किया और वह यूनेस्को से अलग हो गया। बाद में ब्रिटेन ने भी अमेरिका की राह पर चलना प्रारंभ कर दिया और वह भी अलग हो गया।

गुट निरपेक्ष समाचार समिति पूल : जुलाई 1976 में गुट निरपेक्ष देशों का सम्मेलन नई दिल्ली में हुआजिसमें अंतर्राष्ट्रीय संचार के दौरान असंतुलित सूचना प्रवाह पर चिन्ता व्यक्त की गई तथा गहन विचार-विमर्श के बाद प्रस्ताव पारित कर नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था के तहत गुट निरपेक्ष समाचार समिति पूल का गठन किया गया। इसके तहत गुट निरपेक्ष देशों की समाचार समितियों के बीच समाचारों के आदान-प्रदान की व्यवस्था की गई। इस पूल का भारत सन् 1976 से1979 तक प्रथम संस्थापन अध्यक्ष बना। इसका कार्य क्षेत्र विश्व के चारों महाद्वीपों- एशियापूर्वी यूरोपअफ्रीका और लैटिन अमेरिका तक फैला हुआ है। गुट निरपेक्ष समाचार समिति पूल के माध्यम से चार भाषाओं- अंग्रेजीफ्रेंचस्पेनिष और अरबी में समाचारों का आदान-प्रदान किया जाने लगा।

पूल की गतिविधियों को संचालन एक निर्वाचित संस्था के द्वारा किया जाता हैजिसे समन्वय समिति भी कहा जाता है। पूल की अध्यक्ष का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है। समन्वय समिति के सदस्यों का चयन क्षेत्रीय प्रतिनिधित्वनिरंतरतासक्रिय सहभागिता और क्रम के आधार पर किया जाता है। भारत में न्यूज पूल डेस्क संचालन भप्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया्य ;च्ण्ज्ण्प्ण्द्ध द्वारा किया जाता है।

भारत की भूमिका: अंतर्राष्ट्रीय संचार के क्षेत्न में नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (NWICO) की स्थापना और विकास में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही हैक्योंकि भारत न्यूको की लक्ष्य प्राप्ति और सिद्धान्तों के पुनः निर्माणरक्षा और आगे बढ़ाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहा है। सन्1978 में आयोजित यूनेस्कों के 20वीं सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि मण्डल ने श्रीलंका के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर पूरब-पश्चिम देशों के तनाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका उल्लेख जनसंचार माध्यम घोषणा में भी किया गया है। नई विश्व सूचना एंव संचार व्यवस्था के लक्ष्य अन्तर्राष्ट्रीय संचार में सामन्जस्य स्थापित करने के लिए सूचना के संतुलित प्रवाह की व्यवस्था करना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भारत की अगुवाई में गुट निरपेक्ष समाचार समिति पूल का गठन किया गया। इसके अलावाभारत सरकार द्वारा विकासशील देशों के प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण के उद्देश्य से नई दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान में कई प्रकार के कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है।

निष्कर्ष : उपरोक्त प्रयासों के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय संचार के क्षेत्र में विकसित देशों का वर्चस्व कायम है। इसका ज्वलन्त उदाहरण खाड़ी और अफगानिस्तान युद्ध के दौरान अमेरिकी संचार माध्यमों द्वारा प्रसारित भ्रामक सूचना। युद्ध से जुड़ी वास्तविक सूचना को प्रसारित कर भअलजजीरा्य ने अमेरिकी संचार माध्यमों को बेपर्दा किया तो उनके स्टूडियो पर हमला किया गया। द्वितीय खाड़ी युद्ध में अमेरिका ने एक तरह से अघोषित सेंसरशिप लागू किया थाक्योंकि अमेरिकी संचार माध्यमों पर उन्हीं सूचनाओं व समाचारों का प्रसारण व प्रकाशन किया जाता थाजो अमेरिकी शासन की नीतियों के अनुरूप होती थी। इसके विपरीत प्रसारण या प्रकाशन करने का प्रयास करने वालों को सेंसर और शस्त्र के बल से दबाने का पुरजोर प्रयास किया। उपरोक्त घटनाओं से स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय संचार में सूचनाओं के राजनीतिक इस्तेमाल की प्रवृत्ति बढ़ी है। इससे जहां सूचना व समाचार का स्वतंत्र व निष्पक्ष प्रवाह बाधित हो रहा हैवहीं सूचना प्राप्त करने के वैयक्तिक अधिकार का हनन भी हो रहा है। 
अंतर्राष्ट्रीय सूचना प्रवाह की निष्पक्षतास्वतंत्रता और निरंतरता संचार माध्यमों की परस्पर निर्भरता पर आश्रित होती है। अंतर्राष्ट्रीय संचार के दौरान एक देश के संचार माध्यम व समाचार समिति द्वारा दूसरे देश के संचार माध्यम व समाचार समिति को सूचना देने से समाचार का सतत् प्रवाह होता है। इसके लिए जितना सूचनाओं एवं समाचारों का संकलन अनिवार्य हैउतना ही उसे पाठकों व दर्शकों तक पहुंचाना। वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में संचार माध्यमों के अंतर्राष्ट्रीयकरण के कारण विकासशील देशों के समक्ष सांस्कृतिक पहचान खोने का खतरा हैक्योंकि विकसित देश मीडिया उत्पाद (संचार माध्यमों में प्रकाशित व प्रसारित होने वाली सामग्री) के निर्यातक है। इनका निर्माण निर्यातक देश अपने सांस्कृतिक परिवेश को ध्यान में रखकर करते हैं। आयातक देश उसमें कोई परिवर्तन नहीं कर पाते हैं। इस प्रकारआयातक देशों के समक्ष अपनी सांस्कृतिक पहचान खोने का खतरा मड़रा रहा है। वर्तमान समय में पश्चिमी देश अपने मीडिया उत्पाद के माध्यम से अपरोक्ष रूप से सांस्कृतिक सामाज्यवाद स्थापित कर रहे हैंजिससे सांस्कृतिक सामाज्यवाद का विस्तार होता है।

21वीं शताब्दी के मौजूदा दौर में अंतर्राष्ट्रीय संचार मानव जीवन का अनिवार्य अंग बन चुका है। इस दिशा में पिछले पांच दशकों से निरंतर विकास हो रहा है। वर्तमान समय में ऐसी वैश्विक परिस्थिति बन चुकी है कि विश्व की अद्यतर घटनाओं एवं सूचनाओं की जानकारी प्राप्त करने को मानव हर पल उत्सुक हैजिसमें आधुनिक संचार माध्यम (प्रिण्टइलेक्ट्राॅनिक व वेब) मदद करते हैं। इन संचार माध्यमों के कारण अंतर्राष्ट्रीय संचार बेहद आसान होने के कारण लगता है कि सूचना का मुक्त प्रवाह हो रहा है।

(प्रतियोगिता दर्पण अगस्त, 2015 में प्रकाशित)


मंगलवार, 30 जनवरी 2018

विकास संचार

विकास संचार बनाम संचार विकास

संचार का विकास एवं विकास संचार में व्यापक अंतर है। संचार के विकास से तात्पर्य संचार माध्यमों (समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, टेलीविजन चैनलों, रेडियो स्टेशनों और अन्य संचार नेटवर्को ) के विकास से है, जबकि विकास संचार का अर्थ किसानों, महिलाओं, युवाओं, कामगारों व समाज के कमजोर वर्गो के जीवन स्तर को बेहतर बनाने हेतु संचार की मदद विकास को विस्तार देने से सम्बन्धित है। विकास के लिए किए जाने वाले प्रत्यत्नों का संचार प्रमुख अंग है। लोगों को विकास कार्यक्रमों के प्रति सचेत करना तथा उनकी सहभागिता सुनिश्चत करना विकास संचार का उद्देश्य है, क्योंकि विकास प्रक्रिया तभी सार्थक होती है, जब उसमें लोगों की भागीदारी होती है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विकास संचार, जनसंचार की प्रमुख शाखा के रूप में तेजी से उभरा। संचार विशेषज्ञों ने सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक खुशहाली के लिए विकास संचार विषय पर केंद्रीय अनुसंधान किया तथा मानव जीवन को परिवर्तित कर बेहतर वातावरण एवं स्थितियों के निर्माण में दिलचस्पी दिखायी। इसका उद्देश्य समाज का पिछड़ापन दूर करना, नए विचारों व नई प्रौद्योगिकी को स्वीकार करने के लिए लोगों को तैयार करना है। यहीं कारण है कि 21वीं शताब्दी में विकास संचार एक प्रबल शक्ति माना जाता है।

विकास संचार के संदर्भ में विशेषज्ञों की अलग-अलग धारणाएं है। कुछ विद्वानों का मानना है कि संगठित सूचना प्रवाह या प्रणाली ही विकास संचार है। कुछ विद्वानांे का मानना है कि विकास संचार को संस्कृृति एवं सामाजिक परिवर्तनों के विविध पक्षों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है, जो लोग विकास संचार को संदेश सम्प्रेषण की प्रक्रिया तक सीमित रखते हैं, तो उचित नहीं है, क्योंकि यह आधुनिकीकरण की एक प्रक्रिया मात्र हैं, जिसे दूसरे शब्दों में प्रौद्योगिकी का प्रसार एवं उसे अपनाया जाना, लोगों में कुछ मूल्यों, पद्धतियों एवं व्यवहारों का समावेश करना है। संचार या सूचना लोगों को उत्प्रेरित करने वाले औजार हैं, जो आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में साहयक हो सकते हैं। यह उत्प्रेरक संचार, लोगों तक विकास सम्बंधी विचारों एवं प्रौद्योगिकी को लक्षित आडियंस या लोगों तक पहंचाती है। इस प्रकार आधुनिकीकरण प्रारूप् में विकास संचार प्रेरित करने वाली मार्केटिंग या विक्रय प्रक्रिया है।

लेकिन इस विकास संचार के मार्केटिंग मॉडल्स के आलोचक इसे पश्चिमी प्रौद्योगिकी वाली विचारधारा मानते हैं। इनका मत है कि लोगों का इस मॉडल के प्रति प्रेरित करने वाले अभियान लोगों का इस ओर ध्यान नहीं दिलाते जिस सांस्कृृतिक संदर्भ में वे जाते हैं। इनका यह भी मानना है कि विशाल विकास परियोजनाओं में भारी धनराशि नियोजित की जाती है। इसलिए ये परियोजनाएं जिनको लक्षित करके तैयार की जाती है, उनका अधिक हित नहीं करती है। उनका कहना है कि जिन विकासशील देशों में यूरोपीय लोग कार्य करते हैं, उसके लिए इन देशों में विशेषज्ञता उपलब्ध है। इसके अलावा इन विकासशील देशों के भ्रष्ट नेता एवं सरकारी कर्मचारी, विेश्शी सहायता के नाम पर धन कमाते हैं। इसलिए गरीबी एवं अमीरी के बीच का फासला बढ़ता है। इसलिए इन आलोचकों का मत है कि विकास संचार एक मत निर्माण की प्रक्रिया है। यह किसी भी देश्श के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर आधारित नहीं होनी चाहिए तथा किसी देश की संस्कृृति के प्रति संवेदनशील होनी चाहिए। यह मात्र सूचनाएं देने एवं नवीनता का समाहित करने मात्र तक की प्रक्रिया नहीं है। विकास संचार प्रक्रिया में समाज के उन गरीब, कमजोर महिलाओं व अन्य लोगों की भागीदारी होनी चाहिए, जो सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में एक कोने में ढकेल दिए जाते हें। इस प्रकार विकास संचार का कार्य मात्र सूचना प्रसारित करना नहीं बल्कि संचार के संगठनात्मक मूल्यों को ध्यान में रखना भी है। विकास संचार को सामाजिक कार्यो, सामुदायिक मनोविज्ञान, सामुदायिक संगठन एवं अन्य क्षेत्रों से जो लोगों को शक्तिशाली बनाते हैं, उनसे अवधारणाएं एवं उनके क्रियान्वयन करने की प्रेरणा लेने की जरूरत है।

स्वतंत्रता की विचारधारा वाले लोग विकास संचार को अन्य रूप में परिभाषित करते हैं। इनका मत है कि शोषण एवं दबाव से मुक्ति या स्वतंत्रता, समुदाय एवं व्यक्ति को शक्तिशाली बनाना ही विकास संचार का लक्ष्य होना चाहिए। इसलिए विकास संचार, संदेश्शों को आदान-प्रदान नहीं बल्कि यह व्यक्ति एवं समाज को ऊंचा उठाने की प्रक्रिया है। इस प्रकार समाज का उत्थान होने से यह अपने भविष्य के निर्माण करने की दिशा में स्वतंत्र होगा। इसमें हर व्यक्ति की भागीदारी होनी चाहिए। यह माना गया है कि जब लोगों को शोषण के स्रोत एवं अपनी शक्ति के स्रोत का ज्ञान हो जायेगा तो वे अपनी समस्याओं का निदान स्वयं करने लगेंगे। लोगों के बीच या छोटे समूहों के बीच जब संवाद कायम होगा तो लोगों में अपनी शक्ति के प्रति जागृृति आयेगी। यह संचार प्रक्रिया, विकास में भागीदारी निभाने वाले लोगों के सामने उन मुद्दों को उद्घाटित करेगी, जो उनके लिए अहम हैं।

विकास संचार का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसमें शैक्षणिक संचार, जनसंख्या एवं स्वास्थ्य संचार, वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी संचार, कृृषि संचार, पर्यावरण संचार, ग्रामीण संचार आदि शामिल है। विकास सम्बन्धी प्रतिवेदनों, स्पष्टीकरणों, विचार-विमर्शो, विश्लेषणों, मूल्यांकनों आदि के सभी पक्षों पर ध्यान देकर विकास कार्यो को ऊर्जा देने का प्रयास किया जाता है। विकास संचार विशेषज्ञों का मानना है कि- भाग्य कभी ऊपर से नहीं टपकता है। व्यक्ति को स्वयं प्रयत्न करके अपने भाग्य का उदय करना पड़ता है। जनसंचार के क्षेत्र में यह धारणा है कि व्यक्ति स्वयं अपनी स्थितियों में परिवर्तन ला सकता है। विकास के विभिन्न प्रकारों में ग्रामीण संचार पर विशेष जोर दिया जाता है, क्योंकि जहां विकास की सर्वाधिक जरूरत ग्रामीण क्षेत्रों में होती है, वहीं विकास संचार का अधिक महत्व होता है।
Source:- http://bjmc220406.blogspot.in/2016/02/blog-post.html

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

Empirical research(अनुभवजन्य अनुसंधान)

अनुभवजन्य और वैचारिक रूप से दो दृष्टिकोण हैं जिन्हें आमतौर पर एक शोध आयोजित करते समय नियोजित किया जाता है। संकल्पनात्मक को शोधकर्ताओं के रूप में विश्लेषणात्मक भी कहा जाता है, जबकि अनुभवजन्य विश्लेषण एक पद्धति है जो अवलोकन और प्रयोग के माध्यम से एक दी गई परिकल्पना का परीक्षण करता है।
अनुभवजन्य अनुसंधान में, डेटा संग्रह अवलोकन और प्रयोग के माध्यम से किया जाता है। यदि कोई परिकल्पना है, और दो वैज्ञानिक इस पर अलग-अलग निरीक्षण और प्रयोग के माध्यम से जानकारी इकट्ठा करते हैं, तो वे अनुभवजन्य शोध में अवलोकन के भाग के कारण थोड़ा भिन्न परिणाम प्राप्त कर सकते हैं, जो कि अलग होने के लिए बाध्य है क्योंकि दो अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग धारणाएं हो सकती हैं अनुसंधान के अवलोकन भाग का आयोजनसंकल्पनात्मक विश्लेषण सामाजिक विज्ञान और दर्शन में विश्लेषण का पसंदीदा तरीका है। प्रमेय के विषय में गहरे दार्शनिक मुद्दे की बेहतर समझ प्राप्त करने के लिए, यहां एक शोधकर्ता अपने घटक भागों में एक प्रमेय या अवधारणा को तोड़ देता है। यद्यपि विश्लेषण की इस पद्धति ने लोकप्रियता पाई है, इस पद्धति की तेज आलोचनाएं हैं। हालांकि, अधिकांश मानते हैं कि वैचारिक विश्लेषण विश्लेषण का एक उपयोगी तरीका है, लेकिन बेहतर, समझा जा सकने वाले परिणामों के उत्पादन के लिए विश्लेषण के अन्य तरीकों के साथ प्रयोग किया जाना चाहिए।
अनुभवजन्य अवलोकन और प्रयोग पर निर्भर है, और जांच करने योग्य परिणाम पैदा करता है, यह ज्यादातर वैज्ञानिक अध्ययनों में प्रयोग किया जाता है.

A.D. de Groot's empirical cycle

Observation: The observation of a phenomenon and inquiry concerning its causes.
Induction: The formulation of hypotheses - generalized explanations for the phenomenon.
Deduction: The formulation of experiments that will test the hypotheses (i.e. confirm them if true, refute them if false).
Testing: The procedures by which the hypotheses are tested and data are collected.
Evaluation: The interpretation of the data and the formulation of a theory - an abductive argument that presents the results of the experiment as the most reasonable explanation for the phenomenon.

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

क्‍या है डि‍जि‍टल

दूरसंचार नि‍यामक आयोग (ट्राई) की फरवरी 2014 की रि‍पोर्ट के अनुसार देश में कुल 90 करोड़ टेलीफोन उपभोक्‍ताओं में से 54 करोड़ शहरी और 35 करोड़ ग्रामीण हैं। वहीं इंटरनेट की बात करें तो 22 करोड़ इंटरनेट उपभोक्‍ताओं में 15 करोड़ से ज्‍यादा ब्रॉडबैंड का इस्‍तेमाल करने वाले हैं। खुद ट्राई का आंकड़ा यह कहता है कि‍ शहरों में जहां दूरसंचार घनत्‍व 144 प्रति‍शत है, जबकि‍ देश के ग्रामीण इलाकों में यह 41 प्रति‍शत से अधि‍क नहीं बढ़ पाई है। सरकार के ये आंकड़े इस तथ्‍य को साफ उजागर करते हैं कि‍ देश में दूरसंचार साधनों की उपलब्‍धता एक समान नहीं है। शहरों में यह बहुत ज्‍यादा है तो गांवों में बहुत कम।
इसका सबसे अधि‍क प्रभाव कनेक्‍टि‍‍वि‍टी पर पड़ता है। शहरों में जहां प्रति‍ दो कि‍लोमीटर पर एक मोबाइल टॉवर, मांगे जाने पर तुरंत टेलीफोन और इंटरनेट कनेक्‍टि‍वि‍टी मि‍ल जाती है, वहीं गांवों खासकर आदि‍वासी बहुल इलाकों में मीलों दूर तक मोबाइल के टॉवर दि‍खाई नहीं देते। वायरलाइन टेलीफोन और ब्रॉडबैंड कनेक्‍टि‍वि‍टी की बात करें तो वि‍कासखंड (ब्‍लॉक) से आगे टेलीफोन के केबल नहीं बि‍छाए जा सके हैं। भारत में अभी 4जी सेवाओं को शुरू करने की बात हो रही है, लेकि‍न गांवों में 2जी सेवाओं का भी वि‍स्‍तार नहीं हो पाया है। यानी हमारे गांव दूरसंचार सेवाओं के मामले में शहरों से 15 साल पीछे हैं। यह जमीनी हकीकत कई सवाल खड़े करती है। जैसे, अगर शहरों और गांवों के लोगों के लि‍ए मोबाइल और टेलीफोन की कॉल दरें एक समान ही है तो ग्रामीणों को एक कॉल करने के लि‍ए घर से नि‍कलकर नेटवर्क की तलाश में दूर क्‍यों चलना पड़ता है ? देश में स्‍पेक्‍ट्रम आवंटन की नीति‍ में नि‍जी टेलीकॉम ऑपरेटरों के लि‍ए इस बात की बाध्‍यता क्‍यों नहीं है कि‍ वे शहरों और गांवों में एक समान गुणवत्‍ता की सेवाएं उपलब्‍ध कराएं ? मोबाइल नेटवर्क को सक्रि‍य रखने वाली वायु तरंगों (एयर वेव्‍स) को सुप्रीम कोर्ट ने प्राकृति‍क संसाधन मानते हुए सरकार से इनके समान वि‍तरण की व्‍यवस्‍था करने को कहा हुआ है। इसके बावजूद सरकार नि‍जी टेलीकॉम ऑपरेटरों को ग्रामीण इलाकों में भी शहरों की तरह दूरसंचार घनत्‍व बढ़ाने के लि‍ए बाध्‍य क्‍यों नहीं कर पाती ? ऐसा क्‍यों है कि‍ नि‍जी टेलीकॉम ऑपरेटरों की कुल कमाई पर लगाए गए सरकारी उपकर से प्राप्‍त आय को गांव तक इंटरनेट पहुंचाने में खर्च नहीं कि‍या जा रहा है ? शहरों में भी गरीब बस्‍ति‍यों के रहवासि‍यों की कनेक्‍टि‍वि‍टी बाकी संभ्रांत क्षेत्रों के मुकाबले बहुत कम है। शहरों के लगातार हो रहे वि‍स्‍तार और ढांचागत परि‍योजनाओं के कारण वि‍स्‍थापि‍त हो रहे लोगों की मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं तक पहुंच और कनेक्‍टि‍वि‍टी प्रभावि‍त हो रही है। प्रशासन यह सुनि‍श्‍चि‍त कर पाने में काफी हद तक नाकाम रहा है कि‍ शहरों से दूर बसाई गई वि‍स्‍थापि‍तों की बस्‍ति‍यों तक बाकी मूलभूत सुवि‍धाओं की तरह दूरसंचार सेवाओं का भी वि‍स्‍तार हो सके।
सि‍र्फ संचार साधन ही क्‍यों, प्रसारण सेवाओं के डि‍जि‍टलीकरण की प्रक्रि‍या ने भी शहरों में एक बड़े वर्ग को सूचना और मनोरंजन के साधनों से वंचि‍त कि‍या है। मध्‍यप्रदेश के भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्‍वालि‍यर जैसे शहरों में गरीब बस्‍ति‍यों के वे परि‍वार जो डि‍जि‍टल केबल टीवी का महंगा खर्च नहीं उठा सकते, वे अभी कि‍सी तरह दूरदर्शन देख पा रहे हैं। हालांकि‍, इस साल के आखि‍र तक दूरदर्शन को भी डि‍जि‍टल करने की योजना है, जि‍ससे ऐसे परि‍वारों से सूचनाओं और मनोरंजन का एकमात्र स्रोत भी छि‍न जाएगा।
दूरसंचार मंत्रालय ने डि‍जि‍टल केबल और डीटीएच सेवाएं देने वाले ऑपरेटरों के लि‍ए नि‍यम तो बनाए हैं, लेकि‍न जमीन पर इनका अमल नहीं हो रहा है। केबल की महंगी दरें, एकमुश्‍त 1500 रुपए का खर्च और सेवाओं की गुणवत्‍ता में कमी ने भी वंचि‍तपन को बढ़ाया है। अगर शहरों में केबल और डीटीएच के रूप में डि‍जि‍टल टेलीवि‍जन के दो वि‍कल्‍प उपलब्‍ध हैं तो गांवों में केवल डीटीएच ही लोगों का एकमात्र वि‍कल्‍प है। गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले परि‍वारों के लि‍ए नि‍जी डीटीएच सेवाओं के लि‍ए प्रति‍माह 160-200 रुपए चुकाना एक महंगा वि‍कल्‍प है। यहां सरकार डीडी डायरेक्‍ट प्‍लस जैसी मासि‍क शुल्‍क से मुक्‍त सेवाओं को बढ़ावा दे सकती थी, लेकि‍न ऐसा न कर लोगों को बाजार के हवाले कि‍या गया है।
इंटरनेट, दूरसंचार और प्रसारण सेवाओं के मामले में पहुंच, कनेक्‍टि‍वि‍टी और गुणवत्‍तामूलक सेवाओं के लि‍ए शहरों और गांवों के बीच यह फासला असल में सूचना और अभि‍व्‍यक्‍ति‍ के उस मौलि‍क अधि‍कार का हनन है, जो संवि‍धान के अनुच्‍छेद 19(1ए) के तहत देश के प्रत्‍येक नागरि‍क को समान रूप से मि‍ला है। न तो सरकार और न ही नि‍जी ऑपरेटर संसाधनों की कमी का बहाना बनाकर इस हक को अनदेखा नहीं कर सकते। अगर शहर में बेहतर सेवाओं के लि‍ए संसाधन हैं तो गांव इससे अछूते नहीं रह सकते। सवाल संसाधनों के समान वि‍तरण का है। डि‍जि‍टल संचार में शहरों और गांवों के बीच के फासले की यही मूल वजह है।
स्रोत:- http://www.digitalinequality.org/the-divide/15-

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

संचार: महत्व एवं कार्य

संचार क्या है

सार्थक चिन्हों द्वारा सूचनाओं को आदान -प्रदान करने की प्रक्रिया संचार है। किसी सूचना या जानकारी को दूसरों तक पहुंचाना संचार है। जब मनुष्य अपने हाव-भाव, संकेतों और वाणी के माध्यम से सूचनाओं का आदान प्रदान आपस में करता है तो वह संचार है। कम्यूनिकेशन अंग्रेजी भाषा का शब्द है जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के ``Communis´´ नामक शब्द से हुई है। इसका अर्थ समुदाय होता है। अर्थात भाईचारा, मैत्री, भाव, सहभागिता, आदि इसके अर्थ हो सकते है। इसलिए संचार का अर्थ एक-दूसरे को जानना, समझना, संबध बनाना, सूचनाओं का आदान प्रदान करना आदि है। इसके माध्यम से मनुष्य अपने विचारों, भावों, अनुभवों को एक दूसरे से बांटता है। वास्तव में विचारों की अभिव्यक्ति जिज्ञासाओं को परस्पर बांटना ही संचार का मुख्य उद्देश्य है।

संचार मनुष्यों के अलावा पशु पक्षियों में भी होता इसके लिए माध्यम का होना अति आवश्यक है। चिड़िया का चहचहाना, कुत्ते का भोंकना, सर्प का भुंकार मारना, शेर का दहाड़ना, गाय का रंभाना, मेंढ़क का टर-टर करना भी संचार है। भाषा ही संचार का पहला माध्यम है। भाषा के द्वारा ही हम अपने विचारों को समाज में आदान प्रदान करते है। इसीलिए कहा जा सकता है कि सूचनाओं, विचारों एवं भावनाओं को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक भाषा के माध्यम से ही अपने विचारों अनुभवों को समाज के सामने रख कर यथेष्ठ सूचना का प्रेषण करते है।

संचार मौखिक भी होता है और लिखित भी होता है। संचार का तीसरा चरण मुद्रण से संबध रखता है। और चौथे चरण को जनसंचार कहते है। वास्तव मे संचार एक प्रक्रिया है संदेश नहीं। इस प्रक्रिया में एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से बातचीत करता है। अपने अनुभवों को बांटता है। संचार ने ही पूरी दुनिया को एक छोटे से गांव में तब्दील कर दिया है। अमेरिकी विद्वान पसिंग ने मानव संचार के छह घटक बताऐं है। 
संचार के तत्व

प्रेषक : संदेश भेजने वाला 

संदेश : विचार, अनुभव, सूचना

संकेतीकरण या इकोडिंग : विचार को संकेत चिन्ह में बदलना 

माध्यम : जिसके द्वारा संदेश भेजा जाता है

प्राप्तकर्ता : संदेश प्राप्त करने वाला

संकेतवाचन या डीकोडिंग : प्राप्तकर्ता संदेश को अपने मस्तिष्क में उसी अर्थ में ढ़ाल लेना
देश तथा विदेश में मनुष्य की दस्तकें बढ़ती है। इसलिए संचार-प्रक्रिया का पहला चरण प्रेषक होता है। इसको इनकोडिंग भी कहते है। एनकोडिंग के बाद विचार शब्दों, प्रतीकों, संकेतों एवं चिन्हों में बदल जाते है। इस प्रक्रिया के बाद विचार सार्थक संदेश के रूप में ढल जाता है। जब प्राप्तकर्ता अपने मस्तिष्क में उक्त संदेश को ढ़ाल लेता है तो संचार की भाषा में इसे डीकोडिंग कहते है। डीकोडिंग के बाद प्राप्तकर्ता अपनी प्रतिक्रिया भेजता है इस स्थिति को फीडबेक या प्रतिपुष्टि कहते है।

संचार की विशेषताऐं
संदेश का संप्रेषण एवं विश्लेषण करना।
संचार उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए।
प्रभावी होने के साथ-साथ सार्थक भी होना चाहिए। दो व्यक्तियों में सार्थकता का निर्माण संप्रेषण से होता है।
संप्रेषक को पहले सूचना एवं तथ्य को हृदयंगम कर लेना चाहिए।


किसी संदेश के लिए पांच प्रश्नों का उत्तर पूछना अतिआवश्यक है:-
1. कौन कहता है?

2. क्या कहता है?

3. किस माध्यम से कहता है

4. किससे कहता है?

5. किस प्रभाव के साथ कहता है।


Communication (संचार) का अर्थ हैं सूचनाओ का आदान प्रदान करने से हैं | लेकिन ये सूचनाये तब तक उपयोगी नहीं हो सकती जब तक कि इन सूचनाओ का आदान प्रदान न हो | पहले सूचनाओ या सन्देश को एक स्थान से दुसरे स्थान पर भेजने में काफी समय लगता था | किन्तु वर्तमान में संदेशों का आदान प्रदान बहुत ही आसान हो गया हैं और समय भी कम लगता है सेटेलाइट व टेलीविजन ने तो सारी दुनिया को एक नगर में बदल दिया हैं |
जब दो या दो से अधिक व्यक्ति आपस में कुछ सार्थक चिह्नों, संकेतों या प्रतीकों के माध्यम से विचारों या भावनाओं का आदान-प्रदान करते हैं तो उसे संचार कहते हैं।
“Communication refers to the act by one or more persons of sending and receiving messages – distorted by noise-with some effect and some opportunity for feedback”
Use of Communication and IT (Information Technology):-
हमारे पास कम्युनिकेशन के सबसे प्रबल माध्यम में हमारी आवाज और भाषा है और इसके वाहक के रूप में पत्र, टेलीफोन, फैक्स, टेलीग्राम, मोबाइल तथा इन्टरनेट इत्यादि हैं | कम्युनिकेशन का उद्देश्य संदेशो तथा विचारो का आदान प्रदान है| सम्पूर्ण मानव सभ्यता इसी कम्युनिकेशन पर आधारित है तथा इस कम्युनिकेशन को तेज व सरल बनाने के लिए सूचना प्रोद्योगिकी का जन्म हुआ| कंप्यूटर, मोबाइल, इन्टरनेट सबका अविष्कार इसी कम्युनिकेशन के लिए हुआ इन्टरनेट एक ऐसा सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा हम पूरी दुनिया में कही भी व किसी भी समय कम से कम समय व कम से कम खर्च में सूचनाओ व विचारो का आदान प्रदान कर सकते हैं|
Communication Process (संचार प्रक्रिया)
कम्युनिकेशन का मुख्य उद्देश्य डाटा व सूचनाओ का आदान प्रदान करना होता है| डाटा कम्युनिकेशन से तात्पर्य दो समान या विभिन्न डिवाइसों के मध्य डाटा का आदान प्रदान से है अर्थात कम्युनिकेशन करने के लिए हमारे पास समान डिवाइस होना आवश्यक है | डाटा कम्युनिकेशन के प्रभाव को तीन मुख्य विशेषताओ द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है|
  1. डिलीवरी (Delivery) – डिलीवरी से तात्पर्य डाटा को एक जगह से दुसरे जगह प्राप्त कराने से है|
  2. शुद्धता (Accuracy) – यह डाटा की गुणवत्ता या डाटा के सही होने को दर्शाता है|
  3. समयबधता (Timeliness) – यह गुण डाटा के निश्चय समय में डिलीवर होने को दर्शाता है|
किसी कम्युनिकेशन प्रोसेस (प्रक्रिया) में पाँच घटक जुड़े होते हैं|
  • संदेश (Message)
  • प्रेषक (Sender)
  • माध्यम (Medium)
  • प्राप्तकर्ता (Receiver)
  • प्रोटोकॉल (Protocol)

विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई संचार की परिभाषा
संचार एक शक्ति है जिसमें एक एकाको संप्रेषण दूसरे व्यक्तियो को व्यवहार बदलने हेतु प्रेरित करता है।
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हावलैंड
वाणी, लेखन या संकेतों के द्वारा विचारों अभिमतों अथवा सूचना का विनिमय करना संचार कहलाता है।
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रॉबर्ट एंडरसन
संचार एक पक्रिया है जिसमें सामाजिक व्यवस्था के द्वारा सूचना, निर्णय और निर्देश दिए जाते है और यह एक मार्ग है जिसमें ज्ञान, विचारों और दृष्टिकोणों को निर्मित अथवा परिवर्तित किया जाता है।
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लूमिक और बीगल
संचार समानूभूति की प्रक्रिया या श्रृंखला है जो कि एक संस्था के सदस्यों को उपर से नीचे तक और नीचे से उपर तक जोड़ती है।
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मैगीनसन
संचार के कार्य (Functions of Communication)

       21वीं शताब्दी का मानव संचार माध्यमों से घिरा हुआ है। इसके अभाव में न तो कोई व्यक्ति, समूह व समाज प्रगति कर सकता है और न तो मानव जीवन में जीवान्तता  आ सकती है। इसकी उपयोगिता को देखते हुए लार्ड मैकाले ने संचार को 'चौथीसत्ता' का नाम दिया। संचार के कार्यो को उनकी प्रकृति के आधार पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। पहला, प्राथमिक कार्य- जिसके अंतर्गत सूचना देना, शिक्षित करना, निर्देशित करना दूसरा, द्वितीयक कार्य- जिसके अंतर्गत विचार विमर्श, संगोष्ठी, सेमीनार, परिचर्चा, वार्तालॉप इत्यादि आते हैं । संचार विशेषज्ञ हैराल्ड लॉसवेल ने संचार के तीन प्रमुख कार्य बतलाया है।  
1. सूचना संग्रह एवं प्रसार,
2. समाज व परिवेश के विभिन्न अंगों से सम्बन्ध स्थापित करना, और
3. सांस्कृतिक विरासत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरित करना। 

    
(1) सूचित करना : एक जमाना था, जब कहा जाता था- Knowledge is Power (ज्ञान ही शक्ति है), लेकिन आज कहा जाता है- The Information is Power (सूचना ही शक्ति है)।  दूसरे शब्दों में, जिसके पास नवीनतम और अधिकतम सूचना होगी, वह सबसे अधिक ताकतवर होगा। आधुनिक युग में सूचना एक शक्तिशाली हथियार बनकर उभरा है, जिस व्यक्ति या समाज या राष्ट्र के पास जितनी अधिक सूचना होती है, उसे उतना ही अधिक शक्तिशाली माना जाता है। उतना ही अधिक प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है। मानव अपने जिज्ञासु स्वभाव के कारण पास-पड़ोस और देश-दुनिया की ताजातरीन घटनाओं से जुड़ी सूचनाओं को जानने के लिए सदैव तत्पर रहता है। सूचनाओं के अभाव में स्वयं को समाज से कटा हुआ महसूस करता है। आधुनिक युग में संचार माध्यमों का प्रमुख कार्य सूचना देना है। इस कार्य को समाचार पत्र, पत्रिका, रेडियो, टेलीविजन, कम्प्यूटर, ई-मेल, इंटरनेट, टेलीफोन, मोबाइल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स, यू-ट्यूब, वेब पोर्टल्स इत्यादि के माध्यम से किया जा रहा है।  

(2) शिक्षित करना : संचार का दूसरा प्रमुख कार्य शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर समाज के लोगों को शिक्षित करना है। शिक्षा ने विज्ञान को जन्म दिया है और विज्ञान ने संचार माध्यमों को। अब संचार माध्यम शिक्षा और विज्ञान दोनों के प्रचार व प्रसार में उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं। समाज को शिक्षित करने का उद्देश्य मात्र पढऩा-लिखना नहीं है, बल्कि देश व समाज में उपलब्ध संसाधनों की जानकारी देकर उपयोग करने योङ्गय बनाना है। शिक्षा से मानव का बौद्धिक विकास व चरित्र निर्माण होता है। मानव जीवन में कलात्मकता का सूत्रपात होता है। अपने अनुभवों के आदान-प्रदान से मानव बहुत कुछ सीखने का प्रयत्न करता है। अनुभवों का उद्भव अनौपचारिक संचार से होता है, जिसमें औपचारिक शिक्षा की भूमिका महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का कथन है कि, संचार माध्यमों द्वारा शिक्षा का जितना अधिक प्रचार-प्रसार होगा, देश व समाज उतना ही अधिक सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और नैतिक विकास की दृष्टि से समृद्धशाली होगा। आजकल टेलीविजन व रेडियो पर NCERT और IGNOU के अनेक शैक्षणिक कार्यक्रमों का प्रसारण हो रहा है। समाचार पत्रों, पत्रिकाओं व वेबसाइटों पर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के बारे में विस्तृत जानकारी दी जा रही है। अत: लोगों का शिक्षित करना संचार का प्रमुख कार्य है।  

(3) मनोरंजन करना : संचार माध्यमों का तीसरा प्रमुख कार्य लोगों का मनोरंजन करना है। मनोरंजन में मानव जीवन की नीरसता को तोडऩे, चिंता व तनाव से ध्यान हटाने तथा ताजगी भरने की क्षमता होती है। यहीं कारण है कि संचार माध्यमों की मदद से कार्टून, लेख, संगीत, कविता, नाटक इत्यादि का प्रसारण/प्रकाशन किया जाता है। वर्तमान समय में सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन, कम्प्यूटर, इंटरनेट जैसे माध्यम लोगों के समक्ष मनोरंजनात्मक सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं। मनोरंजन लोगों की भावना व संवेदनशीलता से जुड़ा है, क्योंकि अपने दैनिक जीवन में लोग सिनेमा कलाकारों का अनुसरण करते हैं। मनोरंजन के माध्यमों से लोगों को पास-पड़ोस के परिवेश, संस्कृति, फैशन इत्यादि के बारे में जानने, समझने व सीखने का मौका मिलता है। संचार माध्यम समाज में अलग-अलग स्थानों पर बिखरे किन्तु एक ही प्रकृति के लोगों को मनोरंजन के माध्यम से जोड़ता है तथा आनंद की अनुभूति कराता है। सन् 1990 के दशक में टेलीविजन तथा सन् 2000 के दशक में एफएम रेडियो ने बेडरूम में घुसपैठ की तथा मनोरंजनात्मक कार्यक्रमों का प्रसारण कर लोगों को अपने मोह जाल में फंसा लिया। 

      आधुनिक युग में सूचना और मनोरंजन परस्पर एक दूसरे के निकट आ गये हैं। इसका उदाहरण है, समाचार पत्रों में कार्टून तथा टीवी चैनलों पर एनीमेशन के साथ समाचारों का प्रकाशन व प्रसारण। इनके मिश्रण से एक नया शब्द बना है-'इन्फोटेन्मेंट' अर्थात् ऐसी सामग्री जिसमें 'इनर्फोमेशन' (सूचना) भी हो और 'इंटरनेटमेंट' (मनोरंजन) भी।

अन्य कार्य : संचार के अन्य प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं :-

    (A) मानवीय संवेदनाओं को व्यक्त करना,
    (B) भावनात्मक स्तर पर तुष्टिकरण का उपाय करना,
    (C) पर्यावरण संरक्षण के प्रति सदैव तत्पर रहना,
    (D) नवाचार के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करना,
    (E) निरसता को दूर कर बदलाव के लिए प्रेरित करना,
    (F) विभिन्न सामाजिक घटकों पर निगरानी रखना, और
    (G) सामाजिक उन्नयन के लिए प्रयत्नशील रहना।

    उपरोक्त आधार पर कहा जा सकता है कि संचार एक ऐसा वरदान है, जिसका उपयोग कर मानव ने अपने बौद्धिक कौशल को विकसित करने और अपने बुद्धि व परिश्रम के बल पर बेहतर जीवन बनाने का प्रयास किया है। इसीलिए मानव को अन्य जीवधारियों में श्रेष्ठ माना जाता है।

संचार साधनो का महत्त्वमहत्त्व-
१- संचार के साधनों में दूरदर्शन एव रेडियो से लोगो का मनोरंजन होता है । इससे लोग शिक्षा ग्रहण करते है।
२- संचार साधन लोगो को जागरूक बनाने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
३- संचार के साधन पिछड़े क्षेत्रो के विकास में मददगार होता है।
४- संचार के साधनों में उपग्रह सेवाओं से मौसम संबंधी जानकारी हो जाती है जिससे यातायात एव कृषि में होनेवाले क्षति कम हो गयी है।
५- संचार माध्यम लोगो को वैज्ञानिक तकनीक का शिक्षा देता है।
६- संचारों साधन राष्ट्रीय एकता में सहायक होते है।
७- संचार साधन देशो की अर्थब्यवस्था को मजबूती प्रदान करते है।
८- संचार साधनो द्वारा विचारो का आदान प्रदान भी आसान हो गया है।
भारत में तीन प्रकार के संचार सेवाएं
है
१- डाक- तार सेवाएं
२- इलेक्ट्रानिक माध्यम या जनसंचार
३- मुद्रण माध्यम

अंतरराष्ट्रीय संचार व्यवस्था

अंतर्राष्ट्रीय संचार व्यवस्था और सूचना राजनीति अवधेश कुमार यादव प्रजातांत्रिक देशों में सत्ता का संचालन संवैधानिक प्रावधानों के तह...